सवाल है कौन मारेगा बाजी तेलंगाना में

0
600

बहुत ही कम अंतर से बहुमत पाकर तेलंगाना राष्ट्र समिति ने राज्य में सरकार बनाने का न्यौता चार साल पहले पाया था। इस दौरान मुख्यमंत्री ने पार्टी पर और शासन में अपनी गिरफ्त बनाए रखने के इरादे से बेटे और बेटी को साथ लिया। उधर पार्टी में परिवार तो हावी हुआ पर दूसरे नेता कमजोर। चार साल में मुख्यमंत्री ने तमाम तरह के कई दिन चलने वाले भव्य यज्ञ कराए और खूब पूजा-पाठ किया। बताया गया कि यह सब राज्य की खुशहाली और समृद्धि के लिए हैं। लेकिन इन सबसे राज्य के अधिकांश मतदाता खिन्न रहे। टीआरएस के कई विधायकों ने यह महसूस किया कि वे चुनाव में हार सकते हैं।

टीआरएस राज में कई विधायकों और बाहर से आकर विधायक बने नेताओं (दूसरे दलों से आए) में मतभेदों का सिलसिला सुनाई देने लगा। राज्य में मुख्यमंत्री ने कई नए जिले विकास के आधार पर तो बना दिए लेकिन उस आधार पर विधानसभा सीटें नहीं बढ़ी।

दूसरी ओर जनप्रिय योजनाएं मसलन कल्याण लक्ष्य, शादी-मुबारक, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, किसानों के लिए पांच लाख रुपए मात्र का बीमा और इन्सेंटिव सब्सीडी योजनाएं चैथे साल में शुरू की । जाहिर है ऐसी योजनाओं की होड में कुछ मझोली और बड़ी सिंचाई योजनाएं शुरू की। इनसे नेताओं में एक आत्मविश्वास ज़रूर बढ़ा । महत्वपूर्ण सिंचाई योजना कालेश्वरम को तो पार्टी आने वाले चुनावों में बतौर नारे इस्तेमाल भी करेगी।

टीडीपी क्या टीआरएस या कांग्रेस के साथ होगी

तेलुगु देशम पार्टी क्या विपक्षी दलों की एकता को और मज़बूत करेगी।  इसके सुप्रीमो और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के अनुसार इस गठजोड़ को नकारा नहीं जा सकता। हालांकि उन्होंने अपनी ओर से कोई इशारा नहीं किया कि वे खुद किसके साथ हैं और वे किसके साथ हो सकते हैं।  लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह समझौता तेलंगाना राज्य की टीआरएस सरकार या फिर कांगे्रस के साथ संभव है। तेलुगु देशम वह पार्टी है जिसने आंध्र प्रदेश के बंटवारे का विरोध किया था। दो बार लगातार सत्ता में रहने के कारण इसकी अपनी पहचान पर अब संदेह होता है। बहुत से महत्वपूर्ण नेता और विधायक कांग्रेस और  टीआरएस में चले गए। राज्य के विभाजन के पहले पिछले चुनाव के दौर से पहले इन नेताओं को विभाजन के बाद अच्छे पद और जगहें भी मिल गई।

हालांकि ‘वोटों के बदले नकदीÓ का मामला दो साल पहले उभरा और आज भी दिखता है। इससे पार्टी की ताकत पर असर पड़ा है। पार्टी के 15 विधायकों ने जो पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था। अब उनमें सिर्फ दो बचे हैं। जो पार्टी में आज भी हैं। इसी बीच 31 जि़लों के 20 जि़ला पार्टी अध्यक्ष या तो टीआरएस से जा मिले या फिर कांग्रेस से। इससे यह पता लगता है कि राज्य में आज  तेलुगु देशम पार्टी की क्या स्थिति है।