सुर अविनाशी: लता मंगेशकर

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लता मंगेशकर पर अक्सर नुक्ताचीनी करने वाले यह आरोप लगाते रहे हैं कि उनका गायन फिल्मों तक सीमित है, उसमें शास्त्रीयता के लिए कोई जगह नहीं है. उनके लिए, जिन्होंने कभी भी फिल्म संगीत को स्तरीय न मानने की जबरन एक गलतफहमी पाल रखी है, लता एक चुनौती से कम नहीं हैं. भेंडी बाजार घराने के मशहूर उस्ताद अमान अली ख़ां तथा उस्ताद अमानत ख़ां देवास वाले से बकायदा गंडा बंधवाकर लता जी ने संगीत की शिक्षा ली है. बाद में उस्ताद बड़े गुलाम अली खां के शागिर्द पं तुलसीदास शर्मा ने भी उन्हें शास्त्रीय संगीत की तालीम दी. लता मंगेशकर की ख्याति भले ही फिल्म संगीत की वजह से रही हो, पर इससे कौन इनकार कर सकता है कि उन्होंने फिल्मी गीतों में उसी तरह शास्त्रीयता का उदात्त रंग भरा है, जिस तरह देवालयों, नौबतखानों एवं राजदरबारों में बजने वाली शगुन की शहनाई में उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने राग और आलापचारी भरे.

लता जी की संगीत यात्रा को देखने पर यह महसूस होता है कि उनके गायन की खूबियों के साथ चहलकदमी करने में सितार प्रमुखता से उनके साथ मौजूद रहा है. सितार की हरकतों, जमजमों और मींड़ों का काम देखने के लिए लता के गाए ढेरों सुंदर गीत याद किए जा सकते हैं. ‘ओ सजना बरखा बहार आई’ (परख), ‘हाय रे वो दिन क्यूं न आए’ (अनुराधा), ‘मेरी आंखों से कोई नींद लिए जाता है’ (पूजा के फूल), ‘हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे’ (दिल एक मंदिर), ‘मैं तो पी की नगरिया जाने लगी’ (एक कली मुस्काई), ‘आज सोचा तो आंसू भर आए’ (हंसते जख्म) जैसे तमाम गीतों में सितार की हरकतों के साथ उनकी आवाज को पकड़ना एक बेहद मनोहारी खेल बन जाता है. शास्त्रीय संगीत की रागदारी, तालों, मात्राओं और लयकारी के अलावा प्रमुख भारतीय वाद्यों सितार, सरोद, बांसुरी, शहनाई और वीणा ने भी उनके गले के साथ जबर्दस्त संगत की है. इस तरह के ढेरों गीत याद किए जा सकते हैं जिनमें पन्नालाल घोष की बांसुरी, उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई, उस्ताद अली अकबर खां का सरोद, उस्ताद अल्लारक्खा का तबला, पं रामनारायण की सारंगी, उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां एवं रईस खां का सितार लता मंगेशकर की आवाज के सहोदर बनकर फिल्म संगीत को शास्त्रीयता के बड़े फलक पर ले जाते हैं. बांसुरी के साथ आत्मीय जुगलबंदी के लिए मैं पिया तेरी तू माने या न माने (बसंत बहार), सरोद की लय पर आवाज की कशिश के लिए ‘सुनो छोटी-सी गुडि़या की लंबी कहानी’ (सीमा) एवं शहनाई के छंद को समझने के लिए ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’ (गूंज उठी शहनाई) सुने और महसूस किए जा सकते हैं. हम चकित होते हुए यह सोचते रह जाते हैं कि आवाज के विस्तार और उसकी लोचदार बढ़त में वाद्य किस तरह सहधर्मी बन सकता है.

