हरियाणा ने फिर देखा मौत का भयावह मंज़र

यह घटना रिश्तों की हत्या को भी दर्शाती है। समलैंगिक रिश्ता बनाये रखने पर आमदा बेटे ने किसी की नहीं सुनी और इतनी बड़ी घटना अंजाम दे डाला। मोनू ने किसी बात पर आवेश में आकर इतनी बड़ी घटना को अंजाम नहीं दिया, बल्कि इसके लिए बाक़ायदा साज़िश रची। चार हत्याओं के बाद उसने घटना को मोड़ देने की कोशिश की; लेकिन वह पुलिस की नज़र से बच नहीं सका। समलैंगिक रिश्ते के लिए उसने जो किया, वह शर्मसार करने वाला है। जिस रिश्ते को समाज में मान्यता ही नहीं, उसे निभाने के लिए उसका यह कृत्य उसे शायद ज़िन्दगी भर प्रायश्चित करने पर मजबूर करता रहे।

इससे पहले इसी वर्ष फरवरी के दौरान इसी शहर के जाट कॉलेज में कुश्ती कोच सुखविंदर ने छ: लोगों की गोलियाँ मारकर हत्या कर दी थी। इसमें पाँच की मौत घटनास्थल पर हो गयी थी, जबकि छ: साल के सरताज ने बाद में दम तोड़ दिया था। आरोपी सुखविंदर ने कोच की नौकरी से अलग कर देने का इतना बड़ा बदला लिया, जिसे सुनकर कोई भी सिहर सकता है। महिला पहलवान की शिकायत पर कॉलेज परिसर अखाड़े के प्रमुख कोच मनोज मलिक ने सुखविंदर को काम से हटा दिया था।

वह इससे इतना नाराज़ हुआ कि इस प्रकरण में मनोज का साथ देने वाले सभी को सबक़ सिखाने के लिए उसने इतना बड़ा क़दम उठा लिया। वह कॉलेज परिसर पहुँचा और वहीं रह रहे प्रमुख कोच मनोज मलिक के साथ वाद-विवाद होने पर गोली मार दी। बचाव में आयी उनकी पत्नी साक्षी को भी मौत की नींद सुला दिया। गोलीबारी में प्रदीप और साक्षी के तीन साल के बच्चे सरताज छर्रे लगने से गम्भीर घायल हो गया, जिसकी कुछ दिन बाद मौत हो गयी। सुखबिंदर ने महिला पहलवान पूजा, कोच सतीश दलाल और प्रदीप मलिक पर भी ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाकर मार डाला। उस दिन सुखविंदर के सिर पर बदला लेने का जैसे भूत सवार था। उसने अमरजीत पर भी गोली चला दी। उसका भाग्य अच्छा था कि उसने भागकर जान बचायी। घटना में मनोज मलिक का पूरा परिवार ख़त्म हो गया, जबकि उनका कोई दोष नहीं था। महिला पहलवान की शिकायत पर मनोज को कार्रवाई करनी ही थी; लिहाज़ा उन्होंने की। लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनका ही एक साथी इस बात का बदला इस तरह लेगा।

कोई दो दशक पहले भी राज्य में हुए सामूहिक हत्याकांड से लोग दहल उठे थे। ऐसी बड़ी घटना का कोई उदाहरण कम-से-कम इस राज्य में तो नहीं मिलता। इसमें बेटी और दामाद ने ही मिलकर पूरे परिवार का ख़ात्मा कर दिया। मामला प्रॉपर्टी विवाद का था। इस घटना को याद कर लोग आज भी सिहर उठते हैं। बरवाला से तत्कालीन निर्दलीय विधायक रेलूराम पूनिया समेत परिवार के आठ लोगों को बेटी सोनिया और दामाद संजीव ने बेरहमी से मौत की नींद सुला दिया था। इनमें तीन बच्चे थे, जिनकी उम्र चार साल से भी कम थी। इनमें एक तो डेढ़ महीने का शिशु ही था। मरने वालों में रेलूराम पूनिया, पत्नी कृष्णा, बेटा सुनील, पत्नी शकुंतला, बेटी प्रियंका, चार साल का पोता लोकेश, तीन साल की पोती शिवानी और डेढ़ माह की प्रीति थे।

इस घटना में भी पहले रिवॉल्वर का इस्तेमाल किया जाना था। लेकिन बाद में विचार बदल दिया गया। पहले परिवार के सदस्यों को खाने में नशीली चीज़ खिलाकर बेहोश किया गया। फिर उन पर लोहे की छड़ से प्रहार कर मौत की नींद सुला दिया। जिस करोड़ों की सम्पत्ति के चक्कर में सोनिया और संजीव ने इतना बड़ा कांड किया, उसका नतीजा क्या हुआ? बदले में उन्हें सम्पत्ति नहीं, बल्कि फाँसी की सज़ा मिली है। दोनों तिल-तिल कर मरने को मजबूर हैं। सोनिया ने तो जेल में ख़ुदकुशी का भी प्रयास किया; लेकिन बचा ली गयी। पेरोल पर बाहर आने पर संजीव ने भी ग़ायब होने की कोशिश की। लेकिन कुछ दिनों बाद वह भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया। उनकी दया याचिका ख़ारिज हो चुकी है। देर-सबेर दोनों को फाँसी लगनी लगभग तय ही है। अगर सोनिया को फाँसी होती है, तो वह आज़ादी के बाद पहली महिला होगी, जो फंदे पर झूलेगी। सामूहिक हत्याकांडों की ऐसी घटनाएँ समाज को झकझोर देने वाली होती हैं।

 

प्यार में परिवार की बलि

सन् 2008 में उत्तर प्रदेश के ज़िला अमरोहा के गाँव बवानाखेड़ी में कमोबेश ऐसी घटना हुई, जिसमें शबनम नामक लडक़ी ने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर परिवार के सात लोगों की हत्या कर दी। इनमें शबनम के पिता शौक़त अली, माँ हाशमी, भाई अनीस, पत्नी अंजुम, राशिद, राबिया और अर्श को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिये गया। घर वालों के ख़िलाफ़ जाकर शबनम ने सलीम को छोडऩा मंज़ूर नहीं किया, बल्कि विरोध करने वालों का ही ख़ात्मा कर डाला। शबनम और सलीम को भी फाँसी की सज़ा हो चुकी है। उनकी भी दया याचिका राष्ट्रपति से नामंज़ूर हो चुकी है।