सवर्णों में बढ़ी उम्मीदें दस फीसद आरक्षण से

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सामाजिक न्याय और सबका साथ, सबका विकास के नाम पर भारतीय जनता पार्टी ने देश की ऊंची जातियों के आर्थिक तौर पर पिछड़ों को 10 फीसद आरक्षण देने का विधेयक पास करा ही लिया। यह विधेयक लोक लुभावन है लेकिन वह अद्भुत मृग त्रृष्णा है। भारत के विभिन्न जातियों, संप्रदायों में विभाजित समाज में इस आरक्षण से और ज्य़ादा असंतोष बढ़ेगा और ढेरों नई समस्याएं सामने आएंगी जिनका मुकाबला सत्ता की किसी भी पार्टी के लिए सहज नहीं होगा। देश की विपक्षी पार्टियों ने वोट राजनीति को ध्यान में रखते हुए नई आरक्षण नीति को समर्थन दिया। अपनी वैचारिक नासमझी जग जाहिर की।

हालांकि बसपा नेता मायावती खुद अगड़ों को दस फीसदी आरक्षण की बात करती रही हैं। कांगे्रस के पुरजोर विरोध न करने की यह वजह थी कि वह नहीं चाहती थी कि चुनावी घमासान में पीछे रहे। उसके सांसदों ने नौकरी और उच्च शिक्षा संस्थानों में संवर्णांे के गरीबों को पढ़ाई की संभावित सुविधा के भरोसे इस प्रस्ताव का समर्थन किया और कुछ विरोध भी। उन्होंने संविधान संशोधन की बात भी की। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश में जहां संवर्ण गरीबों की संख्या सबसे ज्य़ादा है, वहां की मुख्य विपक्षी पार्टियां मसलन समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी ने जानते-बूझते हुए इस विधेयक का पुरजोर विरोध नहीं किया। इसकी एक बड़ी वजह इन पार्टियों में शायद आर्थिक-सामाजिक आधार पर विचार शून्यता है।

हालांकि बसपा सुप्रीमो के सर्वधर्म समभाव हमेशा कहती रही है। जबकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद), द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने बहुत साफ  तरीके से आरक्षण के विरोध में मतदान किया।

सभी पार्टियों ने विरोध कम ही सही, लेकिन किया। संसद में जो दिखा उससे यह ज़रूर साफ था कि सभी विपक्षी दल यह समझ रहे हैं कि सवर्ण आरक्षण एक शुरूआत हैं आर्थिक आधार पर आरक्षण की। ज्य़ादातर ने विधेयक की विसंगति गिनाई लेकिन यह उम्मीद भी जताई कि न्यायिक आधार पर इस पर रोक लगे। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय क्या खुद फैसला ले सकता है? क्या अदालत का दरवाजा कोई सवर्ण खटखटाएगा?

कुल मिला कर सवर्ण आरक्षण सत्ता पार्टी की सत्ता में लौटने की अद्भुत चाल है। इस मुद्दे पर कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को सदन में इस तरह जकड़ा गया कि चाह कर भी वे अपनी बुनियादी विरोध नहीं जता पाए। अब चुनाव मैदान में किस तरह मतदाताओं का पानी ऊंची जाति के पिछड़ों को विपक्ष इस मृग मरीचिका से कितना आगाह कर पाते हैं। यह तो आने वाले दिनों मेें ही साफ होगा।

बसपा (बहुजन समाज पार्टी) और सपा (समाजवादी)भले सवर्णों के आरक्षण का बिल पास होने से रोक नहीं पाते। लेकिन उनके सांसदों का यह तर्क कि कुछ को तो नौकरी मिलेगी क्या उपयुक्त था? क्या सामाजिक न्याय मनमानी है? खुद को विपक्ष मानने वाली बसपा और सपा की आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की मांग भी सिर्फ नारा थी।

बसपा नेता मायावती अपने भाषणों में ज़रूर सवर्ण जातियों को दस फीसदी आरक्षण की मांग करती रही हैं। उनके इस मुद्दे का भाजपा ने अपने हित में उपयोग कर लिया विपक्ष ही नहीं देश के बुद्धिजीवियों को भी भाजपा ने इस मुद्दे पर राय-मश्विरे का मौका नहीं दिया।

देश में जातिगत जनगणना भी हुई है लेकिन उसका ब्यौरा सार्वजनिक नहीं हुआ। समाज शास्त्रियों के अनुसार मध्यप्रदेश में ओबीसी को आरक्षण सिर्फ 14 फीसद है जबकि राज्य की आबादी में भागीदारी 50 फीसद की है। इस आरक्षण को 27 फीसद करने की मांग काफी समय से होती रही है। लेकिन न भाजपा और न कांग्रेस ने कभी ध्यान नहीं दिया।

