जान लेने के लिए क्या सोशल मीडिया ने उकसाया?

भीड़ के हाथों हत्या के बढ़ रहे मामलों में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। आरोप है कि यह अफवाहों को गति देता है और भीड़ बिना छानबीन किए किसी को भी अपना शिकार बना लेती है। अब बच्चा चुराने की अफवाहों ने सबसे ज्यादा जानें ली है। नंदिता सेनगुप्ता की रिपोर्ट

सोशल मीडिया पर ‘बच्चे चुराने वालोंÓ के बारे में संदेश वायरल हुआ इसने आसाम, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश समेत नौ राज्यों में न केवल 27 लोगों की जान ले ली। बल्कि यह भी प्रश्न छोड़ दिया कि भारत में इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की बढ़ती संख्या के साथ क्या सोशल मीडिया अच्छे की बजाए बहुत बुरा कर रहा है।

अगर आंकड़ों पर विश्वास करें तो भीड़ द्वारा हत्या अधिकतर राज्यों में नई बात नहीं हैं। सोशल मीडिया के अविष्कार और इस्तेमाल से पहले भी ‘डायनÓ बताकर निर्दोष लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया जाता था। मुख्य रूप से इसका निशाना महिलाएं होती थी।

नेशनल अपराध ब्यूरो (एनसीआरबी) के आकंड़ों के आधार पर गृह मंत्रालय का कहना है कि 2016 में ‘जादू-टोनेÓ करने की अफवाह में 134 लोगों की हत्या कर दी गई। झारख्ंाड में ऐसी अधिकतम 27 हत्याएं हुई ओडिशा (24), मध्यप्रदेश (19), छत्तीसगढ़ (17) गुजरात (14) और तेलंगाना(11) आसाम, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी इस तरह के मामलों की सूचना है।

2016 में भीड़ द्वारा हत्या के आठ मुख्य कारणो में ‘जादू-टोनाÓ एक मुख्य कारण था। इसके अन्य कारण सड़क पर हिंसा, अतिवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, डकैती, बलात्कार, वर्ग संघर्ष और राजनीतिक हैं।

एनसीआरबी की 2015 की रिर्पोट के अनुसार इस तरह के मामलों की संख्या 2014 में 157 थी जिसमें से ऐसी 30 फीसद (127) हत्याएं अकेले झारखंड राज्य के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में हुई इसके अलावा ओडिशा (32) मध्यप्रदेश (24) और छत्तीसगढ़ (16) में ऐसे मामले सामने आए। ब्यूरो ने बताया कि 2000 और 2012 के बीच इस तरह की 2097 हत्याएं हुई इनमें ‘जादू-टोनाÓ मुख्य कारण था।

भारत के ग्रामीण इलाकों में भीड़ के हमले के मामलों में पुलिस जांच से पता चला है कि इन सब मामलों में एक जैसी मानसिकता रही है चाहे आसाम के चाय के बगान हों या ओडिशा, झारखंड़ के खदान।

एक युवा वकील सीमा झुइंया ने गुवाहटी उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है जो विशेष रूप से भीड़ के हाथों हत्या के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करती है। उनका तर्क है कि ”हमारे कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के साथ दंडित नहीं किया जा सकता। अगर कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसे कानून की स्थापित प्रक्रिया से गुज़र कर ही दंडित किया जा सकता हैÓÓ।

उसने कहा, हालांकि आजकल देखा गया है कि लोग अक्सर भीड़ तंत्र की तरफ जाते हैं और व्यक्ति को बिना किसी कानूनी प्राधिकार प्रक्रिया के दंड दे रहे हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन सरंक्षण एक महत्वपूर्ण अधिकार है और राज्य को इसकी रक्षा करनी चाहिए। भीड़ के हाथों हत्या की ऐसी घटनाएं सविधान की धारा 14 और 21 के उल्लंघन का नतीजा है। इस तरह की घटनाएं हमारे लोकतंत्र पर धब्बा हंै। क्योंकि हमारे पास लोकतंत्र है भीड़तंत्र नहीं। यह जनहित याचिका जून महीने में दायर की गई है। जनहित याचिका को इस साल जून में दो युवाओं की हत्या के बाद दायर किया गया।आसाम के करबी एंग्लोंग जि़ले के एक गांव में दो युवाओं नीलोटपाल और अभिजीत नाथ को 250 लोगों की भीड़ ने बच्चे चुराने वाला होने के शक में पीटकर मार डाला।

