आख़िर सरकार की आँखों में क्यों खटक रहा किसान आन्दोलन?

महामारी से निपटने में नाकाम केंद्र सरकार किसानों से निपटने के लिए कड़े क़दम उठाने की दे चुकी है चेतावनी

कोरोना वायरस का हौवा लोगों के दिमाग़ में इस क़दर घर कर गया है कि इसके अलावा किसी को कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा है। लेकिन दोबारा तेज़ीसे बढ़ती इस महामारी की आड़ में कई बड़े आन्दोलनों को ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। बता दें कि सन् 2019 में सीएए के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ के आन्दोलन को भी मौज़ूदा सरकार ने कोरोना का डर दिखाकर ही ख़त्म किया था। किसान आन्दोलन इन दिनों का सबसे बड़ा आन्दोलन है, जिसे कुचलने के लिए सरकार हर सम्भव प्रयास करती रही है। लेकिन अब उसने साफ़ कर दिया है कि किसान आन्दोलन को ख़त्म किया जाएगा, जिसके लिए वह कोरोना फैलाने का आरोप भी किसानों के सिर पर मढ़ चुकी है। लेकिन किसान भी पीछे हटने वाले नहीं हैं और साफ़ कर चुके हैं कि जब तक सरकार तीनों नये कृषि क़ानूनों को वापस नहीं ले लेती, तब तक आन्दोलन ख़त्म नहीं होगा।बहादुरगढ़ के टीकरी बॉर्डर, सिंघु बॉर्डर और ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों का धरना जारी है। लॉकडाउन की वजह से अपने घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूरों को भोजन करा रहे हैं। पिछले दिनों टीकरी बॉर्डर पर किसानों ने धन्ना सेठ जाट का जन्मदिवस मनाया और देशवासियों से किसान आन्दोलन में मदद देने की अपील की।

सरकार इस बात को अच्छी तरह समझ चुकी है कि ख़ाली आश्वासनों से किसान आन्दोलन को ख़त्म नहीं किया जा सकता। इधर यूपी गेट पर ग़ाज़ीपुर किसान आन्दोलन कमेटी सरकार को कड़ा सन्देश दे चुकी है कि वह किसानों के ख़िलाफ़ कितने भी षड्यंत्र कर ले, लेकिन आन्दोलन ख़त्म नहीं होने वाला। ग़ाज़ीपुर किसान आन्दोलन कमेटी के प्रवक्ता जगतार सिंह बाजवा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आन्दोलन को समाप्त करने का षड्यंत्र कर रही है।

इस जवाब के लिए आन्दोलन स्थल पर किसानों की संख्या बढ़ायी जा रही है। किसानों का कहना है कि सरकार भले ही हमारा आन्दोलन ख़त्म करने की साज़िश कर रही है, लेकिन हमारा संघर्ष जारी रहेगा। लेकिन सरकार अपनी ज़िद छोडक़र पिछले लॉकडाउन में चुपके से बनाये कृषि क़ानूनों को ख़त्म भी नहीं करना चाहती और यही वजह है कि वह किसान आन्दोलन को अब कुचलने की फ़िराक़ में है। सरकार ने कई किसानों के ख़िलाफ़ गुपचुप तरीक़े से क़ानूनी कार्रवाई भी की है। लेकिन किसान आन्दोलन गाँवों में फैल चुका एक ऐसा आन्दोलन बन गया है, जैसे कि अंग्रेजों से लड़ाई के ख़िलाफ़ गाँवों में कई जागृति आन्दोलन पनपने लगे थे। किसानों ने साफ़ किया है कि फ़सलों की कटाई के बाद वे एक बार फिर दिल्ली की सीमाओं पर जमा होंगे। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत पूरी तरह से किसान आन्दोलन पर ध्यान दे रहे हैं। किसान आन्दोलन की मज़बूती यह है कि इसे किसान परिवारों महिलाओं और समाज के हर वर्ग और हर क्षेत्र से नामचीन लोगों के साथ-साथ आम लोगों का भरपूर समर्थन प्राप्त है, यही वजह है कि मुख्यधारा की मीडिया के इस आन्दोलन को न दिखाने के बावजूद यह बढ़ता ही जा रहा है।

