ओलंपिक 2020: अब पदक दूर नहीं भारत से

ओलंपिक खेल बस कुछ ही दूर हैं। किसी समय हॉकी की दुनिया का बादशाह भारत अब पदक के लिए तरस रहा है। इतिहास पर नज़र डालें या आँकड़ों को देखें तो भारत हॉकी में आठ स्वर्ण, एक रजत और दो कांस्य पदक जीत कर आज भी सबसे आगे है। पर गौर करने की बात यह है कि इन में से छह स्वर्ण पदक 1928 से 1956 के बीच आये। फिर 1960 के रोम ओलंपिक में सोने का रंग बदल कर चाँदी का हो गया। 1964 (टोक्यो) में भारत ने अपनी साख बचायी और सेंटर हाफ चरणजीत सिंह के नेतृत्व में खेल रही भारतीय टीम मोहिंदर लाल के गोल की बदौलत सातवाँ स्वर्ण पदक जीत गयी।

इसके बाद हॉकी गर्त ओर जानी शुरू हो गयी। हॉकी प्रशासन की लाचारी देखिए कि 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में गयी टीम के दो कप्तान बनाने पड़े। ये थे गुरबख्श सिंह और पृथिपाल सिंह। यहां यह टीम पहला ही लीग मैच न्यूज़ीलैंड से 1-2 से हारी और सेमीफाइनल में भी आस्ट्रेलिया ने भारत को इतने ही अंतर से हराया। इस प्रकार पहली बार भारत ओलंपिक हॉकी के फाइनल में नहीं था। पर वह कांस्य पदक जीतने में सफल रहा। 1972 के म्युनिक ओलंपिक में भी हालत यही रही। भारत कांस्य पदक लाया। 1976 के मांट्रियल ओलंपिक मेें पहली बार ‘एस्ट्रो टर्फ’ का इस्तेमाल हुआ और पहली बार अजितपाल सिंह के नेतृत्व में वहाँ गयी, भारतीय टीम सेमीफाइनल से भी बाहर हो गयीं। यह वही टीम थी, जिसने एक साल पहले (1975) विश्व कप जीता था।

हॉकी खेल मेें भारत का अंतिम स्वर्ण पदक या पदक 1980 के मास्को ओलंपिक में आया। ध्यान रहे कि हॉकी खेलने वाले लगभग सभी देशों ने इन खेलों का वहिष्कार किया था। यहां भारत ने स्पेन को फाइनल में 4-3 से हटा कर 16 साल बाद यह िखताब अपने नाम किया था।

इस बात को आज 40 साल हो गये। भारत के खेल प्रेमी आज भी टकटकी लगाये उस स्वर्ण पदक की राह देख रहे हैं, जो भारत से यूरोप और अब अमरीकी उपमहाद्वीप (आर्जेंटीना) पहुँच गया है। यूरोप में भी जर्मनी और नीदरलैंड्स को चुनौती देने वाली बैल्जियम की टीम पैदा हो चुकी है। एशिया में भारत और पाकिस्तान को टक्कर देने वाली कोरिया, जापान और मलेशिया की टीमें है। एशियायी खेलों में हॉकी का िखताब जापान ने जीता है।

भारत चौथी रैंकिंग पर

मनप्रीत सिंह ने नेतृत्व में इस बार टोक्या  ओलंपिक में खेलने जा रही भारतीय टीम काफी आस बँधा रही है। आईएचएफ प्रो हॉकी लीग में जिस प्रकार उसने नीदरलैंड्स को लगातार दो मैचों में 5-2 और 3-1 (3-3) से हटाया उसके बाद विश्व कप विजेता बैल्जियम से एक मैच जीता और एक हारा उससे आज भारत विश्व रैंकिंग में चौैथे स्थान पर है। 1980 के बाद यह पहला अवसर है जब भारत इस स्थान पर है। इस बीच कप्तान मनप्रीत को विश्व का सर्वश्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी घोषित किया जाना टीम के मनोबल को बढ़ा रहा है।

नज़र स्वर्ण पदक पर क्यों नहीं?

पिछले समय से हॉकी में जो नया खून आया है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो सफलता भारत को मिल रही है, उसके बावजूद आज तक किसी अधिकारी या कप्तान का यह बयान नहीं आया है कि वे स्वर्ण पदक जीतेंगे। बस सेमीफाइनल खेलने की बात करते हैं। ओलंपिक में हर मैच फाइनल जितना ही कठिन होता है। यदि आप सेमीफाइनल खेलने में सक्षम है तो उसे जीतने में भी समर्थ हैं। यदि सेमी फाइनल जीता जा सकता है, तो फिर फाइनल क्यों नहीं? बात केवल मानसिकता है। इसके बारे में टीम के कोच रीड को सोचना होगा। भारत ने बहुत से मैच केवल इसलिए हारे हैं। क्योंकि वह जीतने के लिए मानसिक तौर तैयार नहीं था। भारत के युवा और अनुभवी खिलाड़ी हैं, यदि मनदीप सिंह, आकाशदीप, रमनदीप जैसे खिलाड़ी हमला बनाते समय ‘डी’ मेें अपने दिमाग पर पूरा संतुलन रखें तो कोई वजह नहीं गोल न हो सके। इसी प्रकार रूपिंदर पाल, सुरेंद्र कुमार और कोठाजीत सिंह और हरमनप्रीत जैसे डीप डिफेंस के खिलाड़ी विपक्षी हमले के समय शान्त और सतर्क रहें, तो किसी भी हमले को टाला जा सकता है। इनमें विश्वास इसलिए भी होना चाहिए क्योंकि गोल में पीआर श्रीजेश या कृष्ण पाठक जैसे गोल रक्षक तैनात रहेंगेे। हाफ लाइन शुरू से भारत की ताकत रही है। इसमें कप्तान मनप्रीत के साथ चिंगलेनसाना, हार्दिक सिंह, सुमित और नीलकांत जैसे खिलाड़ी मौज़ूद हो सकते हैं। विरेंद्र लाकड़ा और अमित रोहदास भी रक्षा पंक्ति को मजबूती देने में सक्षम हैं। इस तरह कागज़ पर भारतीय खिलाड़ी किसी भी कमज़ोर नहीं हैं।

इतिहास दोहराना होगा

इस हॉकी टीम पर देश का गौरव वापिस लाने की ज़िम्मेदारी है। 1980 में स्वर्ण पदक जीतने के बाद 1982 की दिल्ली एशियाई खेलों में टीम का प्रदर्शन काफी निराशाजनक था। 1984 के लॉस एंजिलेस ओलंपिक में ज़फा इकबाल के नेतृत्व में गयी टीम ने अमेरीका (5-1), मलेशिया (3-1) और स्पेन (4-3) पर जीत दर्ज की लेकिन आस्ट्रेलिया से 2-4 से हार कर व जर्मनी से 0-0 ‘ड्रा’ खेल कर सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गयी। अंत में उसे पाँचवें स्थान पर संतोष करना पड़ा। यहाँ पाकिस्तान से अपना तीसरा स्वर्ण पदक जीता। 1988 के सियोल ओलंपिक में भी कहानी में कोई अंतर नहीं दिखा सोवियत यूनियन जैसी टीम से 0-1 से हारने से शुरूआत करने वाली भारतीय टीम दक्षिण कोरिया को 3-1 से और कनाडा को 5-1 से हराने में तो सफल रही पर ब्रिटेन से 0-3 से हार गयी और जर्मनी के साथ 1-1 से ‘ड्रा’ खेल कर पदक की दौड़ से बाहर हो गयी। क्लासीफिकेशन मैचों में भारत ने अर्जेटीना के साथ 6-6 से ‘ड्रा’ खेला और पेनाल्टी स्ट्रोक्स में 4-3 की जीत दर्ज कर 05वें स्थान के लिए खेलने की भागेदार बनी पर यहाँ पर पाकिस्तान से 1-2 से हार कर छठे स्थान पर चली गयी। इस प्रकार उसने अपना पाँचवाँ स्थान भी खो दिया।

