काशी की गलियां अब बदल रही हैं मैदान में

काशी में कुछ गलियां अब विशाल मैदान में बदलती जा रही हैं। मलबा अब भी है। धूल की गंध है। टूटे मकानों की दीवारें और टूटी आलमारियां हैं। केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में राज कर रही एनडीए सरकार के मुखिया का संसदीय क्षेत्र बनारस है। उनके ड्रीम प्रोजेक्ट विश्वनाथ कारिडोर और गंगा व्यू को साकार करने के बहाने काशी की गलियां मैदान में बदली गई हैं।

ड्रीम प्राजेक्ट का एक चरण पूरा हो गया है। इसे बताने पिछले दिनों वे खुद आए थे। उन्होंने खुशी से कहा था,’अब बाबा विश्वनाथ मुक्त हवा में सांस ले सकते हैं।’ बिखरे मलबे और खंडहरों पर प्रशासन ने तब हरा या सफेद पर्दा डाल दिया था। जब भी वे आते हैं। यही करना पड़ता है।

बनारस ही नहीं पूरे देश में को भी छोडें तो दुनिया भर में मुखिया की चर्चा है। उन्होंने सदियों से शहर की पहचान रही गलियों को ही मटियामेट कर दिया। अपने ड्रीम प्रोजेक्ट पर अमल कराने के लिए उन्होंने धरोहर का नाश कर दिया। अब मई में बनारस में भी चुनाव होने हैं। इनके मुकाबले में कौन है? अफवाह तो नहीं लेकिन चर्चा जबरदस्त है शायद कांग्रेस की महासचिव प्रियंका को परिवार, पार्टी और देश की खातिर मुकाबले में उतारा जाए। तब शायद विपक्षी दल उन्हें हर तरह से सहयोग भी दें। यदि यह दुर्गावतार सचमुच हो जाए तो शायद कहीं अहंकार कुछ कम हो।

आज मोदीमय है काशी। गोदौलिया पर कुलीन वाणिक समुदाय ने भव्य स्क्रीम पर नमों टीवी का प्रसारण चलवा रखा है। हालांकि भारत सरकार का सूचना प्रसारण मंत्रालय भी नहीं बता पाता कि नमो टीवी का रजिस्ट्रेशन कब हुआ और इसके मालिक कौन हैं। जब विपक्ष ने बहुत हल्ला मचाया तो चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव 2019 की अधिसूचना जारी होने के बाद नमो टीवी पर सिर्फ प्रधानमंत्री के भाषणों और उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों को नमो टीवी पर लाइव प्रसारण की अनुमति दी। सोचिए कितना आसान है देश में टीवी चैनेल शुरू करना। शर्त यही है कि आप अधिकारों की कुर्सी के आसपास हों। रसूख रखते हों, फिर देखें जलवा।

बहरहाल, नमो टीवी के कार्यक्रमों को रिले कर रहे हैं सभी टीवी प्रसारण प्लेटफार्म, भले वह हो टाटा स्काई, एअरटेल, वीडियोकोन या फिर कोई और अब भारत निर्वाचन आयोग के फरमान और कानून की स्थिति का आकलन करें। काशी में व्यावसायिक केंद्र के रूप में मशहूर चौक-गोदौलिया मार्ग पर बांस फाटक के अपने भव्य शो रूम के बाहर की दीवार पर नमो टीवी का प्रसारण जालान समूह की पूरी भव्यता के साथ कर रखा है। इससेे काशी के लोगों और तीर्थयात्रियों का मन लगा रहता है। अपने नेता में। ट्रैफिक नियमों की भी यदि अनदेखी हो रही है तो क्या। अपनी है सरकार, सबका रखती है ख्याल।

जैसे ही सांझ होती है। नमो टीवी पर छा जाते हंै, देश के चौकीदार। काशी की जनता में अपने नेता का इससे अच्छा, मुफ्त प्रचार और कैसे संभव है? कितना रोचक है कि प्रधानमंत्री का यह संसदीय क्षेत्र। कानून -व्यवस्था भी यहां लाजवाब है और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, ईवीएम-वीवीपीएटी भी जबरदस्त! बशर्ते बिजली हो।