यदि लता जी के संगीत में शास्त्रीयता की नुमाइंदगी खोजनी हो, तब बहुतेरे ऐसे गीतों को याद किया जा सकता है, जिनमें रागदारी और आलापचारी, तानें और मुरकियां, मींड़ और गमक अपने सर्वोत्तम रूपों में मिलती हैं – ‘घायल हिरनिया मैं बन-बन डोलूं’ (मुनीम जी) में सरगम की तानें अपने शुद्ध रूप में मौजूद पाई जा सकती हैं. मींड़ के बारीक काम के लिए ‘रसिक बलमा’ (चोरी-चोरी) को बार-बार सुना जा सकता है. आलाप के एकतान सौंदर्य के लिए ‘डर लागे चमके बिजुरिया’ (रामराज्य) को कोई कैसे भूल सकता है. लयदार तानों और गमक का एहसास लिए हुए ‘सैंया बेईमान’ (गाइड) अनायास ही याद आते हैं. उनके असंख्य गीत ऐसे हैं जिनमें रागदारी अपने शुद्धतम एवं मधुर रूप में व्यक्त हुई है. मसलन ‘ज्योति कलश छलके’ – ‘भाभी की चूडि़यां’ (राग भूपाली), ‘अल्लाह तेरो नाम’ – हम दोनों (राग मिश्र खमाज), ‘मनमोहना बड़े झूठे’ – सीमा (राग जयजयवंती), ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे – मुगले आजम (राग मिश्र गारा),  ‘कान्हा-कान्हा आन पड़ी मैं तेरे द्वार’ – शागिर्द (राग मांझ खमाज), ‘नदिया किनारे’-अभिमान (राग पीलू) तथा ‘मेघा छाए आधी रात’ – शर्मीली (राग पटदीप). यह अंतहीन सूची है, जिसमें अभी  हजारों ऐसे ही उत्कृष्ट गीतों को बड़ी आसानी से शामिल किया जा सकता है.

पिछले साठ साल में उनकी आवाज में शंकर-जयकिशन की अनगिनत भैरवियों, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की ढेरों पूरिया धनाश्रियों और शिवरंजनियों, एसडी बर्मन की अधिसंख्य बिहाग, तोड़ी और बहारों के साथ मदन मोहन की तमाम छायानटों एवं भीमपलासियों ने आकार लिया है. तमाम सारे दिग्गज एवं अगली पंक्ति के इन बड़े संगीतकारों के साथ-साथ लता की आवाज ने चित्रगुप्त, दत्ताराम, एसएन त्रिपाठी, रामलाल, रवि, स्नेहल भाटकर, हंसराज बहल, जीएस कोहली, सुधीर फड़के, पंडित अमरनाथ और एन दत्ता जैसे संगीतकारों के साथ भी शास्त्रीय ढंग के कुछ बेहद अविस्मरणीय गीत गाए हैं. शायद इसीलिए सालों पहले शास्त्रीय गायक पं कुमार गंधर्व ने लता जी पर पूरा एक लेख उनकी गायकी की खूबी बखानने के उद्देश्य से लिखा था. उनका मानना था, ‘जिस कण या मुरकी को कंठ से निकालने में अन्य गायक और गायिकाएं आकाश-पाताल एक कर देते हैं, उस कण, मुरकी, तान या लयकारी का सूक्ष्म भेद वह सहज ही करके फेंक देती है.’

लता जी के जीवन में एक दौर ऐसा भी आया जब जिस फिल्म में उनका गाना न होता, समझा जाता कि वह पिट गई अगर एक गाना भी उन्होंने गाया, तो सबसे ज्यादा लोकप्रिय वही होता. लता के गानों की वजह से कई बार ऊलजलूल और अति साधारण फिल्मों तक का बाजार चल पड़ता था. बहुतेरी फिल्में दूसरे-तीसरे दरजे की भी हों, तो भी गाने ऐसे होते कि जी करता सुनते रहें और वे रेडियो पर बार-बार फरमाइशों के दौर तले ऐतिहासिक बनते जाते. जिस जमाने में नयी फिल्मों के गानों को रेडियो पर सुनने की होड़ लगी रहती थी, उनमें भी सबसे ज्यादा दीवाने लता की आवाज के ही होते थे. सबसे मजेदार बात तो यह है कि जिन प्रणय गीतों पर हमारे दादा-दादी के जमाने के लोग आनंदित और तरंगित हो जाते थे, आज बरसों बाद हम भी उन्हीं गीतों को सुनकर उतने ही रोमांचित हो उठते हैं.  ‘आजा सनम मधुर चांदनी में हम’ (चोरी-चोरी), ‘गाता रहे मेरा दिल’ (गाइड), ‘आसमां के नीचे’ (ज्वैलथीफ,  ‘कोरा कागज था ये मन मेरा’ (आराधना), ‘तेरे मेरे मिलन की ये रैना’ (अभिमान) या ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए’ (सिलसिला) जैसे शाश्वत अमर प्रेम गीतों को याद करने के लिए भी क्या किसी उम्र, दौर, शहर की जरूरत है?

