झारखण्ड की शान, लेकिन परेशान

राज्य के दर्ज़नों खिलाडिय़ों की स्थिति दयनीय, सरकारी मदद का इंतज़ार

देश में न जानें ऐसी कितनी प्रतिभाएँ हैं, जो खेल के मैदान में तो जीत दर्ज करती हैं; लेकिन सिस्टम उन्हें हरा देता है। झारखण्ड में ऐसे एक-दो नहीं, कई मामले हैं। राज्य की शान बढ़ाने वाले ये खिलाड़ी आज परेशान हैं और अपनी जान हथेली पर लेकर जुनून के साथ मैदान में डटे हैं। उन्हें सरकारी मदद का इंतज़ार है। इनको अगर मदद नहीं मिली, तो राष्ट्रीय फलक पर चमकने वाले ये सितारे गुमनामी और गरीबी में दबकर रह जाएँगे। हालाँकि सरकार का दावा है कि खिलाडिय़ों की मदद और बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि मदद की रफ्तार इतनी धीमी है कि खिलाडिय़ों का हौसला डगमगाने लगा है। खिलाडिय़ों के बेहतर भविष्य के लिए सरकार को विशेष ध्यान देने और प्राथमिकता पर योजना को तेज़ गति से बढ़ाने की ज़रूरत है।

राज्य ने दिये कई बड़े खिलाड़ी

झारखण्ड की खेल की दुनिया में एक अलग पहचान है। यह पहचान राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम रौशन करने वाले कुछ खिलाडिय़ों ने बनायी है। इनमें क्रिकेट के पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, हॉकी में सुमराय टेटे, अंसुता लकड़ा, ओलंपियन निक्की प्रधान, तीरंदाज़ ओलंपियन दीपिका कुमारी, मधुमिता कुमारी और कोमोलिका कुमारी का नाम देखने को मिलता है। इन खिलाडिय़ों ने पूरी दुनिया में परचम लहराया। राज्य में इन विश्वस्तरीय खिलाडिय़ों की तरह कई ऐसी खेल प्रतिभाएँ हैं, जो अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। इनमें से कई राष्ट्रीय स्तर पर भी पहुँचे हैं। भविष्य में ये देश और राज्य के चमकते सितारे बन सकते हैं; लेकिन गरीबी और मदद नहीं मिलने के कारण ये प्रतिभाएँ दबी पड़ी हैं।

दूसरे काम करने को मजबूर

कराटे के राष्ट्रीय पदक विजेता 26 वर्षीय बिमला मुंडा हडिय़ा (दारू) बेचकर गुज़र-बसर करती थीं। बिमला मुंडा 2011 में 34वें राष्ट्रीय खेलों में रजत पदक विजेता थीं। फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा 2012 में आयोजित कूडो इंटरनेशनल चैंपियनशिप में भी स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। हालाँकि अब उन्हें सरकार ने कुछ मदद दी है। धनबाद की तीरंदाज़ सोनी खातून कई पदक जीतने के बाद मजबूरी में सब्ज़ी बेच रहीं थीं। लम्बे प्रयास के बाद उन्हें पिछले दिनों सरकारी मदद से लैबोरेटरी में नौकरी मिली है। बोकारो के करमाटांड के रहने वाले गनी अंसारी राज्यस्तर पर वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप 10 स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। मजबूरी में उन्हें खेती करनी पड़ रही है। धनबाद की तीरंदाज़ नाज़िया प्रवीण को हालात ने हाथ से धनुष छुड़ा दिया। वह जूता पॉलिश कर रही हैं। जबकि नाज़िया राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीत चुकी हैं। इसी तरह तीरंदाज़ आशीष सोरेन, डेनिस सोरेन, साइक्लिस्ट स्वर्ण सिंह, फुटबॉलर ममता, एथलीट रितिक आनंद, हैडबॉल खिलाड़ी शबनम परवीन जैसे दर्ज़नों खिलाड़ी ऐसे हैं, जो राज्य व राष्ट्रीय स्तर अपना जलवा दिखा चुके हैं। इन्होंने कई मैडल भी जीते हैं; लेकिन गरीबी के कारण इनका भविष्य संकट में है। इनमें आगे बढऩे की तमन्ना है, पर खेल के मैदान में प्रतिभा दिखाने की जगह कोई खेतों में, तो कोई दुकान पर काम कर रहा है। प्रैक्टिस (अभ्यास) के लिए इनके पास सामान नहीं है।

उभरते खिलाडिय़ों की स्थिति भी दयनीय

भारत में होने वाले अंडर-17 वल्र्ड कप महिला फुटबॉल टीम में झारखण्ड की आठ खिलाडिय़ों का चयन हुआ है। इनमें गुमला की सुधा अंकिता तिर्की, सुमति कुमारी, अस्तम उरांव, सालीना कुमारी व अमीषा बाखला, सिमडेगा की पूर्णिमा कुमारी और रांची की नीतू लिंडा व सुनीता मुंडा शामिल हैं।

