और जब अंधेरा होता…

31 अक्तूबर 1984 – मैं अपने कुछ दिल्ली और पंजाब के साथियों सहित मद्रास से एक मीटिंग अटैंड करके वापिस चंडीगढ़ आ रहा था। शाम का सयम था एकाएक रेल के डिब्बे के माहौल में तबदीली आ गई। हुआ क्या था? नहीं मालूम। लेकिन एक तनाव कुछ चिंता की लकीरें कुछ लोगों के चेहरों पर देखी जा सकती थी। खैर हमने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो एक दम से खबर फैल गई कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर उनके ही सिख सुरक्षागार्डों ने गोली चला दी है। खबर महत्वपूर्ण थी, व और ज़्यादा जानने की उत्सुकता जगा रही थी। आपस में काफी देर इसी पर चर्चा होती रही। इस बीच शाम ढलने लगी और एक दो जगह पर गाड़ी अनजान स्टेशनों पर भी रुकी या चेन खींच कर रुकवाई गई। खैर – झटका तो उस वक्त लगा जब एक मित्र ने बाथरूम से वापिस आकर बताया कि यह गाड़ी तो लगभग खाली हो चुकी है। हर डिब्बे में इक्का दुक्का परिवार या सवारियां बची थी। हैरानी और उत्सुकता दहशत में बदलने लगी जब कुछ एक जगह पटरी के दोनों और खड़ी भीड़ ने चलती गाड़ी पर पत्थर बाजी शुरू कर दी। हमने भी डिब्बा बंद कर लिया और चौकस होकर बैठ गए। फल काटने के लिए रखा चाकू हथियार लगने लगा। सफर कर रहे एक दो सिख परिवार न जाने कब और कहां उतर गए थे।

कोई खाना नहीं आया, न कोई चाय कॉफी वाला और भूतिया ट्रेन मजऱ्ी से चलती, रुकती, आउटर दिल्ली पहुंच गई। बहुत धीमी गति से चलती ट्रेन में से कुछ घर व फैक्टरियों में से ऊँची लपटें व धुंआ उठता नजऱ आने लगा। आगे आए तो सड़कों पर कई जगह ऑटो रिक्शा, टैक्सी, स्कूटर इत्यादि जलते हुए नजऱ आए। सड़कें सूनी थी जैसे कफ्र्यू लगा हो। रब-रब करते हुए नई दिल्ली स्टेशन पर उतरे तो एक रेलवे कर्मचारी से पता लगा कि दंगा फैल गया है। दिल्ली जल रही है। पंजाब जाने वाली कई ट्रेनें रद्द हो गई हैं। पंजाबियों, खासकर सिखों को मारा जा रहा है। उसने कहा कि जल्दी से यहां से चले जाओ न जाने कब दंगई यहां भी आ धमकें। अचानक मुझे अपने साथ आया अपना वर्षों पुराना सिख दोस्त भार लगने लग गया।

न जाने कब अपने आप हमारी भाषा बदल गई थी। कोई पंजाबी नहीं बोल रहा था। प्लेटफार्म के बाहर कदम रखा तो सुनसान, अंधेरा, दहशत भरा माहौल, कोई पुलिस या सुरक्षा कर्मचारी नहीं था। न ही टैक्सी या ऑटो। रात दो बजे का समय था। कहां जाएं सोच ही रहे थे कि दूर से स्पीकर की आवाज़ सुनाई दी कि दिल्ली के पानी में ज़हर मिला दिया गया है। कोई भी नल या टैंकों का पानी न पिए। सुनकर जिस्म में सनसनाहट सी फैल गई। एक दोस्त को याद आया कि रेलवे कालोनी में ही हमारे एक पंजाबी दोस्त के भाई का घर है। वहां पहुंच कर दरवाजे पर दस्तक दी तो पहले तो जवाब ही नहीं आया। दो तीन बार नाम लेकर आवाज़ लगाई तो अंदर से एक डरी हुई कंपकंपाती आवाज़ आई, कौन?

