हरेक बात पे कहते हो तुम कि…

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विरोधाभासों का यह सिलसिला जस्टिस काटजू के वर्तमान कार्यकाल में दिए हाल के बयानों में भी दिखता है. एक तरफ वे सचिन तेंदुलकर के सौवें शतक और देव आनंद की मौत को टीवी पर ज्यादा समय दिए जाने का पुरजोर विरोध करते हैं तो दूसरी तरफ सन्नी लिओन के समर्थन में उतरते हुए भी नजर आते हैं. इन तमाम बातों के बाद भी आप एक बात तो उनके बारे में मान ही सकते हैं कि जस्टिस काटजू एक ऐसी लहर है जो हमेशा मुख्यधारा के विपरीत ही बहती है. जब सारा देश अन्ना हजारे के पीछे होता है तो वे इसके विपरीत बात करते हैं. जब दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार पर देश के युवा सड़कों पर लाठियां खाते हैं तो वे कहते हैं कि इनके लिए बलात्कार ही देश की सबसे बड़ी समस्या बन गई है, जबकि हकीकत कुछ और है. वे लगभग देश में चल रही हर बहस में शामिल हैं और कई बहस तो स्वयं उनसे ही शुरू होती हैं. उनके बयान अक्सर कोई न कोई विवाद खड़ा कर ही देते हैं. इस संदर्भ में वे अपनी सफाई देते हुए लिखते हैं, ‘मैं विवादों से दूर रहना चाहता हूं. लेकिन मेरी एक कमजोरी है कि मैं देश को गिरते हुए देखकर भी शांत नहीं रह सकता. भले ही बाकी लोग गूंगे और बहरे हों लेकिन मैं नहीं हूं. इसलिए मैं तो बोलूंगा. जैसा कि फैज़ साहब ने कहा है कि बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल कि जुबां अब तक तेरी है.’  हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है, सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यं अप्रियं. इसका मतलब है कि सत्य बोलो, प्रिय बोलो लेकिन अप्रिय सत्य मत बोलो. मैं इसमें कुछ बदलाव करना चाहता हूं. आज देश के हालात ऐसे हैं कि हमें कहना चाहिए ब्रूयात सत्यं अप्रियं मतलब अप्रिय सत्य भी बोलो.’ और यह व्याख्या करते हुए उन्होंने एक ऐसा ही ‘अप्रिय सत्य’ बोल डाला कि 90 प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं. इस बयान के साथ ही जस्टिस काटजू एक बार फिर से देश भर में चर्चा का विषय बन गए. बल्कि इस बार तो लखनऊ के दो छात्रों ने उन्हें इस बयान के लिए कानूनी नोटिस भी भेज दिया. जस्टिस काटजू ने फिर सफाई देते हुए बताया कि किस आधार पर वे 90 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख बता रहे हैं .

‘अध्यक्ष बनने के बाद जस्टिस काटजू ने प्रेस परिषद को एक जुबान दे दी. आज से पहले कितने लोग होंगे जो प्रेस परिषद के बारे में जानते थे’

जस्टिस काटजू के बयानों से आप चाहें तो लखनऊ के छात्रों की तरह नाराज हो सकते हैं या फिर आप भी उन 90 प्रतिशत भारतीयों में शामिल हो सकते हैं जिन्होंने खुद को जस्टिस काटजू के 10 प्रतिशत समझदार लोगों में मानते हुए विवाद को शांत होने दिया. जस्टिस काटजू के ऐसे बयानों के बारे में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीण पारिख बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू बहुत ज्यादा बोलते हैं. अब जो व्यक्ति इतना ज्यादा बोलेगा वह विवाद तो पैदा करेगा ही. वैसे वे बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति हैं और कई मुद्दों पर उनकी जो समझ है उसका कोई मुकाबला नहीं. जस्टिस काटजू दिल के साफ हैं लेकिन बोलते बहुत ज्यादा हैं.’