एक युवक ने ग्रामीणों को सूचित किया था कि उनके गांव पनीजुरी से बच्चा चुराने वाले दो युवाओं (दास और नाथ) ने एक लड़के का अपहरण कर लिया है और उसे अपनी गाड़ी में ले जा रहे हैं तो ग्रामीणों ने नोलोटपाल और अभिजीत को उनकी काले रंग की गाड़ी से बाहर घसीट लिया और उनकी हत्या कर दी।

जादू टोने के मामले

झारखंड

झारखंड के खुंती जि़ले के दादगामा गांव में अज्ञात लोगों की भीड़ ने एक बुजुर्ग युगल पर हमला किया और डायन होने का आरोप लगा कर उन्हें मार डाला और बुजुर्ग महिला का सिर काट दिया। छह अज्ञात लोगों के गिरोह ने पीडि़त जिनकी पहचान सतरी मुंडा (55) और उनकी पत्नी जवनी देवी(50) के रूप में हुई है उनके घर में घुस कर उन पर हमला किया। जब बच्चेे डर कर रोने लगे तो भीड़ ने बच्चों को धमकाया और अपमानित किया। पुलिस ने इस भयानक हमले के बाद कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया। जिनमें से कुछ को जमानत मिल गई क्योंकि पुलिस उनके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने में विफल रही। झारखंड जादू टोने के मामलों की जांच के लिए विशेष कानून रखने वाले सात राज्यों में से एक होने के बाद भी आदिवासी समाज प्रचलित अंधविश्वास के कारण इस तरह के मामलों से संघर्ष कर रहा है।

असम

असम में हुए इस तरह के संदिग्ध हमलों में एक अक्तूबर 2014 में करबी एंग्लोंग जि़ल में एथलीट देवजानी बोरा पर हुआ हमला और अप्रैल 2017 में कोकराझार जि़ले में एक आदिवासी युगल की हत्या का है। कोकराझार जि़ले के पलाशगुड़ी गांव में यह हमला तब हुआ जब वे अपनी झोपड़ी में सो रहे थे। उनके बच्चों को दूसरी झोपड़ी में बंधक बनाया गया था क्योंकि वे मदद के लिए चिल्ला रहे थे। तब से नागाओं जि़ले के अनाथालय में इन पांच बच्चों की देखभाल की जा रही है। 2016 में गुहाटी हाईकोर्ट के कहने के बाद राज्य विधानसभा ने ‘डायन-विरोधीÓ कानून पास किया जिसे हाल में केंद्र से मंजूरी मिली है।

ओडिशा

ओडिशा के कयोंझर जि़ले के गांव मुंडाशाही में 40 वर्षीय आदिवासी गुरू मुंडा के परिवार पर हुआ हमला ‘डायनÓ बता कर किए गए हमलों में से एक था। ओडिशा में झारखंड के बाद सबसे ज़्यादा डायन हत्या के हमले हुए हैं। मुंडा उनकी पत्नी बुद्धिनी, दो बेटियां और दो बेटों की 30 मिनट की अवधि में क्रूरता से हत्या कर दी गई थी। पुलिस के अनुसार ओडिशा के 2014 ‘विच हंटिगÓ रोकथाम अधिनियम का केंद्र महिलाएं थी, परन्तु कई मामलो में पुरूषों को भी पीडि़त पाया गया है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जिसने कुछ साल पहले डायन-हत्या और अन्य अंध विश्वासों, प्रथाओं के खिलाफ कानून बनाने की कोशिश की। यह कुछ धार्मिक समूहों के विरोध के कारण प्रारंभिक स्तर पर असफल रहा, वे यह मानते थे कि कानून को धार्मिक रीतियों और पुरानी परंपराओं से दूर रहना चाहिए। 2013 में राज्य में बने मानव बलि और अन्य अमानवीय बुराईया, अघोरी प्रथाओं की रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम के बाद राज्य में डायन हत्याओं के हमलों में गिरावट आई है।

