साख का सवाल

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मरवाहीः  आदिवासियों के लिए आरक्षित इस सीट पर कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को लॉन्च किया है. मरवाही अजीत जोगी की पारंपरिक सीट रही है. अमित से मुकाबला करने के लिए भाजपा ने लगातार दो बार से जिला पंचायत सदस्य समीरा पैकरा को उम्मीदवार बनाया है. नर्मदा के उद्गम अमरकंटक के रास्ते पर स्थित कोटा (अमित की मां रेणु जोगी का विधानसभा क्षेत्र) और उससे सटा आदिवासियों के लिए सुरक्षित मरवाही विधानसभा क्षेत्र पिछले दस वर्षों से अजीत जोगी के अभेद किले की तरह है. सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से पढ़ाई करने वाले अमित की छवि कई बार आरोपों के चलते धूमिल होती रही है. उन पर एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की हत्या का आरोप भी लग चुका है. हालांकि इस मामले में स्थानीय अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है, लेकिन अभी उनके खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील लंबित है. इसके अलावा पिता अजीत जोगी की तरह उनके भी आदिवासी होने पर सवाल उठाए जाते रहे हैं.

मरवाही में अमित जोगी के पक्ष में उनकी पत्नी ऋचा जोगी गांव-गांव में जनसंपर्क कर रही हैं. मरवाही क्षेत्र में जोगी का पुश्तैनी गांव जोगीसार है. यहां अधिकांश गांवों में भाजपा समेत किसी भी दूसरी पार्टी का झंडा और बैनर-पोस्टर तक नजर नहीं आ रहा है. मरवाही के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 1952 से हुए विधानसभा चुनावों में यहां से दस बार कांग्रेस और दो बार भाजपा विजयी हुई है. ऐसे में भाजपा यहां किसी चमत्कार की आशा कर रही है. लेकिन टीम जोगी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है.

amit-jogi-congressबिलासपुरः  दूसरे नंबर पर सबसे अहम सीट बिलासपुर में भाजपा की तरफ से तीन बार जीत चुके स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल चुनाव मैदान में है. उन्हें टक्कर देने के लिए कांग्रेस ने बिलासपुर महापौर वाणी राव को मौका दिया है. दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अमर अग्रवाल के पास नगरीय प्रशासन विभाग का भी प्रभार है. ऐसे में वाणी राव के महापौर बनने के बाद से लगातार दोनों के बीच बिलासपुर की शहरी विकास योजनाओं को लेकर कई बार तू-तू मैं-मैं की नौबत भी बनती रही है. पिछले आठ विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो लगता है कि बिलासपुर विधानसभा के मतदाताओं के मूड का अंदाजा लगाना मुश्किल  है. वर्ष 1977  से 1985 तक कांग्रेस से बीआर यादव ने यहां से जीत की हैट्रिक बनाई थी. 1990 में भाजपा के मूलचंद खंडेलवाल ने यहां से जीत हासिल की. वर्ष 1993 में फिर बीआर यादव यहां से विधायक बने. लेकिन उसके बाद लगातार 1998, 2003 और 2008 में भाजपा के अमर अग्रवाल यहां से जीत हासिल करते रहे हैं. बिलासपुर में सतनामी, सिंधी और दक्षिण भारतीय मतदाता बड़ी भूमिका निभाते हैं. कांग्रेस मानकर चल रही है कि उनकी दक्षिण भारतीय मूल की उम्मीदवार को दक्षिण भारतीय मत जरूर मिलेंगे. लेकिन भाजपा ने इन्हें रिझाने के लिए पार्टी के पूर्व अध्यक्ष वैंकेया नायडू की सभा आयोजित कराई है. सिंधी मतदाताओं के लिए जहां बिलासपुर सीट पर पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की सभाएं हुईं. वहीं सरकार से नाराज सतनामियों को मनाने के लिए पार्टी के कार्यकर्ताओं की फौज पूरे क्षेत्र में जनसंपर्क कर रही है.

दुर्गः  इस हाईप्रोफाइल सीट पर भाजपा ने पंचायत मंत्री हेमचंद यादव को मैदान में उतारा है. वहीं कांग्रेस ने पुराने चेहरे अरुण वोरा को एक मौका और दिया है. अरुण वोरा कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के सुपुत्र हैं. यही कारण है कि बार-बार हारने के बाद भी कांग्रेस दुर्ग से उम्मीदवार नहीं बदल रही है. कहा तो यह भी जा रहा है कि उन्हें टिकट मिल सके इसलिए राहुल फॉर्मूले को किनारे लगाया गया है.

दुर्ग शहर विधानसभा क्षेत्र में 1993 से लेकर 2013 तक पांचवीं बार कांग्रेस के अरुण वोरा और भाजपा के हेमचंद यादव आमने-सामने हैं. लेकिन इस बार स्वाभिमान मंच के प्रत्याशी राजेंद्र साहू की उपस्थिति ने मुकाबला और भी रोचक बना दिया है. 2008 के चुनाव में भाजपा के हेमचंद यादव को 0.61 प्रतिशत वोट ज्यादा मिले थे और वे 702 मतों से चुनाव जीत गए थे. हालांकि दुर्ग विधानसभा शुरू से कांग्रेस का गढ़ रहा है. 1972 में कांग्रेस के  मोतीलाल वोरा यहां विधायक बने थे. उसके बाद एक उपचुनाव को मिलाकर पांच चुनाव लगातार जीतने का रिकॉर्ड उनके नाम है. 1993 में कांग्रेस का टिकट उनके बेटे अरुण वोरा को मिला और वे विधायक निर्वाचित हुए. लेकिन 1998 में कांग्रेस के इस गढ़ पर भाजपा ने सेंध लगा दी और उसके बाद हेमचंद यादव जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं. हालांकि इस बार स्वाभिमान मंच के राजेंद्र साहू कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही गणित को बिगाड़ते नजर आ रहे हैं चूंकि इस चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बन रही है, इसलिए भाजपा और कांग्रेस को मिलने वाले मतों में अंतर जरूर पड़ेगा.

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