टीम में यह गिरावट 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक में भी जारी रही। परगट सिंह के नेतृत्व मेें खेल रही भारतीय टीम अपने पहले ही लीग मैच में जर्मनी से 0-3 से पिट गयी। फिर उसने अर्जेंटीना से 1-3 से और आस्ट्रेलिया से 0-1 से हार क रवह केवल पाँच से आठवें स्थान के मैच खेलने लायक ही रह गयी। इनमें भी वह स्पेन से 0-2 से हार गयी, पर न्यूज़ीलैंड को 3-2 से हरा कर सातवाँ स्थान ही ले पायी।

अटलांटा (1996) का ओलंपिक भारत की रैंकिंग को और नीचे ले गया। इस ओलंपिक से पूर्व भारत एक विवाद में भी घिर गया था। आरोप था कि ओलंपिक क्वालीफाइंग ट्रर्नामेंट में कनाडा को बाहर रखने के लिए भारत और मलेशिया ने जानबूझकर गोल रहित मैच खेला। इस ‘ड्रा’ के कारण मलेशिया की टीम ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर गयी। भारतीय टीम के कोच सेड्रिक डीसूजा इस बात पर सख्त खफा थे। टीम पर भी इसका दबाव था पर यहाँ टीम ने लीग का केवल एक ही मैच हारा वह भी अर्जेंटीना से 0-1 के स्कोर पर। उसने जर्मनी के साथ 1-1 से ‘ड्रा’ और पाकिस्तान के साथ भी 0-0 से ड्रा खेला। उसने दो मैच जीते भी पहला अमेरीका के साथ 4-0 से और दूसरा स्पेन से 3-1 से लेकिन क्लासीफिकेशन मैचों में कोरिया और ब्रिटेन से हारने के बाद भारत की टीम आठवें स्थान पर खिसक गयी।

भारत के लिए सेमीफाइनल मेें प्रवेश का सबसे अच्छा मौका 2000 के सिडनी ओलंपिक में आया था। रमनदीप सिंह के नेतृत्व में भारत ने लीग के दो मैच जीते दो ‘ड्रा’ रहे और वह केवल एक मैच हारे। यहाँ विंडम्बना यह थी कि आस्ट्रेलिया और पोलैंड के िखलाफ दोनों ही मैचों में भारत अंतिम दो मिनट तक जीत रहा था। आस्ट्रेलिया के िखलाफ वह 2-1 से आगे था और पोलैंड के िखलाफ 1-0 से। दोनों ही मैचों में भारत के बाएँ फ्लैक से आगे ‘थ्रू’ पास द्वारा विपक्षी टीमों ने राइट इन की पोजीशन से गोल किए। ऐसा लगता था जैसे एक गोल दूसरे का ‘री प्ले’ हो। यहाँ भारत को सातवाँ स्थान मिला।

अगला ओलंपिक 2004 में ओलंपिक खेलों की जन्मस्थली एथेन्स में हुए। पर यहाँ भी भारत का भाग्या नहीं बदला। यहाँ भारत अपने तीन लीग मैच हार गया। वह नीदरलैंड्स से 1-3 से, आस्ट्रेलिया से 3-4 से और न्यूज़ीलैंड से 1-2 से हारा। अर्जेंटीना के साथ वह 2-2 से बराबर रहा। उसने केवल एक मैच जीता वह भी दक्षिण अफ्रीका से जिसे उसने 4-2 परास्त किया। लीग में उसने 11 गोल किए और 13 खाए इस प्रदर्शन के साथ भारत को फिर सातवें स्थान पर संतोष करना पड़ा।