इन सभी खिलाडिय़ों की पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं है। इन्हें बेहतर प्रशिक्षण और उचित खुराक के लिए सरकार की मदद की ज़रूरत है। कैंप में तो इन्हें सही खुराक मिल भी जाती है, लेकिन छुट्टी में ये खाने को मोहताज हो जाती हैं। अभ्यास पर असर पड़ता है। परिवार की चक्की में पिसती हैं। उन्हें थोड़ी मदद की ज़रूरत है, जिससे वह विश्व फलक पर चमक सकें।

लम्बे प्रयास के बाद, थोड़ी मदद

राज्य की खेल प्रतिभाओं की समस्या को लेकर बीच-बीच में खेल संघ व मीडिया में बातें उठती रही हैं। मामला उठता है, तो फिलवक्त के लिए थोड़ी सरकारी मदद मिल जाती है। पर यह मदद ऊँट के मुँह में जीरा साबित होती है। जिस तरह पिछले दिनों तीरंदाज़ सोनी खातून को 6000 रुपये की निजी अस्पताल में नौकरी दिलायी गयी; हैडबॉल खिलाड़ी शबनम परवीन को अनाज दिया गया; फुटबॉलर पंकज बास्की को 15 हज़ार रुपये की आर्थिक मदद दी गयी; और इसी तरह थोड़ी-बहुत सहायता कुछ अन्य खिलाडिय़ों को मिली; लेकिन इस तरह की मदद को संतोषप्रद नहीं कहा जा सकता।

सरकार का दावा चल रही तैयारी

खेल विभाग के अधिकारियों का दावा है कि खिलाडिय़ों को बढ़ावा देने की तैयारी चल रही है। खेल नीति-2020 बनायी गयी है। खेल को आकर्षक और व्यवहार्य करियर विकल्प बनाने की भी योजना है। खिलाडिय़ों का डाटाबेस तैयार कर अंतर्राष्ट्रीय क्षमता मानक के साथ सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाएँगी। राज्य के 260 खिलाडिय़ों को नकद पुरस्कार राशि और 256 खिलाडिय़ों को खेल छात्रवृत्ति दी गयी है। राज्य में 25 आवासीय क्रीड़ा प्रशिक्षण केंद्र और 89 डे-बोर्डिंग क्रीड़ा प्रशिक्षण केंद्र चल रहे हैं। इन्हें और बेहतर बनाया जाएगा। अंडर-17 महिला फुटबॉल विश्वकप के लिए नेशनल कैंप का आयोजन झारखण्ड में किया गया। कैंप में बेहतर सुविधा दी जा रही है। राज्य में फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए फुटबॉल फेडरेशन के साथ खेल विभाग जल्द ही एमओयू करेगी। खिलाडिय़ों की सीधी नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। इसके लिए अभी तक 33 खिलाडिय़ों का चयन हो चुका है।

सरकार की मदद से एक निजी अस्पताल में 6000 रुपये की नौकरी मिली है। इससे से किसी तरह से परिवार चल रहा है। मेरे पास धनुष नहीं है। प्रशासन ने कई महीने पहले धनुष दिलाने का वादा किया था, लेकिन अभी तक नहीं मिला है। इस वजह से मेरा अभ्यास भी नहीं हो रहा है। मेरी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि मैं खुद धनुष खरीद सकूँ।      सोनी खातून

तीरंदाज़

मैंने स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीता। राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में दो दर्ज़न से अधिक पदक जीते। भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में विशेष ट्रेनिंग शुरू हुई; लेकिन अभ्यास के दौरान जाँघ में चोट लग गयी, जिससे अभ्यास बाधित हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब है, जिसके चलते मुझे पिताजी के काम (दुकानदारी) में हाथ बँटाना पड़ रहा है। सरकार से कोई मदद नहीं मिली। निजी खर्च पर इलाज करा रहा हूँ।ऋतिक आनंद

एथलीट (लम्बी कूद)

मेरा चयन अंडर-17 वल्र्ड कप फुटबॉल के लिए हुआ है। कैंप में रहने पर अच्छा भोजन मिलता है; लेकिन छुट्टी के समय परेशानी होती है। अभी कैंप से छुट्टी मिली हुई है। अभ्यास भी बन्द है। मेरे पिता किसान हैं। मेरी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। बीच-बीच में थोड़ी आर्थिक मदद प्रशासन से मिल जाती है।

नीतू लिंडा

अंडर-17 वल्र्ड कप फुटबॉल

कैंप खिलाड़ी