इन तमाम सवालों पर स्थानीय मीडिया वैसे ही चुप है जैसे प्राचीन धरोहरें मंदिर-गलियां – दुकानें टूटती गई लेकिन मीडिया की चुप्पी बरकरार रहीं जो दो चार लोग विरोध में आए। उनके बारे में क्या ही कहना और क्या सुनना। जब लोकप्रिय सरकार जनहित में कर रही है कर काम। पुराने भाजपा कार्यकर्ता और बंगाली नेता श्याम बिहारी चौधरी ने तो कहीं कभी कुछ न देखां, न सुना फिर बोलते कैसे? हालांकि रहते वे काशी में हैं।

काशी में अब न पुराना रंग है और न वह मस्ती, जिसके लिए काशी कभी जानी जाती थी। फिर भी काशी के मरघट की अपनी अलग ख्याति है। गंगा सूख रही है। प्रदूषण बढ़ रहा है। ‘नमामि गंगे’ सिर्फ सुंदर तस्वीरों में ही है।

अभी बीती हनुमान जयंती (19 अप्रैल) किसी ने सुध तक नहीं ली। ध्वस्त ललिता गली के किनारे गोयनका पुस्तकालय के पास ही बने प्राचीन हनुमान मंदिर में कभी खूब पूजा अर्चना होती थी। संगमरमर की जिस पट्टिका पर हनुमान चालीसा लिखी थी वह टूट गई। मंदिर की बगल में वह रखी है धूल-धक्क्ड़ में। उसे साफ रखने की भी अब कोई जतन नहीं। कभी कभार ही आते हैं भक्त। हां, एक पंडित है जो अपनी रूचि से पूजा-पाठ और आरती करते दिखते हैं।

जर्मनी के किसी शहर से काशी में आई और बसी एक महिला हैं गीता। वे खुद को हनुमान भक्त कहती हैं। मंदिर सुरक्षित रहे इसके लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया। लेकिन तब लोभ था धन का। यह इन ध्वस्त गलियों के उन मकान मालिकों में तब खूब था। कोई भी उस विदेशी महिला के साथ आंदोलन में खड़ा तक नहीं हुआ। यहां रहने वाले लोग प्रशासन और पुलिस के अफसरों को तब बताते थे कि वह तो विक्षिप्त हो गई है। खुद की मानसिक स्थिति के दुरूस्त होने का तब प्रमाण दे रहे थे ये वाराणसी की गलियों के नए राजा। जो तब पैसा पाकर अपनी मानसिक स्थिति दुरूस्त होने की दुहाई दे रहे थे।

ललिता गली में मकानों-दुकानों के मालिक और दुकानदार तब खुद को बहुत समझदार, सुलझा हुआ बताते और अपने हितों के लिए बेहद व्यग्र रहते थे। एक दोपहर इन लोगों ने गुपचुप प्रशासन के अधिकारियों से मकानों, दुकानों का सौदा कर लिया। वे छोड़ गए इन हनुमान को । उन्हें मलबे के ढेर में फेंक दिया प्रशासन ने। लेकिन कुछ समझदार, सुलझे लोग आए आगे।

कुछ लोगों ने तब आवाज़ लगाई। हालांकि जब लड़ाई हो रही थी तब ज़्यादातर अपने-अपने घरों में दुबके हुए थे। अब गलियों के खंडहरों के बीच ‘मुक्तिधाम’ पसरा हुआ है। हनुमान जी छोटे कमरे में मुक्त हैं। उनके मंदिर के कमरे पर ताला है। जब यहां रहने वाले ही चले गए तो हनुमान जयंती फिर कौन मनाए?

हनुमान मंदिर के बाहर एक शिलापट्ट लगा है। उस पर लिखा है,’हमें आपसे आशीर्वाद की आकांक्षा है। कहते हैं आवासीय और व्यवसायिक अतिक्रमण हटाने के बाद से हनुमान का दर्शन सर्वसुलभ हुआ है। लेकिन अब श्रद्धालु कहां हैं?

हकीकत यही है कि हनुमान जयंती पर भी इस हनुमान मंदिर और ललिता गली की सुध न प्रशासन ने ली और न यहां पहले बसे लोगों ने।