इसी महीने आयेगी फिल्म ‘यहाँ सभी ज्ञानी हैं’

फिल्मों के शौकीनों को गुदगुदायेगा कानपुरिया अभिनय

इन दिनों स्थानीय भाषाओं में लिखे डायलॉग्स और कहानियों का दर्शक मंत्रमुग्ध होकर लुत्फ ले रहे हैं। दरअसल, ये स्थानीय भाषाएँ हल्की चुटीली और मज़ेदार भी लगती हैं। कानपुर की खास खड़ी बोली भी इसी तरह की भाषा है। पहले भी कानपुर की भाषा और कहानियों पर कई फिल्में बन चुकी हैं; लेकिन इस बार कानपुर के खास डायलॉग ‘यहाँ सभी ज्ञानी हैं’ पर फिल्म आ रही है। यह फिल्म 31 जनवरी, 2020 को लॉन्च हो रही है।

हाल ही में इस फिल्म का ट्रेलर शानदार अंदाज़ में लॉन्च कर दिया गया। यह अतुल श्रीवास्तव, नीरज सूद व अपूर्व अरोड़ा द्वारा अभिनीत फिल्म है। ट्रेलर लॉन्च इवेंट पार्टी में अतुल श्रीवास्तव, नीरज सूद, अपूर्व अरोड़ा, मीना नाथानी, अनंत नारायण त्रिपाठी, सिद्धार्थ शर्मा और ज्योति शर्मा मौज़ूद रहे। अतिथियों में सौरभ शुक्ला, पार्थो घोष और सिद्धार्थ शुक्ला भी शामिल हुए। इस शानदार पार्टी में अतुल श्रीवास्तव और नीरज सूद ने मज़ेदार कनपुरिया नाटक मीडिया और दर्शकों के सामने लाइव परफॉर्म करके सबको हँसाया और फिर लाइव म्युजिक ने समा बाँध दिया। उसके बाद पूरी टीम मीडिया से रू-ब-रू हुई।

इस फिल्म को अल्टीरियर विज़न प्रोडक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले और फ्यूचर िफल्म्स की साझेदारी में बनाया गया है। इस फिल्म के निर्माता हैं सिद्धार्थ शर्मा, तो वहीं इसे को-प्रोड्यूस ज्योति शर्मा ने किया है। इस फिल्म का संवाद लेखन, इसकी कहानी लिखने के अलावा इस फिल्म का निर्देशन भी अनंत नारायण त्रिपाठी ने किया है। उन्होंने ज्योति शर्मा के साथ मिलकर इस फिल्म का स्क्रीनप्ले भी लिखा है।

इस फिल्म का सम्पादन राजेश पांडे और इसकी सिनेमाटोग्राफी शिरीष देसाई ने की है। फिल्म का संगीत दिया है साधु तिवारी ने और इस फिल्म के कुछ गीत भी उन्होंने गाये हैं। फिल्म के गाने रोहित शर्मा ने लिखे हैं और निशांत सलील ने इसका पाश्र्वसंगीत दिया है। इस फिल्म में नीरज सूद, अतुल श्रीवास्तव और अपूर्वा अरोड़ा जैसे लोकप्रिय चेहरे अहम िकरदारों में नज़र आएँगे, जो अपने उम्दा अभिनय के लिए जाने जाते हैं। ये कलाकार सलमान खान, अक्षय कुमार और आयुष्मान खुराना जैसे बड़े सितारों के साथ काम कर चुके हैं। बहरहाल, इस फिल्म में विनीत कुमार, मीना नथानी, गुलिस्ता, राधे श्याम दीक्षित, मंजू गुप्ता, शशि रंजन भी अहम िकरदारों में नज़र आएँगे।