बीते कुछ दिनों से जस्टिस काटजू के बारे में यह भी कहा जाने लगा है कि वे कांग्रेस के पक्षधर हैं और सिर्फ गैरकांग्रेसी सरकारों पर ही टिप्पणी करते हैं. गुजरात में हो रहे विकास को दिखावा बताते हुए उन्होंने मोदी सरकार की जमकर निंदा की है. नरेंद्र मोदी पर सवाल उठाता उनका एक लेख सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पकिस्तान के अखबार में भी छपा. इस पर भाजपा ने उन पर आरोप लगाया कि काटजू पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं. इसके साथ ही बिहार के बारे में टिप्पणी करते हुए काटजू ने लिखा कि वहां प्रेस को कुछ भी लिखने की अनुमति नहीं है और बिहार सरकार विज्ञापनों का लालच देकर वहां की प्रेस को नियंत्रित कर रही है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को तो उन्होंने यह तक कह डाला कि वे नंद वंश के आखिरी शासक घनानंद की तरह काम कर रहे हैं और यदि समय रहते वे नहीं सुधरे तो उनकी भी हालत घनानंद जैसी ही होना तय है. ऐसे बयानों पर भाजपा ने उन पर आरोप लगाए कि वे इसलिए गैरकांग्रेसी सरकारों पर हमला कर रहे हैं क्योंकि वे कांग्रेस सरकार का एहसान उतार रहे हैं. अरुण जेतली उनके बारे में कहते हैं कि कांग्रेस सरकार ने उन्हें रिटायर होने के बाद प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनाकर उपकृत किया है और वे इसी के एवज में भाजपा पर हमला कर रहे हैं. इस बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता वीएस सिंह बताते हैं, ‘काटजू कांग्रेस सरकार की भी उतनी ही निंदा करते हैं जितनी कि गैर-कांग्रेसी सरकारों की. लेकिन जब उन पर ये आरोप लगे कि वे कांग्रेस के खिलाफ नहीं बोलते और कांग्रेस के नेताओं ने जस्टिस काटजू का बचाव किया तो यह बात और ज्यादा उनके खिलाफ चली गई. लोगों को लगा कि कांग्रेस के लोग यदि काटजू का बचाव कर रहे हैं तो जरूर उनका कोई आपसी संबंध होगा.’ वैसे आप उनके कुछ बयानों में कांग्रेसी पक्षधरता देख सकते हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि उन्होंने महाराष्ट्र, दिल्ली और केंद्र की कांग्रेसी सरकार पर भी जमकर प्रहार किए हैं. बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद जब महाराष्ट्र की दो लड़कियों को सिर्फ फेसबुक पर कुछ टिप्पणी करने पर गिरफ्तार कर लिया गया था तो जस्टिस काटजू ने ही सबसे पहले इसका मुखर विरोध किया था. अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में कार्टून बनाने वाले असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी हो या अफज़ल गुरु की फांसी पर इफ्तिखार गिलानी की गिरफ्तारी, मानवाधिकार उल्लंघन के ऐसे मामलों पर सबसे पहले बोलने वालों में से काटजू भी एक बड़ा नाम रहे हैं.

जस्टिस काटजू को समझने में आप इसलिए भी भूल कर सकते हैं कि उनसे जुड़ी कई बातें शायद आप तक पहुंची ही न हों. मसलन ज्यादातर लोगों को यह तो पता है कि जून, 2011 में सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि पाकिस्तानी कैदी खलील चिश्ती को रिहा कर दिया जाए. उनका कहना था कि चिश्ती की उम्र बहुत ज्यादा है और मद्रास उच्च न्यायालय से उनका फैसला होने से पहले उनकी मृत्यु भी हो सकती है. खलील चिश्ती हत्या के आरोपित थे और कई साल से भारत में कैद थे. यह पत्र उन्होंने व्यक्तिगत हैसियत से प्रधानमंत्री को लिखा था. भाजपा ने इस बात की निंदा की. रविशंकर प्रसाद ने इस पत्र के संबंध में कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश प्रधान मंत्री से एक पाकिस्तानी कैदी की रिहाई की मांग कर रहा है. भले ही वे व्यक्तिगत हैसियत से यह पत्र भेज रहे हों लेकिन एक हत्या के आरोपी की ऐसी सिफारिश करना गलत है.’ मीडिया में भी इस पत्र की काफी चर्चा हुई. लेकिन जब इसी तरह का एक पत्र उन्होंने पाकिस्तान सरकार को एक भारतीय कैदी की रिहाई के लिए लिखा तो उसकी चर्चा न के बराबर ही हुई. 2010 में जस्टिस काटजू ने पाकिस्तान सरकार को एक पत्र लिखा था. यह पत्र गोपाल दास की रिहाई से संबंधित था जो पिछले 27 साल से पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में कैद थे. जस्टिस काटजू ने इस संबंध में कहा कि पाकिस्तान सरकार को निर्देश देना तो हमारे क्षेत्राधिकार में नहीं है लेकिन हम उनसे अपील जरूर कर सकते हैं. अपनी अपील में उन्होंने मानवता के आधार पर गोपाल दास को रिहा करने की बात कही. साथ ही उन्होंने अपने पत्र में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियों का जिक्र करते हुए लिखा, ‘कफ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो. कहीं तो बहर-ए-खुदा आज जिक्र-ए-यार चले.’ पाकिस्तान सरकार ने इस पत्र का संज्ञान लिया और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने गोपाल दास की सजा माफ़ करते हुए उन्हें रिहा कर दिया.