अब राज्य मे सवर्णों में आर्थिक तौर पर दुर्बल का आरक्षण 10 फीसद होगा। उत्तरप्रदेश छोड़ दें तो। पर उनकी कुल आबादी कितनी है। यह जानकारी साफ नहीं है। लेकिन आर्थिक सीमा के हिसाब से उनकी संख्या चार से पांच फीसद ही होगी? उत्तरप्रदेश, राजस्थान को यदि सामने रखें तो वहां भी चार या पांच फीसद से ज्य़ादा को लाभ नहीं मिलेगा।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व की एनडीए सरकार ने ऊँची जातियों के आर्थिक तौर  पर पिछड़े लोगों के लिए दस फीसद आरक्षण सरकारी नौकरियों और ऊँचे शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले के लिए सदन में पेश कर दिया । सत्ता में अपने साढ़े चार साल की अवधि पूरी होने और सदन के आखिरी दिनों में बड़ी ही सूझबूझ और गोपनीयता के साथ पेश किया गया यह विधेयक विपक्ष की विचार शून्यता के चलते तुरंत पास भी हो गया। लेकिन इसके साथ देश में आरक्षण के उद्देश्य पर बहस की एक नई परिपाटी भी जन्मी।

अब तक यह प्रथा थी कि विभिन्न समुदायों और वर्गों को सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या से संविधान की भावना के अनुरूप आरक्षण का लाभ मिल जाता था। यह लाभ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए तय आरक्षण के अलावा होता था। अब तक आरक्षण में कोई आर्थिक आधार भी नहीं था। जिससे पिछड़ेपन का अहसास हो। अलबत्ता 90 के दशक में एक सरकार ने ऊँची जाति के पिछड़े गरीबों के लिए एक कोटा निधार्रित करने की सोची थी। लेकिन एपेक्स कोर्ट ने उस प्रस्ताव को इस आधार पर रद्द किया कि यह संविधान सम्मत नहीं है। अदालत में तब यह  भी तय किया कि आरक्षण की सीमा 50 फीसद से ज़्यादा की नहीं होगी।

लेकिन अब सवर्ण जातियों के लिए आर्थिक आधार पर दस फीसद आरक्षण की पेशकश को अमल में लाने के लिए संविधान संशोधन के जरिए सीमा को बढ़ाने की बात भी हुई। यह भी कहा गया कि गरीब विरोधी इस कदम को उठाने के लिए सरकार ने सामाजिक न्याय की अनदेखी की।

आज देश में आर्थिक हालात इस कद्र असामान्य है कि निजी क्षेत्र में नई नौकरियां नहीं बन पा रही हैं। सरकारी क्षेत्र में भी यह स्थिति नहीं है कि वहां इतनी नौकरियां हो जिनका लाभ आरक्षित तबके के लोगों को मिले । ऐसी हालत में आर्थिक तौर पर ऊँची जातियों के पिछड़े लोगों को आरक्षण सिर्फ जुमला ही लगता है। दूसरे एक नए वर्ग को आरक्षण से समाज के हर वर्ग में एक-दूसरे के प्रति खासा असंतोष पनपेगा। सीमित स्थानों के लिए विभिन्न जातियों के समर्थ लोगों में खासी प्रतिद्वद्विता होगी और निचले तबके के लोगों में समुचित तैयारी न होने से प्रतियोगिताओं में आरक्षण की दौड में फिर पीछे रह जाएंगे। ऐसे में आरक्षण का मकसद जो समान अवसर का था कि सभी को एक समान शिक्षा और अवसर मिले। वह पूरा नहीं हो सकेगा।

पिछले कुछ दिनों से विभिन्न राज्यों में मराठा, जाट, पटेल क्षत्रिय आदि समुदायों के लोग सड़कों पर आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे थे। क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उन्हें न तो आर्थिक विकास का लाभ मिल रहा है और न आरक्षण का । जब ऐसे में जब 50 फीसद की सीमा का अतिक्रमण करके आरक्षण का दायरा बढ़ाया जा सकता है तो इन समुदायों को भी लाभ दिया जाए। महाराष्ट्र में मराठों की बात मानी गई पर अमल में अभी  भी नहीं है।

पूरे देश की विभिन्न जातियों, वर्गों के लोगों को आरक्षण का समुचित लाभ मिले। इसके लिए ज़रूरी है कि इस पर समय लगा कर समुचित राय-मश्विरा हो, संसद में बहस हो। अदालतों में ठीक तरह से एक-एक पहलू पर विचार हो तभी देश लोकतंत्र खुशहाल होगा और पनप सकेगा।

आरक्षण से क्या वाकई लाभ होगा?