लता मंगेशकर के संगीत जीवन के ब्यौरों को खंगालने पर ढेरों ऐसी बातों से भी हम रूबरू होते हैं, जो उनके अडिग चरित्र की एक सादगी भरी बानगी व्यक्त करती हैं. कुछ सिद्धांतों से पिछले साठ-सत्तर साल में कोई भी व्यक्ति उन्हें डिगा नहीं सका. उन्होंने यह तय कर रखा था कि फूहड़ व अश्लील शब्दों के प्रयोग वाले गीत वे नहीं गाएंगी. इसका परिणाम यह हुआ कि सिचुएशन के लिहाज से जरूरी ऐसे गीतों में भी गरिमापूर्ण शब्द इस्तेमाल किए जाने लगे. यह भी लता मंगेशकर के फिल्मी सफर का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा कि जिस मर्यादा और गरिमा को चुनते हुए उन्होंने अपनी निराली राह बनाई, उसमें संगीत का सफरनामा उनकी तयशुदा शर्तों पर ही संभव होता रहा. किसी संगीत निर्देशक की यह हिम्मत ही नहीं होती थी कि वह कुछ सस्ते जुमले वाले गीतों को लेकर उनके पास जाए. राजकपूर निर्देशित ‘संगम’ फिल्म का गीत ‘मैं का करूं राम मुझे बुढ्ढा मिल गया’, जैसे इक्का-दुक्का गीतों के गाने को वे आज भी अपनी भारी भूल मानती हैं. उन्होंने अपने पूरे संगीत कॅरियर में केवल तीन कैबरे गीत गाए, जो उनके शालीन ढंग के गायन के चलते, ठीक से कैबरे भी नहीं माने जा सकते. ये थे ‘मेरा नाम रीटा क्रिस्टीना’ (अप्रैल फूल, 1964), ‘मेरा नाम है जमीला’-(नाइट इन लंदन, 1967) एवं ‘आ जाने जां’-(इंतकाम, 1969). इस एक बात का जिक्र भी बेहद जरूरी है कि फिल्मों में प्रयुक्त होने वाले मुजरा गीतों को गाने में वे कभी सहजता महसूस नहीं करती थीं, बावजूद इसके सबसे ज्यादा लोकप्रिय एवं स्तरीय मुजरा गीत उन्हीं के खाते में दर्ज हैं. नौशाद से लेकर एसडी बर्मन, रोशन, मदन मोहन, शंकर-जयकिशन, गुलाम मोहम्मद एवं एन दत्ता जैसे प्रमुख संगीतकारों ने लता से बेहद मेलोडीयुक्त, संवेदनशील एवं साहित्यिक किस्म के मुजरा और महफिल गीत गवाए. इस तरह के गीतों में, जिनसे लता की एक अलग ही और गंभीर किस्म की छवि बनती है, कुछ गीत हैं, ‘यहां तो हर चीज बिकती है कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे’ (साधना), ‘उनको ये शिकायत है’ (अदालत), ‘रहते थे कभी जिनके दिल में’ (ममता), ‘कभी ऐ हकीकते मुंतजर’ (दुल्हन एक रात की), ‘ठाढे़ रहियो ओ बांके यार’ (पाकीजा), ‘राम करे कहीं नैना न उलझे’ (गुनाहों का देवता), ‘सलामे इश्क’ (मुकद्दर का सिकंदर) आदि. इन गीतों को जिसने भी सुना होगा वे सहमत होंगे कि फिल्म संगीत से हटकर बैठकी महफिल में गाई जाने वाली ठुमरी और दादरों की तरह की अदायगी का लता मंगेशकर ने इन मुजरा गीतों में पुनर्वास किया है. इनमें कई तो बरबस रसूलनबाई, बड़ी मोतीबाई, विद्याधरी एवं सिद्धेश्वरी देवी के बोलबनाव के दादरों एवं ठुमरियों की याद दिलाते हैं.