जब से काटजू भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष बने हैं तब से शायद ही कोई ऐसा महीना बीता हो जब उनका नाम सुर्खियों में न रहा हो. प्रेस परिषद के सदस्य राजीव रंजन नाग इसको सकारात्मक पहलू से देखते हुए बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू ने इतना तो जरूर कर दिया है कि प्रेस परिषद को एक जुबान दे दी है. आज से पहले लोग प्रेस परिषद् के बारे में कितना सुनते थे? आज आलम यह है कि हर किसी की जुबान पर जस्टिस काटजू और प्रेस परिषद का नाम है.’ राजीव जी की इन बातों से आप जस्टिस काटजू की सकारात्मक छवि देख सकते हैं या फिर प्रेस परिषद के ही एक अन्य सदस्य प्रकाश जावडेकर की बातों से आप काटजू का दूसरा पक्ष भी देखने की कोशिश कर सकते हैं. प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ‘प्रेस परिषद के अध्यक्ष के पद पर रहते हुए उनके द्वारा ऐसे राजनीतिक बयान देना उचित नहीं हैं. उन्हें यदि राजनीति करनी है तो हमें कोई परेशानी नहीं लेकिन एक अर्धन्यायिक पद पर रहते हुए उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. मुद्दा यह नहीं है कि ऐसे बयान देने पर या लेख लिखने पर कानूनन उनको रोका जा सकता है या नहीं. लेकिन क्या आपने कभी किसी न्यायाधीश को इस तरह के राजनीतिक बयान देते देखा है? वे ऐसे दोहरे मापदंड नहीं अपना सकते कि कभी कहें मैं भारतीय नागरिक होने की हैसियत से लिख रहा हूं और कभी कहें कि मैं तो भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष हूं.’

जस्टिस काटजू ने पिछले कुछ समय में लगभग हर मुद्दे पर अपनी राय रखी है. कभी उन्होंने 90 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख बताया तो कभी ममता बनर्जी को तानाशाह कहा. कभी नीतीश कुमार को घनानंद घोषित किया तो कभी कहा कि राजेश खन्ना जिंदा हैं या नहीं इससे क्या फर्क पड़ता है. कश्मीर समस्या का समाधान भी वे अलग ही तरीकों से देखते हैं. वे कहते हैं ‘इस समस्या का समाधान सिर्फ भारत-पकिस्तान विलय में है और मैं टू नेशन थ्योरी  में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता.’ उनके ऐसे बयानों से आप यह भी मान सकते हैं कि वे सिर्फ प्रचार के लिए ही ऐसे बयान देते हैं. या फिर उनके बयानों की गहराई में जाते हुए आप उनमें तर्क भी ढूंढ़ सकते हैं. जस्टिस काटजू को जानने वाले लोग बताते हैं कि वे बहुत ज्यादा पढ़ते हैं. सिर्फ कानून और न्यायशास्त्र की ही नहीं बल्कि उन्हें संस्कृत, उर्दू, इतिहास, विज्ञान, दर्शनशास्त्र और समाजशास्त्र की भी गहरी जानकारी है. राजीव रंजन कहते हैं, ‘मैं जस्टिस काटजू का कोई भक्त नहीं हूं लेकिन उनकी कई विषयों पर जो जानकारी है उसका कोई मुकाबला नहीं. अन्य न्यायाधीशों को आम तौर पर कानून की ही जानकारी होती है लेकिन जस्टिस काटजू और भी कई विषयों को गहराई से समझते हैं. यही कारण है कि वे हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं. उनके हर बयान और टिप्पणी के पीछे मजबूत तर्क होते हैं जिन्हें आप नकार नहीं सकते. उन्होंने जब यह भी कहा कि 90 प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं तो उसमें भी उनके तर्क समझने लायक थे. उन्होंने बताया कि सिर्फ जाति के आधार पर फूलन देवी जैसे लोग संसद तक पहुंच जाते हैं तो उनको वोट देने वाले मूर्ख नहीं तो क्या हैं. जब ऐसे लोग ही संसद में आएंगे तो कानून भी वैसा ही बनाएंगे जैसे वे स्वयं हैं.’

