सियासत और नर्मदा की आफत

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नदी-जोड़ योजना का एक आम सिद्धांत है कि किसी दानदाता नदी का पानी ग्रहणदाता नदी में तभी डाला जा सकता है जब दानदाता नदी में अपने इलाके के लोगों की आवश्यकताओं से ज्यादा पानी उपलब्ध हो. सवाल है कि क्या नर्मदा में पेयजल, खेती और उद्योगों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता से ज्यादा पानी उपलब्ध हैं? गौर करने लायक तथ्य है कि वाशिंगटन डीसी के वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के मुताबिक नर्मदा दुनिया की छह सबसे संकटग्रस्त नदियों में शामिल है. केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक 2005 से 2010 तक आते-आते नर्मदा में पानी की आपूर्ति आधी रह गई है. जबकि एक अनुमान के मुताबिक 2026 तक नर्मदा घाटी की आबादी पांच करोड़ हो जाएगी. ऐसे में यहां पानी जैसे संसाधनों पर भारी दबाव पड़ेगा. इस योजना को लेकर जल वैज्ञानिक केजी व्यास का मानना है, ‘नर्मदा का पानी जिस जगह से उठाया जाएगा उसके बारे में यह नहीं बताया गया है कि वहां लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उससे अधिक पानी उपलब्ध है भी या नहीं.’ इसी तरह, इस नदी-जोड़ योजना में करीब साढ़े चार सौ करोड़ रुपये आधारभूत ढांचा खड़ा करने में खर्च किए जाएंगे. लिहाजा खर्च के अनुपात में समस्या के निराकरण की तुलना होनी चाहिए. लेकिन यहां भी यह नहीं बताया गया है कि इस लेन-देन में नर्मदा घाटी को कितना घाटा और सूबे को कुल कितना मुनाफा होने वाला है. दरअसल यह पूरी योजना न केवल महंगी बल्कि जटिल भी है, इसलिए इसका संचालन और रखरखाव भी उतना ही खर्चीला रहेगा. ऐसे में जितना खर्च आएगा उससे पड़ने वाले कर का बोझ भी राज्य के लोगों पर पड़ेगा.

नर्मदा नदी को मालवा की जीवनरेखा बनाने की पहल नई नहीं है. किंतु 2002 में सूबे की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने जरूरत से ज्यादा बिजली खर्च होने की दलील देकर ऐसी योजना को खारिज कर दिया था. 2002 को विधानसभा में सिंह ने इस योजना से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि इसके लिए पैसा जुटाना बड़ी चुनौती है. लेकिन मौजूदा सरकार ने अब इसी योजना को जनता के बीच आकर्षण का मुद्दा बना दिया है. वहीं अनौपचारिक चर्चा के दौरान प्राधिकरण के एक आला अधिकारी का कहना है, ‘अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि नर्मदा से क्षिप्रा को जोड़ने के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये की रकम कहां से जुटाई जाएगी.’ दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री चौहान का कहना है, ‘मालवा में नर्मदा का पानी लाने के लिए एक लाख करोड़ रुपये भी खर्च करने पड़े तो हंसते-हंसते खर्च किए जाएंगे.’ साथ ही चौहान ने दोनों नदियों के बीच एक भव्य मंदिर बनाने की घोषणा भी की है.

जाहिर है मामला चुनावी है और इस योजना को पीने के पानी के निराकरण के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है, इसलिए राज्य की सरकार जहां किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं है वहीं विरोधी दल कांग्रेस विरोध दिखाने की हालत में नहीं है. नर्मदा-क्षिप्रा योजना पर संभलकर आगे बढ़ने की सलाह देते हुए जल नीतियों पर अध्ययन करने वाली संस्था सैंड्रप, दिल्ली के हिमांशु ठक्कर कहते हैं, ‘पानी से उठने वाले विवादों के हल बाद में ढूंढ़ना काफी मुश्किल हो जाता है. जैसे कि दक्षिण भारत में कावेरी नदी के विवाद के बाद कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों के बीच पनपी पानी की लड़ाई खत्म होने का नाम नहीं लेती. ऐसा इस योजना के साथ भी हो सकता है.’

तजुर्बे बताता है कि भले ही पानी आग ठंडा करने के काम आता हो लेकिन सियासत में यह आग लगाने के काम आ रहा है. लिहाजा मप्र के निमाड़ और मालवा इलाके की नदियों के पानी के साथ ऐसा कोई खेल न खेलने की कोशिश होनी चाहिए थी. लेकिन मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नर्मदा को क्षिप्रा से जोड़ने का दावा यहीं नहीं थमता. वे नर्मदा के पानी से मालवा की कई बड़ी नदियों को जोड़ने का राग भी आलाप रहे हैं. इस तरह चौहान इन दिनों नर्मदा के पानी से मालवा के तीन हजार गांवों और दस शहरों की प्यास बुझाने का सपना दिखा रहे हैं. यही नहीं वे नर्मदा के ही पानी से मालवा के 18 लाख हेक्टेयर खेतों को सींचने की उम्मीद भी जगा रहे है. गौर करें तो मालवा में क्षिप्रा के अलावा खान, गंभीर, चंबल, कालीसिंध और पार्वती सरीखी बड़ी नदियां हैं. जाहिर है कि अकेले नर्मदा नदी के दम पर सभी नदियों को जिंदा रखने का दावा किया जा रहा है. इस पूरी परियोजना से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस कवायद में जब नर्मदा सूख जाएगी तब उसे कौन-सी नदी से जिंदा किया जाएगा.

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