भाई साहब हम जगदीश के मित्र हैं मद्रास से वापिस आ रहे हैं। वगैरा-वगैरा एक दो प्रश्न पूछने के बाद उन्होंने दरवाजा खोला। फटाफट हमें अंदर लिया और एक कमरे में चार गद्दे फैला दिए। हम बिना कुछ बोले व कहे सुने लेट गए। भाई साहब ने बताया कि कैसे सिखों को चुन- चुन कर हजारों की संख्या में मारा जा रहा है। गले में टायर डाल कर जलाया जा रहा है। हम सब अगले दिन पंजाब कैसे पहुंचेगें के बारे में सोचने लगे। नींद कोसों दूर थी।

कभी-कभी ऐसी आवाजें आती थी जैसे किसी हिंसक भीड़ द्वारा किसी पर हमला किया जा रहा हो। उसके बाद चीखने की दर्दनाक आवाज़ें। फिर एकदम सन्नाटा। हे भगवान ये सब क्या हो रहा था। जैसे तैसे वो काली रात खत्म होने को आई। अभी अंधेरा ही था कि भाई साहब ने भी हमें चाय पिला कर जैसे माफी मांग ली कि अब जाइए ऐसा न हो कि कोई सोचे कि उन्होंने कुछ पंजाबियों को घर में शरण दे रखी है। उन हालात में वो भी अपनी जगह सही थे।

दिल्ली वाले तो प्रस्थान कर गए। उनके साथ मेरा सिख दोस्त भी चला गया। वह दिल्ली का ही रहने वाला था। जब वह गया तो हम सोच रहे थे पता नहीं अब उससे कभी मुलाकात होगी भी या नहीं। पर बाद में पता चला कि वह उन दंगों में बच गया था। पंजाब वाले हम तीन लोग ही बचे थे। इसलिए डर और बढ़ गया था। भाई साहब रेलवे में ही कार्यरत थे उन्होंने फोन पर पता किया कि एक टे्रन चंडीगढ़ जा रही है आधे घंटे में। हम भागते हुए स्टेशन पर पहुंचे। और एक डिब्बे में बैठ गए जो तकरीबन खाली था। एक साथी ने अखबार खरीद लिया था उसे मिलकर सब पढ़ रहे थे, कि एक सुरक्षा कर्मचारी ने आकर अखबार ले ली। अजीब स्थिति थी। बहस करना भी मुनासिब नहीं था। शायद इसलिए कि अखबार देखकर पंजाब में हिंसा न भड़क जाए। यह ख्याल आते ही जिस्म में जैसे एक कंपकंपी फैल गई। मेरे माता-पिता लुधियाना के एक कस्बे में रहते थे। उन पर न कोई आफत आ जाए। यह सोचा हुआ आखिर चंडीगढ़ उतरा। घर जाने की बजाए सीधे टैक्सी करके माता-पिता को लेने चल पड़ा और गांव पहुंचा। यह लिखते हुए शर्म आती है कि मैंने खासतौर पर देखा था कि चालक हिंदू है। पिताजी ने 1947 का समय देखा हुआ था। बिना देरी किए वो भी ज़रूरी नकदी गहना वगैरा लेकर मेरे साथ पंचकूला आ गए। दुख-सुख में हम अक्सर नाडा साहब गुरूद्वारे जाया करते थे, लेकिन इस बार हम बिना एक दूसरे से कुछ बोले मनसा देवी मंदिर में माथा टेक आए।

घटना आम है। न जाने मेरे जैसे कितनों के साथ घटी होगी। लोग भूल भी चुके होंगे। लेकिन मेरे लिए यह घटना कुछ ऐसे सवाल छोड़ गई जो मुझे आज भी व्यथित करते हैं। जैसे कि वर्षों पुराना हमारा सिख मित्र जो उस दिन हमारे साथ सफर कर रहा था रातों-रात टे्रन में हमें बोझ क्यों लगने लगा गया था? गांव जाते हुए मुझे क्यों इस बात की संतुष्टि महसूस हुई कि टैक्सी ड्राइवर हिंदू है? क्यों वापिस पंचकूला आकर हम हमेशा की तरह गुरूद्वारे न जा कर मंदिर चले गए? अगर ऐसी घटनाओं का पढ़े-लिखे इन्सान पर जो कि पंजाब में ऐसे हिंदू परिवार में जन्मा व पला बढ़ा हो जिस परिवार के आधे रिश्तेदार सिख हैं, ऐसा प्रभाव हो सकता है तो एक आम साधारण कम पढ़ा-लिखा इन्सान किस हद तक जा सकता होगी।

शायद ऐसा ही होता हो जब ”अंधेरा होता है’’।