सिद्धू 65 पर नॉट आउट, कैप्टेन 15 पर अब ‘रनर’ की भूमिका में

राजकुमार वेरका जैसे मजबूत समर्थक के छिटकने से निश्चित ही कैप्टेन दुखी होंगे। लेकिन राजनीति में यही होता है। सब चढ़ते सूरज को सलाम करते हैं। ऊपर से सिद्धू के साथ आलाकमान का हाथ है। भला कौन कैप्टेन के पीछे लगा रहेगा। कैप्टन  टकसाली नेताओं को साथ रखने की कमजोर सी कोशिश कर रहे हैं। वरिष्ठ नेता ब्रह्म मोहिंद्रा ने सिद्धू को अध्यक्ष बनाने का स्वागत कर दिया है। वे कैप्टेन सरकार में वरिष्ठ  मंत्री हैं।

कैप्टेन की आँख-कान माने जाने वाले उनके मीडिया सलाहकार रवीन ठुकराल ने आज एक ट्वीट किया है जिससे लगता है कि कैप्टेन अभी भी ‘आर-पार की लड़ाई’ में खुद को खड़ा दिखाना चाहते हैं। वे सिद्धू को कुछ भी मानने के लिए तैयार नहीं। निश्चित ही कैप्टेन के सलाहकार उन्हें राजनीतिक रिस्क में डाल रहे हैं। ठुकराल का आज का ट्वीट कहता है – ‘ऐसी रिपोर्ट आ रही है कि नवजोत सिंह सिद्धू ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से मुलाकात का समय मांगा है, जो पूरी तरह गलत है। किसी भी तरह का कोई समय नहीं मांगा गया है और न ही मुख्यमंत्री नवजोत सिंह सिद्धू से तब तक मुलाकात करेंगे जब तक वह सार्वजनिक तौर पर उनसे माफी नहीं मांग लेते हैं’।

अब अमरिंदर का अगला कदम क्या हो सकता है। कांग्रेस आलाकमान ने तो उनके ही नेतृत्व में अगला चुनाव लड़ने की घोषणा की थी, लेकिन यह कैप्टेन थे जिन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बनाने के आलाकमान के अधिकार को भी अपने हाथ में रखने की कोशिश की। यदि कैप्टेन भाजपा में होते तो क्या ऐसा कर सकते थे? बिलकुल नहीं। कांग्रेस में विधायकों की शक्ति के बूते उन्होंने आलाकमान को ही हांकने की कोशिश की जो उन्हें उल्टी पड़ गयी।

वर्तमान स्थिति की निराशा में अब यदि वे कांग्रेस को अलविदा कहने जैसा मुश्किल फैसला कर भी लेते हैं तो उनके सामने क्या विकल्प हो सकते हैं ? एक – वे आम आदमी पार्टी (आप) जैसी पार्टी में जाएं जो एक ही सूबे में सरकार वाली पार्टी है और जिसके नेता राजनीति में उनके अनुभव और रुतबे से कहीं जूनियर हैं। आप में जाकर उनके दोबारा मुख्यमंत्री बनने की कोई गारंटी नहीं क्योंकि यह तो चुनाव जीतने पर निर्भर करेगा।

दो – वे भाजपा में जाएं, जो उन्हें साथ लेने की बहुत इच्छुक रहेगी क्योंकि कैप्टेन का साथ मिलना तो उसके लिए लाटरी हाथ लगने जैसा होगा। लेकिन किसान जिस स्तर पर भाजपा से नाराज हैं उसे देखते हुए कैप्टेन वहां क्या कर सकेंगे, यह समझा जा सकता है। विचारधारा के स्तर पर भी कैप्टेन के विचार भाजपा से मेल नहीं खाते।

तीन – वे अपना ही कोई क्षेत्रीय राजनीतिक दल खड़ा कर लें। उनके साथ आप, अकाली दल और कांग्रेस के अलावा भाजपा के कुछ नेता आ सकते हैं। लेकिन बिना संसाधन वे एक मजबूत संगठन खड़ा कर लेंगे, इसे लेकर कोई दावा आज की तारीख में नहीं किया जा सकता है।

चार – अमरिंदर कांग्रेस में ही बने रहें और विधानसभा चुनाव तक अपनी लड़ाई लड़ें। सिद्धू अब अध्यक्ष बनकर चुनाव में टिकटों की बड़ी संख्या पर हाथ साफ़ कर जाएंगे, इसकी पक्की संभावना है, फिर भी अमरिंदर कोशिश तो कर ही सकते हैं। यदि चुनाव के बाद वे सीएम नहीं भी बनते हैं तो भी तमाम वर्तमान तल्खियों के बावजूद कांग्रेस संगठन में कोई सम्मानजनक पद उन्हें मिल जाएगा।