लता की आवाज की चरम उपलब्धि के रूप में अधिकांश वे दर्द भरे गीत भी गिने जा सकते हैं जिन्हें पूरी शास्त्रीय गरिमा, मंदिर की सी निश्छल पवित्रता एवं मन की उन्मुक्त गहराई से उन्होंने गाया है. ऐसे गीत एक हद तक मनुष्य जीवन की तमाम त्रासदियों, विपदाओं, दुख, वेदना और पीड़ा को कलाओं के आंगन में जगह देते से प्रतीत होते हैं. उनकी इस तरह की गायिकी की एक बिल्कुल अलग और व्यापक रेंज रही है, जिसमें कई बार भक्ति संगीत भी स्वयं को शामिल पाता है. यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि हृदयनाथ मंगेशकर के बेहद प्रयोगधर्मी संगीत पर गाए हुए उनके मीरा भजन, वेदना और टीस की उतनी ही सफल अभिव्यक्ति करते हैं जितना कि सिनेमा में पीड़ा के अवसरों पर गाए गए उनके मार्मिक गीत. ‘जो तुम तोड़ो पिया’ (झनक-झनक पायल बाजे), ‘जोगिया से प्रीत किए दुख होए’ (गरम कोट), ‘पिया ते कहां गए नेहरा लगाय’ (तूफान और दीया), ‘हे री मैं तो प्रेम दीवानी’ (नौबहार), ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ (राजरानी मीरा) जैसे अद्भुत मीरा-भजनों के बरक्स हम बड़ी सहजता से वे गीत याद कर सकते हैं, जहां नायिका का गम लता की आवाज में बहुत ऊपर उठकर अलौकिक धरातल को स्पर्श कर जाता है. ऐसे में ‘न मिलता गम तो बरबादी के अफसाने’ (अमर), ‘तुम न जाने किस जहां में खो गए’ (सजा), ‘हम प्यार में जलने वालों को’ (जेलर), ‘वो दिल कहां से लाऊं’ (भरोसा),  ‘दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें’ (बहू बेगम) जैसे गीत याद करना भक्ति और पीड़ा के समवेत भाव को एक ही मनोदशा में याद करना है. यह लता मंगेशकर के यहां ही संभव है कि एक ही आवाज का सुर संसार इतना विस्तृत हो सका कि उसमें जीवन के तमाम पक्षों की अप्रतिम अदायगी भजन, लोरी, गजल, कव्वाली, हीर, जन्म, सोहर, ब्याह, विदाई, प्रार्थना, प्रणय, मुजरा, लोक-संगीत, देश-प्रेम, होली, विरह, नात, नृत्य आदि के माध्यम से श्रेष्ठतम रूपों में अभिव्यक्त होती रही.

