समय होत बलवान

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नरेंद्र मोदी अगर आज यहां तक पहुंचे हैं तो इसमें 2002 में हुए गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए दंगों की बड़ी भूमिका है. एक ऐसे प्रदेश में, जिसमें अल्पसंख्यक 10 फीसदी से भी कम हों, बहुसंख्यक आबादी के ध्रुवीकरण का परिणाम जानने के लिए किसी गणितज्ञ की जरूरत नहीं. मोदी तीन बार यहां जबरदस्त बहुमत के साथ चुनाव जीतकर अपनी सरकार बना चुके हैं. हालांकि दंगों के बाद आडवाणी जी की कृपा से किसी तरह अपना मुख्यमंत्रित्व बचा पाए मोदी ने अपनी नई पहचान गढ़ने के फेर में गुजरात में ठीक-ठाक काम भी किया है. मगर यहां का विकास और मोदी का काम इतना और ऐसा भी नहीं है जैसा खुद मोदी, उनके संगी-साथी और जनसंपर्क संस्था एप्को प्रचारित करते रहते हैं. इसीलिए विकास के इतने हो-हल्ले के बाद भी पिछले दस साल में मोदी हमेशा बहुसंख्यकों के ही नेता रहे. उन्होंने कभी अल्पसंख्यकों के ज्यादा नजदीक दिखने की कोशिश तक नहीं की.

जिस तरह से 2002 के दंगों ने मोदी को गुजरात में मजबूत बनाने की भूमिका निभाई, कुछ-कुछ वैसी ही भूमिका भाजपा में मोदी की भी है. मोदी के राजनीतिक जीवन में 2002 के दंगों से उपजे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के फायदे केवल गुजरात तक सीमित है. इससे आगे की बड़ी राजनीति के लिए यह काफी नहीं है. ठीक इसी प्रकार भाजपा के लिए भी मोदी की भूमिका उसे सबसे बड़ी पार्टी बनाने तक ही सीमित है. सरकार बनाने के लिए उसे भी मोदी से आगे जाकर कोशिश करनी होगी.

हमारे या किसी भी अन्य लोकतंत्र के इतिहास को देखें तो एक क्षेत्र, जाति या संप्रदाय को लेकर चलने वाले व्यक्ति या पार्टी एक निश्चित दायरे से बाहर की सफलता हासिल नहीं कर सके हैं. आज जिन आडवाणी को नीतीश कुमार और कांग्रेस भी मोदी से ज्यादा या सहज रूप से स्वीकार्य मान रहे हैं वे खुद भी इस बात के उदाहरण हैं. सभी जानते हैं कि भाजपा को दो से 182 सासंदों की पार्टी बनाने में अटल जी से ज्यादा बड़ी भूमिका आडवाणी की थी. लेकिन इससे वे देश के सर्वोच्च पद के स्वाभाविक अधिकारी नहीं बन सके.

खुद भाजपा भी इस बात का उदाहरण है. अपनी राजनीति के स्वर्णिम दौर में भी वह अधिकतम 182 सीटें ही जीत सकी थी. सरकार बनाने के लिए उसने अपने सभी विवादित मुद्दे–राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता–ठंडे बक्से में रख दिए. इसके बाद ही जैसे-तैसे उसे कुछ छोटी-बड़ी बैसाखियों का सहारा मिल सका था.

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