सालाना संकट बन चुका वायु प्रदूषण

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. आदित्य कुमार कहते हैं कि सन् 2000 से संसद में वायु प्रदूषण को लेकर चिन्ता व्यक्त की गयी थी और उन पहलुओं पर ग़ौर किया गया था, जो वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं। लेकिन देश की सरकारी व्यवस्था ऐसी है कि वह इंतज़ार करती है कि समस्या का समाधान ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाए। इसके चलते वायु प्रदूषण एक स्थायी समस्या बनकर हमारे सामने है। प्रो. आदित्य का कहना है कि वायु प्रदूषण महानगरों में अक्टूबर महीने से दिसंबर के महीने तक लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करता है, जिससे निपटने के लिए गम्भीरता से क़दम उठाये जाने का ज़रूरत है।

पर्यावरणविद् डॉक्टर सुबोध कुमार का कहना है कि वायु प्रदूषण को रोकने की बजाय एक-दूसरे कोसने की राजनीति जब तक होती रहेगी, तब तक वायु प्रदूषण एक स्थायी समस्या रहेगी। क्योंकि पहले पराली जलाने वालों को वायु प्रदूषण फैलाने के लिए दोषी ठहराने और राजनीतिक दलों द्वारा एक-दूसरे को कोसे जाने की रीति बन गयी है। जब अकेले पराली जलाने के आरोप से काम नहीं चलता, तो अन्य कारकों के लिए राज्य सरकारों में एक-दूसरे को दोषी ठहराने की होड़-सी लग जाती है। इस सबसे समस्या का समाधान न होकर समस्या बढ़ जाती है। डॉक्टर सुबोध कुमार कहते हैं कि नवंबर महीने में सर्वोच्च न्यायालय ने बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा था कि नौकरशाही जड़ता में चली गयी है और न्यायालय के निर्देश की प्रतीक्षा कर रही है। न्यायालय की सख़्त तल्ख़ी के बाद शासन-प्रशासन चौंकन्ने तो हुए; लेकिन समाधान न के बराबर ही हुआ है। अब भी दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर ख़राब बना हुआ है। दिल्ली प्रदूषण विभाग में काम करने वालों ने ‘तहलका’ को बताया कि जब धुन्ध में शासन रहने का आदि हो जाए, तो आम आदमी क्या कर सकता है? सवाल यह है कि जब वायु प्रदूषण को रोकने और प्रदूषण बढ़ाने वालों को चिह्नित किया जा चुका है, तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती है? कार्रवाई के तौर पर दो-चार दिनों के लिए कारख़ानों को बन्द कर दिया जाता है। फिर साँठ-गाँठ करके उन कारख़ानों को फिर चालू करा दिया जाता है। जिन संस्थाओं को प्रदूषण रोकने और प्रदूषण बढ़ाने वालों को चिह्नित करने के लिए लगाया गया है, वो ही ख़ुद वायु प्रदूषण को बढ़ाने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बजाय उनकी चौकीदारी करती हों, तो दूषित-प्रदूषित माहौल से कैसे बचा जा सकता है?

पर्यावरण बचाओ पर गत दो दशक से काम करने वाले राजेश शुक्ला का कहना है कि जब तक धरातल पर सरकार प्रदूषण फैलाने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करेगी, तब तक वायु प्रदूषण से हर साल लोगों के जीवन से खिलवाड़ होता रहेगा। दरअसल प्रदूषण रोकने से सम्बन्धित विभाग जो हैं, वो सब उदासीनता के शिकार हैं। उन्होंने कहा कि जब तक यह भ्रान्ति रहेगी कि सर्दी के आते ही वायु प्रदूषण फैलता है, तब तक कुछ भी नहीं हो सकता है। क्योंकि वायु प्रदूषण को साल भर के हर दिन भयानक रूप से फैलाया जा रहा है। शहरों में वायु प्रदूषण के कहर को लेकर जागरूक जनता आवाज़ उठाती है, जबकि गाँवों की जनता चुपचाप पीडि़त की तरह सहन करती रहती है। राजेश शुक्ला कहते हैं कि शासन-प्रशासन की नाक के नीचे हर रोज़ वायु प्रदूषण फैलाया जाता है, जिसमें कूड़े के ढेरों को जलाया जाना शामिल है। सरकारी पुलों के नीचे टायरों को जलाया जाता है। सालोंसाल पुराने वाहन जो खुलेआम ध्वनि प्रदूषण के साथ ज़हरीला धुआँ छोड़ते हुए दौड़ते हैं। जब तक इन सब पर रोक नहीं लगेगी, तब तक वायु प्रदूषण बढ़ता रहेगा।

दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में पढऩे वाले रोमित कुमार का कहना है कि जब देशवासियों को स्मार्ट सिटी जैसे सपने दिखाये गये, तब उम्मीद जगी थी कि देश को दूषित परिवहन व्यवस्था के साथ प्रदूषण जैसी समस्या से निजात मिलेगी। लेकिन अब स्मार्ट सिटी की बात ही नहीं हो रही है। कुल मिलाकर वायु प्रदूषण ख़ुद ही प्राकृतिक रूप से कम होगा, तब ही वायु प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी।