चन्नी या सिद्धू ! पंजाब में चुनाव से भी बड़ी है कांग्रेस की यह चिंता

राहुल गांधी के गुरुवार के दौरे के बाद पंजाब में कांग्रेस की स्थिति में कोई ख़ास बदलाव हुआ है ? हाँ, हुआ है। राहुल गांधी की कही यह बात सबसे महत्वपूर्ण है कि  जनता, पार्टी और कार्यकर्ता जिसे तय करेंगे, वहीं सीएम का चेहरा होगा। पार्टी में सभी इस फैसले का सम्मान करेंगे। कांग्रेस राजनीतिक रिस्क के बचने के लिए किसी भी चेहरे को मतदान से पहले सीएम के रूप में प्रोजेक्ट न करे, यह उसके लिए ज्यादा फायदेमंद है। नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस आलाकमान के प्रिय हैं और पार्टी उन्हें खोना नहीं चाहती। लेकिन वह एक दलित नेता के रूप में चन्नी का महत्व भी कम नहीं करना चाहती।

सिद्धू विधानसभा चुनाव में अपने हलके में सब विरोधियों के निशाने पर हैं। कैप्टेन अमरिंदर सिंह किसी सूरत में उन्हें जीतने नहीं देना चाहते। आखिर सिद्धू के कारण ही कैप्टेन की मुख्यमंत्री की कुर्सी गयी थी। उनके मन में सिद्धू के लिए राजनीतिक जहर भरा है। अकाली दल, खासकर बादल, भी सिद्धू से खूब खार खाते हैं। सिद्धू राहुल गांधी के दौरे में मंच से उनके सामने चेहरा घोषित करने को लेकर मांग कर चुके हैं।

भाजपा भी सिद्धू के प्रति तल्ख है। सब मिलकर अमृतसर सीट पर सिद्धू को ‘मज़ा’ चखाना चाहते हैं। ऐसे में कांग्रेस पूरी ताकत से उनके साथ रहना चाहती है। प्रियंका और राहुल सिद्धू का राजनीतिक महत्व समझते हैं, भले बीच-बीच में उन्होंने अपने बयानों से आलाकमान की बेचैनी भी बढ़ाई है।

सिद्धू विधानसभा चुनाव में यदि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में बने रहते हैं और पार्टी कोई चेहरा घोषित नहीं करती तो इसका लाभ उन्हें मिलेगा। चन्नी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित होने की स्थिति में सिद्धू को अपने हलके में ‘भावी सीएम’ वाली मनोविज्ञानिक बढ़त से बंचित होना पड़ेगा। ऐसे में चुनाव उनके लिए कठिन भी हो सकता है। मनीष तिवारी, सुनील जाखड़ जैसे कद्दावर नेता पहले ही सिद्धू को लेकर अटपटे ब्यान दे चुके हैं। लिहाजा राहुल गांधी और प्रियंका गांधी चाहते हैं कि ऐसे समय में पार्टी पूरी ताकत से सिद्धू के पीछे रहे।

उधर चन्नी भी अपनी ‘सीएम’ वाली छवि के साथ चुनाव में जाना चाहते हैं। खुद उन्हें और पार्टी को भी इसका लाभ मिलेगा क्योंकि वे देश भर में अकेले दलित सीएम हैं। सिद्धू के विपरीत अपने हलके में चन्नी को समर्थन की उतनी चिंता नहीं है। पिछले छह साल बाद चन्नी के रूप में देश को दलित सीएम मिला है, और कांग्रेस इससे मिलने वाली संभावित बढ़त को गंवाना नहीं चाहती। यही कारण है कि चन्नी उसके एजेंडे में ऊपर हैं।

पंजाब में करीब 32 फीसदी दलित वोट हैं, भले उनकी जातियाँ अलग-अलग हैं। सिख धर्म में वैसे तो दलित, जट्ट सिख या अन्य सिख में भेद नहीं किया जाता, लेकिन राजनीति में यह चीजें मायने रखती हैं। कांग्रेस इस बात को समझती है। ऐसे में वह चन्नी और सिद्धू को लेकर जिस दुविधा का शिकार है, उसमें उसके लिए बीच का रास्ता ही सही है। राहुल गांधी के पंजाब दौरे से यही सन्देश मिला है कि वह शायद चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित न करे। और यदि पार्टी ने किया तो उसका फैसला चौंकाने वाला होगा। शायद यह चन्नी हों।

कुलमिलाकर दिखता है कि कांग्रेस सीएम चेहरे को लेकर दुविधा में है। लेकिन ऐसा   सिर्फ दिख रहा है, हकीकत में ऐसा नहीं है। आलाकमान की सीएम कौन हो, इससे बड़ी चिंता यह है कि उसके नेता एकजुट होकर चुनाव में जाएं। पार्टी के पांच बड़े नेता सीएम चरणजीत सिंह चन्नी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष सुनील जाखड़, सांसद मनीष तिवारी और प्रताप सिंह बाजवा
अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। कुछ और हैं, जो इन नेताओं के साथ हैं और एक-दूसरे के विरोध में कहने से नहीं हिचक रहे। चुनाव में इसका नुक्सान होता है।