इन सब जानकारियों के आधार पर आप जस्टिस काटजू को ज्ञानी, बेबाक, दूरदर्शी, बातूनी, प्रचार का भूखा या संयमहीन कुछ भी मान सकते हैं. लेकिन अब भी आप यदि उनको ठीक से नहीं समझ पाए हैं तो आपको उनका एक और सबसे नया किस्सा भी बता दें. तहलका ने जब उनके जीवन पर आधारित स्टोरी करने का विचार किया तो उनसे साक्षात्कार के लिए समय लेना चाहा. उनके सचिव एसपी शर्मा ने इस संवाददाता से कहा, ‘जस्टिस काटजू सिर्फ तरुण तेजपाल या फिर शोमा चौधरी(तहलका की अंग्रेजी पत्रिका की प्रबंध संपादक) से ही बात करेंगे. इसलिए उन दोनों में से कोई भी उनसे आकर मिल सकता है.’ ऐसा जवाब मिलने पर हमने जस्टिस काटजू को एक ईमेल के जरिए संदेश पहंुचाया, ‘हमने सुना था कि आप जज रहते हुए भी नए वकीलों को पूरा मौका देते थे और उन्हें अपने सामने बहस करने के लिए प्रोत्साहित करते थे. फिर आप अपने साक्षात्कार के लिए सिर्फ तरुण तेजपाल या शोमा चौधरी से ही क्यों मिलना चाह रहे हैं?’ हमने उनसे एक बार फिर से आग्रह किया कि वे कुछ समय निकाल कर हमसे बात करें. इसके जवाब में उन्होंने अपना निजी नंबर देते हुए कहा कि मुझसे इस नंबर पर संपर्क कर सकते हो. संपर्क करने पर उनका कहना था, ‘मैं अपने जीवन से संबंधित विषय पर साक्षात्कार नहीं देना चाहता. वैसे ही लोग मुझ पर यह आरोप लगाते हैं कि मैं सिर्फ चर्चाओं में रहने के लिए ही बयान देता हूं. इसलिए मुझे इस विषय पर बात नहीं करनी.’ हमारे इस आग्रह पर कि वे हमसे कुछ मिनट मिल ही लें, उनका कहना था,  ‘अगर मिलना है तो तहलका से तरुण तेजपाल या शोमा चौधरी मुझसे मिलें. मैं और किसी से बात नहीं करुंगा.’ हमने उन्हें बताया कि हम लोग हिंदी पत्रिका के लिए यह आवरण कथा कर रहे हैं और इस संबंध में उनसे कौन मिलेगा इसका फैसला तो संपादक का होगा तो उनका जवाब था, ‘मुझ पर लेख करना है तो इंग्लिश और हिंदी दोनों के लिए साथ में करो. इसके लिए उन दोनों में से कोई भी मुझसे आकर मिल सकता है.’

जस्टिस काटजू के साथ तहलका के इस अनुभव से शायद आपको उन्हें समझने में कुछ सहायता हो जाए. वैसे यदि अब भी आप उन्हें नहीं समझ पाए हैं तो जस्टिस काटजू, जिन्हें कई लोग दूरदर्शी भी मानते हैं, पहले ही यह बोल चुके हैं कि 90 प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं.

(15 मार्च 2013)

2 COMMENTS

  1. Dear Sir

    Thanks for writing such a good article on one of the great judges of our time. But here you missed one aspect of Justice Katju. When I was studying in Law School, BHU (Varanasi), I read one of his articles, and that article is related with the interpretation of statutes. Judges generally follow the tradition of interpreting complex provisions of law in the light of eminent jurist Maxwell, but it is only Justice Katju, who established Mimansa School of Interpretation. In this way, he not only established our heritage of interpretation of complex law, and influenced others to follow Mimansa school of interpretation.

    His grand father Shri Kailashnath Katju was also a great advocate who argued in the case of INA trial. Besides, he was also a great scholar of international law.
    I do not agree with all logics of Justice Markandeya Katju, but his arguments are invincible, and he must be praised for his foresight and brilliance.

    Thanks again for writing such a beautiful article on the most Hon’ble Justice Katju

    Balendu Priyadarshan

    Advocate

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