स्त्री लेखन लिखें तो लिखें कैसे?

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घर, परिवार और बच्चों की अंतहीन जिम्मेदारी हमेशा ही लेखन में बाधा बनती है. कोई नया वैचारिक अंकुर फूटा नहीं कि खाना बनाने का समय हो गया जिसे आप चाहें भी तो नहीं टाल सकतीं. आप विचार या लेखन के चरम क्षणों में डूबकर बही जा रही हंै कि बच्चा या पति अपनी-अपनी जरूरतों के साथ सामने हाजिर हैं. आप पति को एक बार को टाल सकती हैं लेकिन बच्चे को टाला तो अपराधबोध से घिर जाएंगी. वर्जीनिया वुल्फ ‘अपने कमरे’ के होने पर जोर देती है. लेकिन ‘अपने कमरे’ में समय भी हमारा अपना ही होगा इसकी क्या गारंटी है? गारंटी इसकी तो है कि भारतीय स्त्री के अपने कमरे में भी समय सिर्फ उसका नहीं है. स्त्री के अपने समय पर पहला हक बच्चे, पति, सास-ससुर व रिश्तेदारों का है. उसके बाद भी यदि समय बचे तो फिर वह जो चाहे करे. मां, पत्नी, बहू के रोल निभाने के साथ हममें लेखन का माद्दा बचा हो तो हो. हम अपने कमरे का दरवाजा बंद करके लिख जरूर सकती हैं, लेकिन उन तमाम भूमिकाओं में से चाहे जिसकी भी जरूरत हो उठकर तो हमें ही कमरे से कागज और कलम छोड़कर आना होता है. हाल ही में ब्रिटेन की एक सामाजिक मुद्दों पर शोध करने वाली संस्था ने कामकाजी महिलाओं पर एक शोध किया. शोध में सामने आया कि गृहस्थी के साथ नौकरी करने वाली महिलाएं एक दिन में सिर्फ 26 मिनट का समय ही अपने लिए निकाल पाती हैं. यानी सप्ताह में सिर्फ तीन घंटे का समय हमारा अपना है जिसमें हम चाहे जो करें.

एक शोध में सामने आया है कि गृहस्थी के साथ नौकरी करने वाली महिलाएं एक दिन में सिर्फ 26 मिनट का समय ही अपने लिए निकाल पाती हैं. यानी के सप्ताह में सिर्फ तीन घंटे का समय हमारा अपना है जिसमें हम चाहे जो करें

ellइन तमाम बुनियादी अड़चनों के बाद भी यदि लिखने का कीड़ा दिमाग में कुलबुलाता है तो फिर कुछ और ‘रचनात्मक तरह’ की मुश्किलें हमार इंतजार करती हैं. तमाम तरह के दैनिक, पाक्षिक या मासिक पत्र-पत्रिकाओं में शीर्ष पदों पर पुरुषों की उपस्थिति है. जहां-जहां (अधिकांशत:) पुरुष और पितृसत्ता का गहरा गठबंधन रहता है वहां-वहां हम ज्यादातर दो तरह के व्यवहारों से टकराती हैं. एक तरफ लिखे हुए प्रकाशन के एवज में सत्ताधारी लोगों की तरफ से प्रत्यक्ष/ परोक्ष दैहिक या अर्धदैहिक संबंधों की तलवार लटकती है. यदि ऐसी किसी संभावना से हम बच निकल आती हैं तो फिर हमारे लेखन को महत्वहीन या फालतू समझा जाता है. हमारे लेखन को यथायोग्य मान्यता नहीं मिलती. यहां पितृसत्ता का ‘दंभ’ अपनी अहम भूमिका निभाता है कि एक औरत उससे अच्छा या ज्यादा महत्व का भला कैसे लिख सकती है? पार्टी, गुट और खेमे से बचकर हम ज्यादा दूर तक नहीं चल सकतीं क्योंकि जो ‘तटस्थ’ होते हैं वे कहीं

नहीं होते! अकसर ही स्त्रियों के सिर्फ स्त्री संबंधी मुद्दों पर लिखे हुए को ही मान्यता मिलती है. इतर विषयों पर किए गए स्त्री लेखन को न तो स्वीकृति मिलती है, न सम्मान मिलता है, न ही मान्यता. इसके पीछे भी वही सामंती सोच है कि औरत की जगह सिर्फ रसोई और प्रसव घर ही है बाकी जगह का उसे क्या ज्ञान और कितना ज्ञान? जैसे हरेक क्षेत्र के अपने-अपने ज्ञानी मठाधीश हैं वैसे स्त्री को सिर्फ स्त्री विषयों का ही ज्ञाता मानने का दबाव पितृसत्ता के दिमाग में हमेशा रहता है. इतर विषयों पर उसके ज्ञान को अक्सर ही अधूरा, कच्चा और स्तरहीन ही माना जाता है. यदि महिलाओं द्वारा किए गए लेखन को हिंदी के शीर्षस्थ, परम विद्वान आचार्यों, आलोचकों, समीक्षकों ने स्वीकार किया होता, उसे उचित सम्मान व मान्यता दी होती तो सुमना राजे को ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ अलग से लिखने की जरूरत ना पड़ती.

भाषा और उसके पीछे की समस्या भी स्त्री लेखन के सामने अक्सर ही आती है. लिंगभेदी भाषा खासतौर से उस वक्त हमें सताती है जब हमें अपना गुस्सा और आक्रोश प्रकट करना होता है. लाख ना चाहने पर भी हमें भी उन्हीं मां-बहन की गंदी गालियों का प्रयोग करना पड़ता है जिन पर हम नाक-भौं सिकोड़ती हैं. आखिर हमारी आक्रोश की भाषा क्या हो? साहित्य का पूरा इतिहास लेखकों द्वारा स्त्री देह और स्त्री देह के साथ मनचाहे संबंधों के बखान से भरा पड़ा है. यहां तक कि एक काल का नाम ही ‘श्रृंगार काल या रीति काल’ है लेकिन जब हम अपने देह और अपने संबंधों को अपने नजरिए से देखती और लिखती हैं तो हमारे लेखन को अश्लील, पोर्न, स्तरहीन, घटिया की श्रेणी में रखा जाता है. क्यों? एक लेखक को कभी भी अपने अनुभवजन्य सत्य या विचार लिखने के लिए मां-बाप, ससुराल या रिश्तेदारों में अपमानित नहीं होना पड़ेगा चाहे वह सत्य या विचार कितना भी सामाजिक मर्यादाओं, नियमों के विरुद्ध हो. लेकिन एक स्त्री को सामाजिक मर्यादा विरुद्ध सत्य या विचार लिखने के एवज में न सिर्फ मायके, ससुराल, रिश्तेदारों में अपनी मान-प्रतिष्ठा गंवानी पड़ेगी बल्कि उसे खौलते हुए सवालों के कड़ाह में भी फेंका जाएगा!

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