कृषि प्रधान देश की विडम्बना
खेती दुनिया की अर्थ-व्यवस्था का मूल स्रोत है। बिना खेती के न तो जीवन की कल्पना की जा सकती है और न ही व्यापार चल सकता है। क्योंकि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है, इसलिए यहाँ तो इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। लेकिन फिर भी बहुत-से लोग यहाँ पेट भर खाने, रोज़गार और तमाम तरह की मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते हैं। यहाँ तक कि ख़ुद हमारे देश के किसान दु:खी रहते हैं। देश की गिरती जीडीपी को पटरी पर लाने का काम खेती करके किसान ही कर सकते हैं और किसानों को ही सरकार कमज़ोर करने में लगी है। अगर खेती ही नहीं रहेगी, तो दूसरे काम-धन्धे कैसे चल सकेंगे? ताज्जुब है कि सन् 1950 के दशक में जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान जहाँ 50 फ़ीसदी था, वहीं 2015-16 में यह गिरकर 15.4 फ़ीसदी रह गया। यह तब हो रहा है, जब सन् 1950 से कृषि खाद्य उत्पादन बढक़र तक़रीबन पाँच गुना हो गया है। ऐसा अनुमान है कि साल 2025 तक देश की आबादी का पेट भरने के लिए 300 मिलियन (30 करोड़) टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। लेकिन अगर खेती को ही ख़त्म करने की साज़िशें की जाएँगी, तो यह लक्ष्य कैसे हासिल हो सकेगा?

क्या दिल्ली को फिर घेरेंगे किसान?
सरकार को इस बात का डर है कि अगर किसानों ने दोबारा दिल्ली को घेरा, तो क्या होगा? शायद यही वजह है कि उसने कोरोना की आड़ लेकर किसान आन्दोलन को ख़त्म करने का मन बना लिया है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या किसान फिर से दिल्ली को उसी तरह घेरेंगे, जिस तरह उन्होंने पिछले साल गर्मी, बारिश और सर्दी भर दिल्ली को घेरे रखा? अगर ऐसा होता है, तो फिर सरकार के लिए इस आन्दोलन को ख़त्म करना नामुमकिन हो जाएगा; लेकिन अगर ऐसा किसान नहीं कर सके, तो इस आन्दोलन को ख़त्म करने में सरकार कामयाब हो सकती है। हालाँकि भारतीय किसान यूनियन (उग्राहां) इस बात का ऐलान कर चुकी है कि किसान आन्दोलन ख़त्म नहीं होगा और एक बार फिर से दिल्ली का घेराव किया जाएगा। जल्द ही हज़ारों किसान पंजाब-हरियाणा के खनौरी बॉर्डर पर इकट्ठे होंगे और वहाँ से किसानों का जत्था जींद व रोहतक होते हुए टीकरी बॉर्डर पहुँचेगा।

खेती बिन सब सून
जीवन जीने के लिए जितनी ज़रूरत हवा पानी की है, उतनी ही खाने की। खाने का 85 फ़ीसदी हिस्सा खेती से ही मिलता है। इसलिए खेती बिना सब कुछ सूना हो जाएगा। दुनिया का ऐसा कोई मनुष्य नहीं, जो कृषि उत्पादों पर निर्भर न हो, लेकिन फिर भी कई लोग इसका महत्त्व नहीं समझते और किसान आन्दोलन को ग़लत ठहराने में लगे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि किसान देश के अन्नदाता हैं और इस सच्चाई से किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए। खेती से केवल लोगों का पेट ही नहीं भरता, बल्कि हरेक कामधंधा इसी से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ा है। ग़ौर करने वाली बात है कि कोरोना वायरस के दोबारा फैलने और सरकार द्वारा लॉकडाउन लगाने का यह वही समय है, जो कि पिछले साल था। पिछले साल भी रवि की फ़सलें कटाई के लिए खेतों में तैयार खड़ी थीं और लॉकडाउन लगाया गया था, जबकि इस बार भी रवि की फ़सलों, ख़ासकर गेहूँ की कटाई के दौरान ही लॉकडाउन लगाया गया। यह अलग बात है कि यह लॉकडाउन पूरे देश में नहीं लगाया गया है, क्योंकि देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव चल रहे थे। किसानों और दूसरे लोगों ने सवाल भी उठाये कि इन राज्यों में लाखों लोगों की भीड़ जुटाकर ख़ुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने चुनावी रैलियाँ, जनसभाएँ कीं। क्या वहाँ कोरोना नहीं फैला? लेकिन किसी ने इसका जवाब नहीं दिया। यह पहली बार है, जब कोई सरकार यह कहकर किसानों पर क़ानून थोप रही है कि ये क़ानून उनके हित में हैं; जबकि वह उन पर न तो खुलकर चर्चा करने को तैयार है और न ही किसानों के मना करने पर पीछे हटने को ही तैयार है।

किसानों के ख़िलाफ़ ग़लत प्रचार
सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक सरकार किसानों के ख़िलाफ़ कई बार ग़लत प्रचार कर चुकी है। हाल ही में दिल्ली से भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा ने आरोप लगाया कि किसान ऑक्सीजन की सप्लाई रोक रहे हैं, जिसके चलते ऑक्सीजन के टैंकरों को काफ़ी घूमकर आना पड़ रहा है, जिसकी वजह से दिल्ली में कोरोना मरीज़ों की जान जा रही है। इसके बाद आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने ऑक्सीजन टैंकर के ड्राइवर के बयान वाले वीडियो के साथ ट्वीट करके मामले को साफ़ किया। इस वीडियो टैंकर का ड्राइवर साफ़ कह रहा है कि किसानों ने कहीं भी टैंकर को न तो रोका और न उनकी वजह से टैंकर कहीं जाम में फँसा। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता और किसान नेता राकेश टिकैत ने भाजपा सांसद के झूठी अफ़वाह फैलाने को अफ़सोसजनक बताते हुए कहा है कि किसानों की वजह से कभी भी किसी को भी कोई दिक़्क़त नहीं हो रही है, तो फिर मरीज़ों के ऑक्सीजन टैंकर रोकने का तो सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार किसानों को बदनाम कर रही है।