कोई भी आरक्षण का कोटा हो वह प्रतिभावान लोगों को एक तरह से रोकने के लिए ही होता है। वित्तमंत्री अरूण जेटली ने तो राज्यसभा में कहा भी कि प्रतिभा को परीक्षा में हासिल अंको के आधार पर नहीं आंका जा सकता।

यह ऐसा पाठ है जिसे हमें काफी पहले जान लेना चाहिए था। हालांकि हम यह जानते थे कि जाति समर्थित कोटा पर विरोध होता है। लेकिन केपिटेशन फ्री कोटा, प्रबंधन कोटा, डोमीसाइल कोटा या ऐसे ही दूसरे कोटा पर नहीं। हमें फिर भी जानना चाहिए कि उनके लिए भी ‘कोटा’ संदेह का ही है। लेकिन ‘हमारा’ कोटा हमेशा दुरूस्त है। क्योंकि यह कोटा नहीं बल्कि जाति है। ‘हमारी’, और ‘उनकी’ ।

मोदी सरकार ने हमें यह जताया है कि आरक्षण का इस्तेमाल करके आर्थिक असमानता को दूर किया जा सकता है। यह पूछा जा सकता है कि फिर जाति आधारित आरक्षण क्यों? गरीबी आधारित आरक्षण क्यों नहीं? तब जवाब में शुरूआत होगी उस प्राथमिक सच्चाई से कि गरीबी में निचली जाति का होना आवश्यक नहीं हैं। हालांकि ज़्यादातर गरीब निचली जाति के दिखाए जाते हैं। सभी गरीब लोग चाहे वे किसी भी जाति के हों आर्थिक भेदभाव झेलते हैं। ऊँची जाति के लोगों ने भी इसे झेला जब वे गरीब थे। लेकिन गरीब जातियों के लोग अमीर हो जाने पर भी भेदभाव झेलते हैं। यानी उन्हें मकान उस बस्ती में नहीं मिल पाता जहां वे रहना चाहते हैं। या फिर वे किसी क्लब के सदस्य नहीं बन सकते। यह स्थिति होती है निचली जाति के डाक्टरों, प्रबंधकों कई इंजीनियरों और प्रोफेसरों के साथ। यह अलग किस्म का भेदभाव है।

आरक्षण से भेदभाव बढ़ता है। आरक्षण से कभी भी गरीबी से ज़्यादातर लोग बाहर नहीं निकल पाए। यदि किसी भी गरीब को भेदभाव का शिकार बनाना है तो उसे आरक्षण दे दो। जाति आधारित असमानता की बात ज़रूर आज़ादी के बाद की गई लेकिन उसका कोई खास असर नहीं हुआ। नेहरू युग में जाति पर ध्यान न देते हुए गरीबों को अमीरों से जोडऩे की कोशिश कहीं-कहीं हुई। लेकिन जातिगत असमानताएं दूर नहीं हुई। ऊँची जाति का होने का गरूर टूट नहीं सका गरीबी होने पर भी।

मंडल आंदोलन 1990-91 के दौर में हुआ। इसमें यह जानकारी सामने आई कि हमारे सर्वाधिक प्रिय अल्पसंख्यक थे ऊँची जाति के हिंदू जिन्हें महत्वपूर्ण कुर्सियां और विशेष अधिकार हासिल थे। ये पूरी जनसंख्या के लगभग 15 फीसद थे। आज भी हमारी जनसंख्या (तमाम ऊँची जातियों) का एक फीसद व्यक्ति सबसे अमीर है। उसके पास देश की सारी संपत्ति का आधा मालिकाना हक है। मंडल आंदोलन से अदर बैकवर्ड क्लास (ओबीसी) का दूसरा अवतार बना।

अब आम श्रेणी यानी जाति विहीन श्रेणी के आरक्षण की शुरूआत इसी नौ जनवरी 2019 से हुई है। इसमें समझाया गया है कि ऐसे ऊँची जाति के लोग जिन्हें एससी, एसटी और ओबीसी की ही तरह आरक्षण दिया जाना चाहिए। यह तीसरा अवतार हिंदू त्रिमूर्ति की तरह विनाशक भी हो सकता है। हो सकता है इस रिजर्वेशन का लाभ सिर्फ तीन-चार फीसद लोगों को ही मिल सके।