सावधानी से करें मास्क का इस्तेमाल

प्रदूषण विरोधी अभियान चलाने वाले डॉक्टर दिव्यांग देव गोस्वामी का कहना है कि देश में अगर कोरोना के बाद मौज़ूदा दौर में कोई स्वास्थ्य सम्बन्धी दिक़्क़त पैदा कर रहा है, तो वह वायु प्रदूषण है। इसकी वजह सरकार की लापरवाही और आम जनमानस की उदासीनता भी है। डॉक्टर दिव्यांग कहते हैं कि सरकार तो तब जागती है, जब वायु प्रदूषण से लोगों के बीच हाहाकार मचने लगता है। लोग भी कम नहीं हैं, उन्हें साँस लेने में परेशानी होती है, फिर भी कई काम ऐसे करते हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है। इस बार दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण 500 क्यूआर के पास पहुँच गया। इस वायु प्रदूषण के कारण घरों में रहने वाले लोगों तक को भी साँस लेने में दिक़्क़त होने लगती है। आँखें ख़राब होने लगती हैं। जो लोग दफ़्तरों में जाकर काम करते हैं या सफ़र में रहते हैं, शाम तक उनका चेहरा तक काला पड़ जाता है। नाक और गले में काला कार्बन जम जाता है।

डॉक्टर दिव्यांग देव का कहना है कि समय रहते अगर सरकार ने वायु प्रदूषण पर रोक के लिए कोई कारगर क़दम नहीं उठाये, तो आने वाले दिनों में देश में फेफड़ों से सम्बन्धित बीमारियों के मरीज़ों की संख्या बढऩा निश्चित है। रहा सवाल मास्क का, तो मास्क को ज़्यादा समय तक प्रयोग में लाने से साँस सम्बन्धी दिक़्क़त तो होती ही है। इसलिए सार्वजनिक जगह पर ही मास्क लगाएँ।

पर्यावरणविद् डॉक्टर सुबोध कुमार का कहना है कि कोरोना के बाद बढ़े हुए वायु प्रदूषण को लेकर लेकर लोगों के बीच में बैचेनी है। लोग वायु प्रदूषण के चलते तनाव में हैं। लेकिन कोई बीमारी हो या अन्य प्राकृतिक आपदा आये, भ्रष्ट तंत्र के चलते किसी भी परेशानी का समाधान आसानी से नहीं हो पाता है। वायु प्रदूषण की ही बात करें, तो इसे कम करने के लिए हर साल करोड़ों रुपये का बजट रखा जाता है। इस बजट को लेकर अधिकारियों और एजेंसियों के बीच जमकर गुटबन्दी होती है और फिर हेराफेरी की जाती है, जिसके चलते वायु प्रदूषण में सुधार तो उनके अपने तरीक़े से ही होता है। हाल यह है कि अन्य स्रोतों से आया हुआ बजट भी इस पर ख़र्च हो जाता है। उन्होंने बताया कि सन् 2018 में केंद्र सरकार ने वायु प्रदूषण रोकने के लिए अच्छा-ख़ासा बजट दिया था; लेकिन वायु प्रदूषण से निपटने में तंत्र काफ़ी हद तक नाकाम ही रहा। अफ़सोस यह है कि किसानों पर पराली जलाकर प्रदूषण फैलाने के जो आरोप लगाये जाते रहे हैं, हक़ीक़त में ये आरोप ख़ुद को बचाने के लिए हैं। यह बात सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है। यह सच्चाई सामने आयी है कि पराली के कारण तो प्रदूषण मात्र 5 से 10 फ़ीसदी ही बढ़ता है। सच तो यह है कि पुराने वाहनों, फैक्ट्रियों, निर्माण, वाहनों की बढ़ती संख्या, भारी मात्रा में विस्फोटक और आग जलाने से प्रदूषण तेज़ी से बढ़ता है। सडक़ों पर प्रदूषण मानक को ताक में रखकर कई वाहन दौड़ते हैं। इनमें कई तो विकट धुआँ उगलते चलते हैं। इसी तरह दिल्ली-एनसीआर में तामाम सियासी लोगों की फैक्ट्रियाँ नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से चल रही हैं। इन फैक्ट्रियों के पास न तो प्रदूषण-रोधी उपकरण हैं और न ही लाइसेंस है। इसके कारण पूरे वातावरण में धुआँ-ही-धुआँ फैलता है और लगातार प्रदूषण फैलता है।

दिल्ली प्रदूषण कंट्रोल विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि वायु प्रदूषण को लेकर अफसरों के बीच एक ही मैसेज है कि यह तो सलाना संकट है। इसमें जो कुछ भी होगा समय के साथ स्वत: होगा। इसके चलते कोई ख़ास काम नहीं होता है। अधिकारी ने बताया कि महानगरों में अगर कोई वायु प्रदूषण के नाम पर कोई कारोबार पनपा है, तो वो है वायु शोधन (एयर प्यूरीफेशन) मशीनों का, जिसमें कारोबारी सरकारी से लेकर निजी कम्पनी में वायु शोधन मशीनें लगा रहे हैं और बता भी रहे हैं कि मौज़ूदा दौर में यह सब ज़रूरी है। कुल मिलाकर वायु प्रदूषण से यह कारोबार ख़ूब फल-फूल रहा है।

दिल्ली सरकार के स्टेट प्रोग्राम ऑफिसर (एनसीसीएचएच) डॉक्टर भरत सागर का कहना है कि वायु प्रदूषण के कारण मौज़ूदा समय में दमा और साँस लेने में तकलीफ़ के सबसे ज़्यादा मरीज़ बढ़े हैं। बच्चों को नेवुलाईजर (कणित्र) तक लेने को मजबूर होना पड़ रहा है, जो चिन्ता का विषय है। डॉक्टर भरत सागर का कहना है कि वायु प्रदूषण के कारण हमारे देश के नौनिहाल श्वास सम्बन्धी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।

दिल्ली दवा के कारोबारी सम्पत लाल का कहना है कि देश में मास्क का कारोबार तेज़ी से बढ़ा है। पहले कोरोना के चलते और अब वायु प्रदूषण के चलते इस कारोबार में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। लोगों में जागरूकता बढ़ी है, जिसके चलते अब बच्चों से लेकर युवा और बुज़ुर्ग तक मास्क का उपयोग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मास्क का कारोबार बढऩे का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब रेहड़ी-पटरी से लेकर पनवाड़ी और परचून की दुकानों पर भी मास्क मिल जाता है; जबकि पहले मास्क केवल दवा विक्रेताओं के पास (मेडिकल स्टोर्स पर) ही मिलता था।

आईसीएमआर के एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी का कहना है कि वायु प्रदूषण से शरीर का हर अंग प्रभावित होता है। फिर भी सरकार की ओर से इस मामले में गम्भीरता से कोई पहल नहीं की जा रही है। वायु प्रदूषण के नाम पर सियासत ही होती है। जबकि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सार्थक क़दम उठाने की ज़रूरत है। देखने वाली बात यह है कि हर साल जब नवंबर-दिसंबर के महीने में वायु प्रदूषण बढ़ता है, तभी शोर होता है और तात्कालिक कोशिशें की जाती हैं। उन पर भी लीपापोती होती है। जबकि वायु प्रदूषण पर क़ाबू पाने के लिए साल भर उचित और ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है, ताकि इन दो महीनों में प्रदूषण बढ़े ही नहीं।