बता दें कि पिछले दिनों दिल्ली स्थित बालाजी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी हो गयी थी। आनन-फ़ानन में दो ऑक्सीजन टैंकरों को मँगाया गया, जो ट्रैफिक जाम के चलते कुछ फँसे थे, लेकिन इसमें किसानों की कोई भूमिका नहीं थी। पुलिस ने भी स्पष्ट किया कि ट्रैफिक जाम के कारण बॉर्डर पर ऑक्सीजन के टैंकर फँसे हुए थे, लेकिन ग्रीन कॉरिडोर बनाकर उन्हें वहाँ से निकाल दिया गया। गैस सप्लायर्स किसान आन्दोलन के चलते दो से तीन घंटे का समय बर्बाद होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन हमने अपनी पड़ताल में पाया कि किसानों की वजह से कोई अड़चन नहीं आ रही है। किसान किसी के लिए भी रुकावट और परेशानी का कारण नहीं बन रहे हैं। बड़ी बात यह है कि पंजाब के कई किसान कोरोना के मरीज़ों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडरों का इंतज़ाम भी कर रहे हैं। यहाँ याद दिला दें कि ये वही किसान हैं, जिन्हें केंद्र सरकार में कई मंत्रियों ने ख़ालिस्तानी और आतंकवादी कहा था। लेकिन हमेशा देखा गया है कि सिख समुदाय और इस समुदाय के किसान किसी भी आपदा में पीडि़तों की मदद के लिए सबसे आगे खड़े मिलते हैं।

किसानों में मतभेद का सच
इधर एक अफ़वाह यह भी फैलायी जा रही है कि किसानों में मतभेद पैदा हो रहा है। यह अफ़वाह पहले भी कई बार फैलायी जा चुकी है। सरकार कई बार दावा कर चुकी है कि जो वास्तव में किसान हैं, वो कृषि क़ानूनों के समर्थन में हैं। यह भी कहा जा रहा है कि किसान संगठनों में बहुत मतभेद है। यह कोई बड़ी बात नहीं कि जब बहुत बड़ी संख्या में लोग एक ख़ास मुद्दे को लेकर किसी मज़बूत संस्था से लड़ते हैं, तो उन्हें तोडऩे की कोशिशें की जाती है। यहाँ तो किसान सीधे सरकार से लड़ रहे हैं। ऐसे में यह सम्भव ही नहीं कि उन्हें तोडऩे की कोशिशें न हों। कुछ सरकार के पक्षधर ख़ुद को किसान बताकर इस तरह के बयान भी दे रहे हैं कि वे कृषि क़ानूनों से संतुष्ट हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे वास्तव में किसान हैं? क्योंकि अभी तक वास्तविक किसानों ने कहीं भी यह नहीं कहा है कि वे नये कृषि क़ानूनों से ख़ुश हैं। ऐसे में किसानों के मतभेद की बात महज़ अफ़वाह लगती है। संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) और भारतीय किसान यूनियन दोनों ने यह साफ़ कर दिया है कि किसानों की माँगें पूरी होने के बाद ही वे आन्दोलन ख़त्म करेंगे।

एसकेएम ने कहा है कि सरकार को कोरोना वायरस से लडऩा चाहिए, किसानों से नहीं। लेकिन इतने पर भी सरकारी तंत्र, सत्ता पक्ष के नेता किसान संगठनों के मुख्य और चर्चित नामों राकेश टिकैत और गुरनाम सिंह चढ़ूनी पर किसानों को बरगलाने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों ने केंद्र सरकार पर तीन विवादास्पद कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे आन्दोलन को ख़त्म करने के लिए कोरोना वायरस का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। किसानों द्वारा संसद मार्च निकालने के सवाल पर संयुक्त किसान मोर्चा ने बताया कि प्रस्तावित संसद-मार्च की तारीख़ अभी तय नहीं है, लेकिन देश के किसान एक बार फिर दिल्ली की ओर कूच करेंगे। इसके अलावा 10 मई को देश भर से किसान संगठन किसान आन्दोलन के हितैषी मज़दूरों, विद्यार्थियों, युवाओं और अन्य लोकतांत्रिक संगठनों के प्रतिनिधियों का एक विशेष सम्मेलन आयोजित करेंगे; ताकि किसान आन्दोलन को और मज़बूत किया जा सके।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी है।)