कानपुर में शूट हुई यह फिल्म एक कॉमेडी-ड्रामा है, जो कि पप्पू तिवारी (अतुल श्रीवास्तव) और उनके परिवार की अजीबोगरीब परेशानियों पर बनी है। अपनी सम्पत्ति बेचने के बाद पप्पू और उसकी डिस्फंक्शनल फैमिली की माली हालत पहले से कहीं बेहतर हो जाती है। अब महज़ विरासत में मिली एक ही सम्पत्ति बची होने की वजह से उनके सिर पर आॢथक संकट मंडरा रहा होता है। ऐसे में पप्पू के मन में विरासत में मिली अपनी सम्पत्ति को अच्छी कीमत पर बेच देने का खयाल आता है। मगर जब यह खयाल उनके ज़ेहन में आता है, तो उनकी दिवंगत अम्माजी उनके सपने में आकर उन्हें सताने लगती है। इस बात का कोई ओर-छोर नहीं समझ पाने के बाद एक दिन वह पारिवारिक पंडित के पास जाते हैं। यहाँ पप्पू को बताया जाता है कि उनकी कुंडली में पूर्वजों की छिपी हुई सम्पत्ति हासिल करने का योग लिखा हुआ है। ऐसे में उसे अब इस बात का एहसास होता है कि उनकी अम्माजी उस वक्त क्या कहना चाहती थीं। इस खबर को सुनने के बाद उनका पूरा परिवार खुशी से झूम उठता है। करोड़पति बनने के खयाल के मद्देनज़र वो सम्पत्ति से जुड़े तमाम ऑफर को ठुकरा देता है। इस खुशहाल माहौल में पंडितजी उनकी बेटी गोल्डी के लिए कानी के बेटे राकेश के साथ शादी का रिश्ता ले आते हैं। कानी शहर का नवधनाढ्य िकस्म का शख्स है, जो हाल ही में राजनीति से जुड़ा है। मगर कानी दहेज की माँग करके पप्पू को एक बड़ी मुश्किल में डाल देता है। पप्पू यह सोचकर उनकी हर माँग मान लेता है कि उनके इस त्याग का सिला उसे उस वक्त मिल जाएगा, जब उसे अपने बेटे के लिए दहेज माँगने का मौका मिलेगा।

इस एक घटना से पप्पू और उसके परिवार को ऐसा लगने लगता है कि अम्माजी की आत्मा गोल्डी में आ गयी है, ताकि उन्हें अपने पूर्वजों की सम्पत्ति ढूँढने में मदद मिल सके। लेकिन धन नहीं मिलता। शादी की तारीख करीब आ जाती है, कर्ज़ का पैसा वापस माँगने वालों का ताँता लग जाता है। रियल एस्टेट की कीमत गिर जाती है और इस तरह दहेज की माँग पूरी नहीं होती है। तब जाकर इस परिवार को सबक मिलता है कि उसके पास जो असली सम्पत्ति थी, उसे उसने पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया। इस फिल्म की शूटिंग कानपुर, उत्तर प्रदेश और मुम्बई के विभिन्न लोकेशन्स पर पूरी की जा चुकी है।

जैसा कि सभी जानते हैं कि कई बॉलीवुड फिल्में उत्तर प्रदेश की स्थानीय भाषा और कलेवर से प्रेरित होकर बनी हैं और बन रही हैं। हाल ही की कुछ िफल्मों, जैसे- ‘लुका छुपी’, ‘बाला’, ‘पति पत्नी’ और ‘वो’ ने बॉक्स ऑिफस पर धाक जमायी है। ऐसे ही एक और बॉलीवुड फिल्म ‘यहाँ सभी ज्ञानी हैं’ आने वाली है, जो कि कानपुर के एक परिवार की कहानी है। कानपुर अपनी खड़ी बोली और देशी भाषा के लिए जाना जाता है।