डायन हत्या

 कम से कम 12 राज्य ‘डायन हत्याÓ की गिरफ्त में है। कुछ ने इस तरह के खतरनाक प्रथा के मूल कारणों को समझने की कोशिश की है। एक एनजीओ ‘पार्टनर फॉर ला इन डेवलमेंटÓ ने अध्ययन किया कि डायन हत्या की जड़ें वित्तीय विवाद, अंधविश्वास, पितृसत्ता, और अन्य व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्ष में निहित है। अक्सर ये संघर्ष पीडि़त और उसके रिश्तेदारों, दोस्तों या परिचितों के बीच ईष्र्या और तनाव के कारण उत्पन्न होते हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों में उचित चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण अक्सर लोग ओझा का सहारा लेते हैं, जो अक्सर गांव में एक परिवार या महिला को डायन के रूप में दोषी ठहराते हैं। जिसके परिणामस्वरूप इस तरह की हत्या होती है। दंड का दायरा घरों से निर्वासित करने से लेकर मौत की सज़ा तक होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

गुवाहाटी मेडिकल कालेज और अस्पताल की मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेसर दीपांजली मेधी का कहना है कि ग्रामीणों की खराब आर्थिक-सामाजिक स्थिति के अलावा, आतंकवाद, दंगे, और हिंसक आदोलन और कानून लागू करने वाली एजेसियों की इस तरह के अपराध में शामिल लोगों का दंडित करने में विफलता लोगों को ‘तत्काल न्यायÓ के लिए कानून को अपने हाथों में लेने के लिए उकसाती है।

उन्होंने कहा, जब लोग दूसरों को गोली मार कर हत्या कर देते हंै, बम विस्फोट में मौंते होती हैं और अक्सर पीडि़त को न्याय नहीं मिलता तो मृत्यु का डर कम हो जाता है और वे

तत्काल कानून न्याय के लिए अपने हाथों में ले लेते हैंÓ।

कानूनी सुरक्षा

मुंबई के एक वकील सदाशिव नारलेकर जो भीड़ हिंसा के पीडितों के लिए कार्य कर रहे एक एनजीओ के साथ काम कर रहे हैं उनका कहना है कि हाल में हुई हत्याओं के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग वजह है। अधिकतर ग्रामीण सच्ची और झूठी खबरों के बीच अंतर करने में असमर्थ हैं, और इस प्रकार के संदेशों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। वे जल्दी से कार्रवाई में कूद जाते हैं- यह बच्चा चुराने वाले और डायन के रूप में पहचाने गए लोगों पर हमला कर देते हैं। उन्होंने कहा,’ लोगों का एक ऐसा वर्ग जो सोशल मीडिया का ज्ञान रखता है इस तरह की स्थिति का लाभ उठाता है। किसी से बदला लेने के लिए और परिवार के प्रत िव्यक्तिगत असंतोष के लिए।Ó

अभी हाल में करबी एंग्लोंग जि़ले में दो युवकों की हत्या की जांच में भी यही तथ्य सामने आया। एक युवक जिसकी इस हत्याकांड में मुख्य आरोपी के रूप में पहचान और गिरफ्तारी हुई उसने पुलिस को बताया की नीलोटपाल और अभिजीत के साथ उसका छोटा सा झगड़ा हुआ। उसने ग्रामीणों को बताया कि दोनो बच्चों को चुराने वाले हैं। ग्रामीणों ने उसका भरोसा किया और उन दोनों को पकड़ लिया और मार डाला।

एशियाई मानव अधिकार आयोग, हांगकांग स्थित मानव अधिकार संगठन ने कहा कि,’भारत में भीड़ द्वारा हत्या को अपराधी सिद्ध करने और दंडित करने के लिए कोई विशेष दंड कानून नहीं है, इसलिए ऐसी गतिविधियों और हत्याओं में भाग लेने वाले भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत ही लाए जाते हैं। एनजीओ ने बताया कि,’ यहां हत्या के लिए धारा 302, गैर इरादतन हत्या के लिए धारा 304, हत्या का प्रयास करने के लिए धारा 307, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के लिए धारा 323, धारा 325 जानबूझ कर गंभीर चोट पहुंचाने के लिए और जब बड़ी संख्या में लोगों के समूह द्वारा अपराध करने की बात आती है तो धारा 34 आम इरादे के लिए, धारा 141 गैर कानूनी ढंग से इक_ा होने के लिए, आपराधिक षडय़ंत्र के लिए धारा 120 बी के साथ ही दंगों को अपराधी बनाने वाले प्रासंगिक वर्ग भी शामिल है।

इस दौरान भारत में एनजीओ ने नेशनल अभियान बैनर के तहत भीड़ के हाथों की गई हत्या के खिलाफ और दंड के लिए एक अभियान शुरू किया है।