यह लता मंगेशकर के जीवन का ही सुनहरा पन्ना है कि तमाम सारे कर्णप्रिय सफलतम गीतों के बीच कुछ ऐसी अभिव्यक्तियों में भी वे समय-समय पर मुब्तिला रहीं जिन्होंने उन्हें एक अलग ही प्रकार की गरिमा और सम्मान का अधिकारी बना दिया. इस बात को कौन भूला होगा कि भारत-चीन युद्ध के उपरांत शहीदों के प्रति आभार जताने के क्रम में पंडित प्रदीप का लिखा और सी रामचंद्र का संगीतबद्ध ऐतिहासिक गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को गाने का सौभाग्य न सिर्फ लता के खाते में आया बल्कि पंडित नेहरू का उसे सुनकर रो पड़ना, उनके कद को बहुत गरिमा के साथ कई गुना बढ़ा गया. यह लता ही थीं कि जब पहली बार क्रिकेट का विश्वकप जीतकर कपिल देव भारत आए, टीम की हौसला अफजाई करने एवं उसके सदस्यों को आर्थिक सहायता पहुंचाने के उद्देश्य से उन्होंने एक चैरिटी कार्यक्रम आयोजित करके उसमें स्वयं गाया. उन्होंने विदेश में पहली बार 1974 में लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में अपनी प्रस्तुति मात्र इस कारण दी कि विदेशों में नेहरू सेंटर की गतिविधियों की खातिर धन एकत्र किया जा सके. एक ओर वे बीमार महबूब खान को पूरे हफ्ते भर फोन पर ‘रसिक बलमा’ सुनाती रहीं, तो दूसरी ओर लंदन में नूरजहां के घर में उनके अनुरोध पर लिफ्ट में ही ‘ऐ दिले नादां’ गाकर उन्हें प्रसन्न किया. यह लता के गायन की विविधता ही है कि साहिर लुधियानवी की जनवादी कलम से निकली शाहकार रचना ‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम’ में उन्होंने उतने ही लय, गमक और प्राण डाले जितने कि भक्त कवि तुलसीदास के पद ‘ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनियां’ में आस्था के सुर. एक तरफ वे हृदय को चीर देने वाला बेधक नात ‘मेरा बिछड़ा यार मिला दे सदका रसूल का’(सोहनी महीवाल) गाकर दुख के सात आसमान रच देती हैं, तो ठीक उसी क्षण कुछ शोख, कुछ नटखट ढंग से ‘सायोनारा’ (लव इन टोकियो) कहती हुई बहुतेरे युवाओं को घायल कर डालती हैं. जयदेव के संगीत पर एक बार फिर से शहीदों को नमन करते हुए बेहद श्रुतिमधुर ‘जो समर में हो गए अमर मैं उनकी याद में’ जैसा गीत गाकर एक बार फिर से देशप्रेम का जज्बा उकेरने में सफल रहती हैं, तो पंडित भीमसेन जोशी के सुर में सुर मिलाते हुए ‘राम का गुन गान करिए’ जैसा मनोहारी भजन रचने में व्यस्त हो जाती हैं. सबसे शानदार क्षण तो उनके सांगीतिक संसार में तब दिखता है, जब भारत की विविधवर्णी सांस्कृतिक छवि को दिखाने वाली एक प्रस्तुति के अंत में ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ गाते हुए वे अपने बायें कंधे पर तिरंगा आंचल की तरह पसारती हैं. तब ऐसा लगता है कि शायद यही उनकी सबसे महत्वपूर्ण और मुकम्मल पहचान है.

यह अकारण नहीं है कि जीवन भर संगीत, रिकॉर्डिंग स्टूडियो एवं मंचों को मंदिर मानने वाली इस गायिका के यहां गुरु से सीखा हुआ वही भूपाली राग सर्वाधिक प्रिय रहा जिसमें घर-आंगन और मंदिर को पवित्र करने वाला प्रार्थना गीत रचा गया है. ‘ज्योति कलश छलके, हुए गुलाबी लाल रुपहले रंग-दल बादल के, ज्योति यशोदा धरती मैया नील गगन गोपाल कन्हैया, श्यामल छवि झलके’ की अद्भुत अलौकिक सृष्टि के धरातल में घर-आंगन को धोते हुए रंगोली सजाने, तुलसी के बिरवे पर जल चढ़ाने के साथ जिस दीपदान की कल्पना रची गई है, शायद वह भारतीय समाज की सबसे प्रासंगिक सांस्कृतिक छवि है.

अनगिनत मानद उपाधियां, फिल्म ट्रॉफियां, देश-विदेश के तमाम नागरिक सम्मान सहित ‘भारत रत्न’ जैसे अलंकरण चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों उनकी एक सुरीली आहट पर फीके पड़ जाते हैं. लता जी बारे में एक बार उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने कहा था कि अगर सरस्वती होंगी तब वह उतनी ही सुरीली होंगी जितनी कि लता मंगेशकर हैं. हम सभी गर्व कर सकते हैं कि हम उस हवा में सांस ले सकते हैं जिसमें साक्षात सरस्वती की आवाज भी सुर लगाते हुए सांस ले रही है.

(30 सितंबर 2011)

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