इस बीच टीम की हालत इतनी खराब हो गयी कि वह 2008 ओलंपिक के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर पायी। इसके बाद कई बदलाव हुए और आिखर 2012 के लंदन ओलंपिक में वह खेलने गयी। पर हालात खराब ही थे। यहां उसने अपने सभी लीग मैच हारे। पहले वह नीदरलैंड्स से 2-3 से, फिर न्यूजीलैंड से 1-3 से, जर्मनी से 2-5 से दक्षिण कोरिया से 1-4 से बेल्जियम से 0-3 से परास्त हुए। इतना ही नहीं क्लासीफिकेशन मैच में भी टीम दक्षिण अफ्रीका से 2-3 से हार गयी। इस टूर्नामेंट में भारत ने कुल आठ गोल किये और 20 खाये। यहाँ भारत 12 टीमों में 12वें स्थान पर रहा। इससे पूर्व 1986 के लंदन विश्वकप में भी भारत सबसे निचले स्थान पर था। इतना होने के बाद भी टीम से सुधार हो रहा था कोच बदले गये नये खिलाड़ी आये। टीम ने कुछ अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में कुछ सफलताएँ हासिल कीं और 2016 के रिये, ओलंपिक में टीम काफी उत्साह से गयी। अब उसके पास खोने को कुछ नहीं था। लीग के पहले मैच में उसने आयरलैंड का 3-2 से परास्त किया। पर जर्मनी से 1-2 हार गयी। फिर उसने अर्जेंटीना को 2-1 से हटाकर आस बँधाई पर नीदरलैंड्स से 1-2 की हार और कनाडा से 2-2 के ‘ड्रा’ ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस प्रकार भारत ने पूल के पांच मैचों में  से दो जीते, एक ड्रा किया और दो हारे और सात अंक हासिल कर ग्रुप में चौथा स्थान पाया। इस दौरान उसने नौ गोल किये और नौ ही खाये। पर वह क्वार्टरफाइनल में प्रवेश कर गयी। उम्मीद भी केवल जीत की। लेकिन अंत में रजत पदक विजेता बनी बेल्जियम ने क्वार्टरफाइनल में भारत को 3-1 से हरा कर उसका सपना तोड़ दिया। ध्यान रहे कि इस मैच में पहला गोल भारत ने 15वें मिनट में ही कर दिया था। दूसरे क्वार्टरफाइनल में नीदरलैंड्स ने आस्ट्रेलिया को 4-0 से, अर्जेंटीना ने स्पेन को 2-1 से और जर्मनी ने न्यूजीलैंड को 3-2 से हरा कर अंतिम चार में प्रवेश किया था। इन ओलंपिक खेलों में नया इतिहास बना, जबकि नीदरलैंड्स और जर्मनी सेमीफाइनल से परास्त हो गए। नीदरलैंड्स को बेल्जियम ने 3-1 से और जर्मनी को अर्जेंटीना ने 5-2 से हराया। इस प्रकार 1900 से चली ओलंपिक हॉकी में पहली बार अमेरीकी उपमहाद्वीप की कोई टीम फाइनल मेें पहुंची थी। दूसरी ओर बेल्जियम भी पहली बार ही फाइनल में था। फाइनल में अर्जेंटीना ने बेल्जियम को 4-2 से हरा कर स्वर्ण पदक जीता जबकि नीदरलैंड्स ने जर्मनी को परास्त कर कांस्य पदक पाया। भारत आठवें स्थान पर रहा। 2020 का यह ओलंपिक भारतीय हॉकी के लिए नया अध्याय लिख सकता है। टीम में जोश है और पूरी टीम फार्म में नज़र आ रही है। भारत को अपना पहला मैच न्यूजीलैंड के साथ खेलना है। अगला मुकाबला 236 जुलाई को विश्व चैंपियन आस्ट्रेलिया के साथ, 28 जुलाई को स्पेन के साथ, 30 जुलाई को पिछले विजेता अर्जेंटीना के साथ और 31 जुलाई को मेजवान जापान के साथ होगा।