सवालों को लांघती राजनीति

इधर भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं में यह उम्मीद थोड़ी-थोड़ी नज़र आने लगी है कि त्रिपुरा के चुनाव परिणामों की तजऱ् पर उनके भाग्य की झोली में 2019 के चुनाव में तेलंगाना आ सकता है।

भारतीय जनता पार्टी के प्रादेशिक और स्थानीय नेताओं से बातचीत करने पर भान होता है कि दक्षिण में ‘भाग्यवादÓ पर टिकी भाजपा अब भविष्य के सपने देख रही है। उसके पास विरोध में उठाने के लिए तेलंगाना में न मुद्दे ही हैं न कोई चुनावी रणनीति। सबके सब बिखरे पड़े हैं और अमित शाह के चमत्कार के फेर में उलझे है।

कुछ का कहना है कि बंडारू दतात्रेय को मोदी ने सत्ता से निष्कासित कर दिया है। इसके चलते वे अब खामोश हो गए हैं। मोदी द्वारा मेट्रो रेल के उद्घाटन पर भी वे समारोह में नहीं आए थे। ऐसी स्थिति में सिर्फ विधायक किशन रेड्डी का चेहरा मुख्य रूप से भाजपा की ओर से 2019 के चुनाव में आगे रहेगा। मोदी और अमित शाह दोनों तेलंगाना में युवा नेतृत्व ही चाहते हैं।

इधर तेलंगाना सरकार की फाँस बने हैं कोदण्ड राम रेड्डी जो तेलंगाना संयुक्त कार्य समिति के नेता हैं और इन दिनों तेलंगाना सरकार के खिलाफ बड़े स्तर पर आंदोलन छेड़ रहे हैं। उनकी लड़ाई के मूल में केसीआर द्वारा छात्रों की अवहेलना और उन्हें रोज़गार देने के मामले में अधिकारों से वंचित रखा जाना बताया जाता है। हाल ही में पुलिस दमन का एक उदाहरण तेलंगाना में देखने में आया है और वह है कोदण्ड राम के मिलियन मार्च को कुचल देने वाला। ऐसे में कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी भी केसीआर के पीछे हाथ धोकर पड़ी है।

इन सब के चलते टीआरएस की रातों की नींद उड़ गई हैं क्योंकि चुनावी बदलाव की चिंगारियां, भावी राजनीति का विकास करती हैं। तेलंगाना में कौन सी खिचड़ी पक रही है, सब जानते हैं। विशेष कर अमित शाह के आगमन के बाद बस्ती-बस्ती में भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय खुल रह हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं का समर्थन उन्हें पृष्ठभूमि में प्राप्त हो रहा है।

फिलहाल एमआईएम के समर्थन से केसीआर ने राज्य सभा के चुनाव में अपने भांजे संतोष कुमार, लिंगैया यादव और बी प्रकाश को मैदान में उतारा है। ऐसे में अपने दम पर कांग्रेस के राज्य सभा उम्मीदवार जीतने के स्थिति में नहीं है। टीआरएस की तीसरी सीट पर असदुद्दीन ओवैसी का पूरा दखल है। यह मामला आपसी तौर पर सुलझ जाएगा।

फिलहाल तेलंगाना विधानसभा और विधानपरिषद में बजट सत्र चल रहा है जिसमें किसानों के अलावा जन कल्याण की योजनाओं, विकास के कार्यक्रमों को बल दिया गया है।

इस त्रिशंकुवादी राजनीतिक हलचलों में भारतीय जनता पार्टी का हस्तक्षेपी चेहरा सबसे ताकतवर नज़र आ रहा है, क्योंकि यह एक ऐसा मोड़ है जिसमें इतिहास को एक बार और खंगाला जाएगा । अमित शाह ने अपनी पिछली यात्रा में रज़ाकार (देश द्रोही) आंदोलन में मरने वालों और निज़ाम के विरुद्ध रहे सेनानियों से मिलकर हिंदू मतों के एकीकरण का प्रतिमान गढ़ा था। देखना है वह के चंद्रशेखर राव के मुस्लिम समर्थित तेलंगाना के भविष्य को कितना सुरक्षित कर पाएगा। इस सवाल के पीछे वर्तमान बोलता है और जीत की संभावना के द्वार तक तीसरे हाथ के पहुंचने से भी इंकार नहीं कर सकता है। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की कूटनीति अपनी पार्टी का भविष्य गढऩे में औरों की अपेक्षा अधिक सक्रिय दिखाई देती है। जहां उनके पास इतिहास की आग भी है और वर्तमान की साख भी है।

स्वार्णिम तेलंगाना के सपने स्थानीय जनता उन्हें लेकर ही देख रही है क्योंकि शांतिपूर्वक हिन्दू मुस्लिम एकता वादी जीवन की मिसाल सिर्फ चंद्रशेखर राव ही कायम कर सकते हैं।