डायलॉग्स को लेकर सेट पर ही हुई थी तकरार

शूट के दौरान फिल्म के लेखक/निर्देशक अनंत नारायण त्रिपाठी और मुख्य अभिनेता अतुल श्रीवास्तव के बीच डायलॉग में इस्तेमाल की जा रही अभद्र भाषा को लेकर सेट पर खासी तकरार हो गयी। दरअसल, एक सीन में पप्पू तिवारी यानी कि अतुल श्रीवास्तव को बेहद गुस्सा आते ही तुरन्त गाली देनी होती है। अभिनेता अतुल श्रीवास्तव ने फिल्म में अब्यूजिव डायलॉग बोलने से इन्कार कर दिया। इसी सीन के कारण फिल्म के लेखक/निर्देशक अनंत नारायण त्रिपाठी और अतुल श्रीवास्तव में बहस शुरू हो गयी कि गाली का इस्तेमाल इस डायलॉग में ज़रूरी है या नहीं; लेकिन अतुल अपनी बात पर डटे रहे कि गुस्से का इज़हार अलग ढंग से बिना गाली बोले भी किया जा सकता है। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे और इस विवाद के कारण अंत में अतुल सेट छोडक़र चले गये। नीरज सूद जो कि फिल्म में लड्डू (पप्पू तिवारी का साला) का रोल निभा रहे हैं, उन्होंने बताया कि मुझे लगा कि फिल्म कैंसिल हो जाएगी या फिर अतुल जी के रोल के लिए किसी और कलाकार को लाया जाएगा। सेट के माहौल को देखते हुए उस दिन शूट रोक दिया गया और अगले दिन अतुल सेट पर नहीं आये, तो दूसरे सीन का शूट किया गया

निर्देशक के कुछ कानपुर में चूँकि खड़ी बोली आमतौर पर बोली जाती है। ‘यहाँ सभी ज्ञानी हैं’ के लेखक और निर्देशक अनंत के मुताबिक, फिल्म में स्क्रिप्ट के हिसाब से वो डायलॉग ज़रूरी थे, जबकि अतुल श्रीवास्तव के मुताबिक उन्हें कानपुर की बोली के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करना कहीं से भी सही नहीं लग रहा था। इसी गर्मागर्मी में अतुल सेट छोडक़र चले गये और शूट बन्द करना पड़ा। अतुल श्रीवास्तव ने कहा, मुझे नहीं लगता कि कानपुर की बोलचाल दिखाने के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करना ज़रूरी है। ये फिल्म एक फैमिली ड्रामा हैं और मेरे हिसाब से साफ-सुथरी कॉमेडी फिल्में ज़्यादा अच्छी होती हैं; क्योंकि हर उम्र के लोग इसे साथ बैठकर देख सकते हैं।

आखिर में काफी बहस के बाद ऐसा लगा कि फिल्म का नया लीड मिलने तक फिल्म निर्माण को कुछ दिनों के लिए रोकना होगा; लेकिन अनंत और अतुल ने सोचा कि आपस में दोबारा बैठ के शान्ति से मसला हल किया जाना चाहिए। तब दोनों एक बार फिर आपस में बैठे और एक-दूसरे की बात को समझने की कोशिश की। अनंत ने अपनी भूल को मानते हुए कहा- ‘चूँकि मैं फिल्म का लेखक भी हूँ और कभी-कभी लेखक होने के कारण अपने लिखे शब्दों से लगाव हो जाता है। इस वजह से मुझे लगा कि फिल्म की भाषा भी यहाँ की खड़ी बोली मूल भाषा जैसी ही होनी चाहिए। लेकिन जब अतुल ने मुझे समझाया कि अपनी बात कहने के लिए गाली का इस्तेमाल ज़रूरी नहीं है और ये एक फैमिली ड्रामा है, जिसे हम चाहेंगे कि हर वर्ग के लोग देख सकें। मैंने उनकी सारी बात एक निर्देशक के रूप में सुनी और मुझे उनकी बात सही लगी।’ जिस सीन के करण इतना विवाद हुआ उसे दोबारा लिखने में अनंत को पाँच घंटे लगे और पूरी फिल्म का शूट 25 दिनों में पूरा हो गया। हालाँकि, ये आपस का विवाद एक तरह से प्रोजेक्ट के लिए अच्छा ही साबित हुआ; क्योंकि फिल्म को सेंसर बोर्ड से यू सर्टििफकेट आसानी से मिल गया।