सबै भूमि ‘सरकार’ की

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रिवेरा 36 आवंटी वेलफेयर सोसाइटी उन लोगों को संगठन है जिन्हें रिवेरा टाउन में लॉटरी के जरिए एक तयशुदा कीमत पर मकान आवंटित हुआ था लेकिन स्वामित्व के लिए सोसाइटी अधिक कीमत मांग रही है. इसके अध्यक्ष जयंत यादव के मुताबिक, ‘ऐसा संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. जिस तरह मंडल ने सरकार से रियायती दर पर जमीन का लाभ लिया और विधायक व सांसदों को दिया है, उसी तरह यह लाभ सरकारी कर्मचारियों और आम जनता को पाने का हक है.’ सोसाइटी के तीन अलग-अलग समूहों ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ इसी साल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका लगाई है.

filesइस तरह की ज्यादती रिवेरा टाउन के सामान्य लोगों के साथ ही नहीं हुई. मध्य प्रदेश में 30 कॉलोनियां हैं जिनमें गृहनिर्माण मंडल ने भूखंड की रजिस्ट्री के समय बताई गई मकान की कीमत आखिरी मूल्य निर्धारण से कई गुना बढ़ाई है. इस ज्यादती के खिलाफ कई लोग अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं और यही वजह है कि मंडल को अपनी आमदनी का एक तिहाई हिस्सा अदालती केसों और वकीलों पर खर्च करना पड़ रहा है. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के वकील हेमंत श्रीवास्तव के मुताबिक, ‘यही काम यदि किसी बिल्डर ने किया होता तो वह जेल में होता. लेकिन सरकार में होने से कई अधिकारी बचे हुए हैं.’

जब तहलका ने रिवेरा टाउन के मामले में सरकार से जवाब जानना चाहा तो सभी से परस्पर विरोधी और गोलमोल बातें सुनने को मिलीं. गृहनिर्माण मंडल के आयुक्त मुकेश गुप्ता ने इस मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि केस हाई कोर्ट में है और इसलिए उनका कुछ बोलना ठीक नहीं. वहीं आवास विभाग के प्रमुख सचिव इकबाल सिंह बैंस का कहना था कि यह योजना गृहनिर्माण मंडल की है ही नहीं. उनके मुताबिक, ‘विधानसभा कमेटी के निर्देश पर मंडल ने यह कॉलोनी विधायक और सांसदों के लिए बनाई थी.’ लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या ऐसा कोई प्रस्ताव विधानसभा की कमेटी ने पास किया था तो उन्होंने कहा कि उनके पास विधानसभा कमेटी की बैठक के मिनिट्स (बिंदुवार चर्चा) ही हैं. इस बारे में मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री के सचिव एसके मिश्र ने बताया कि विधानसभा को इतनी छूट है कि वह किसी भी सरकारी नियम के ऊपर अपना आदेश जारी कर सकता है. बकौल मिश्र, ‘मुझे नहीं लगता कि एक विशेष वर्ग के लिए रिवेरा टाउन कॉलोनी जैसा बड़ा प्रस्ताव विधानसभा कैबिनेट की मंजूरी के बिना संभव है.’ मगर जब उनसे कैबिनेट के इस निर्णय की लिखित जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है. बाद में मध्य प्रदेश जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राकेश श्रीवास्तव ने आश्वासन दिया कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव कैबिनेट ने पास किया है तो वे इसकी एक कॉपी तहलका को उपलब्ध कराएंगे. किंतु एक हफ्ते की खोजबीन के बाद उन्हें भी विधानसभा से ऐसा कोई कागज नहीं मिला.

गृहनिर्माण मंडल की उद्देशिका में साफ लिखा है कि इसका उद्देश्य राज्य के आवासहीनों को आवास मुहैया कराना है. जबकि उसने रिवेरा टाउन में विधानसभा के निर्देश पर राजनेताओं के लिए जो कॉलोनी बनाई है उसमें लगभग सभी के पास एक से अधिक आवास हैं. मंडल की उद्देशिका में कहीं नहीं लिखा कि उसका काम मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, विधायक और सांसद के लिए विशेष कॉलोनियां बनाना भी है. इस बारे में मंडल के अध्यक्ष रामपाल सिंह राजपूत का कहना है, ‘व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए हमने नियमों में कई फेरबदल किए हैं. रिवेरा को इन्हीं नियमों के तहत बनाया गया है.’

[box]तहलका ने जब रिवेरा टाउन के निर्माण से जुड़े फैसले का कथित दस्तावेज जनसंपर्क विभाग से मांगा तो हमें एक हफ्ते के बाद भी उसकी कोई प्रति नहीं दी गई[/box]

रिवेरा कॉलोनी प्रदेश में अपनी तरह का अकेला मामला नहीं है जहां रसूखदार नेताओं ने आरक्षण के तहत मिलने वाले मकानों को भी हथियाने के लिए मनमुताबिक नियमों को बदलवाया हो. 2011 में भी ऐसा मामला सामने आया था जिसमें इन माननीयों ने एक से अधिक मकान होने पर भी आरक्षण के नियमों को ताक पर रखा और भोपाल के महादेव और कीलनदेवी अपार्टमेंट में सरकारी आवास हथियाए थे. इस सूची में भाजपा सांसद सुमित्रा महाजन, राज्यसभा सांसद अनुसुईया उईके और विधायक अरविंद भदौरिया के नाम हैं. वहीं कांग्रेस विधायक सुनील जायसवाल और एनपी प्रजापति ने भी मकान होने के बावजूद आवास लिए. इस पर कांग्रेस विधायक एनपी प्रजापति ने उल्टा चोर कोतवाल को डांटे के अंदाज में हमसे बात करते हुए कहा, ‘आजकल पत्रकारों के लिए राजनेता सबसे आसान निशाना हो गए हैं. क्या किसी पत्रकार ने कभी अन्य आरक्षित वर्गों को मिलने वाले मकानों से जुड़ी अनियमितताओं की पड़ताल की है?’

वहीं दिल्ली से कांग्रेस के सांसद संदीप दीक्षित ने भी सांसद कोटे से भोपाल के ग्रीन मैडोस कॉलोनी में सात साल पहले एक बंगला लिया था. नियम के मुताबिक केवल मध्य प्रदेश के विधायक या सांसद को ही मध्य प्रदेश गृहनिर्माण मंडल की कॉलोनी में कोटे से आवास मिल सकता है. लेकिन दीक्षित की दलील है, ‘विधायक प्रदेश का हो सकता है लेकिन सांसद तो पूरे देश का होता है.’ आखिर में सरकार, नेताओं और प्रशासन के स्पष्टीकरण के बाद हम घूम-फिरकर फिर उसी सवाल पर पहुंचते हैं कि जब आम लोगों के कोटे के मकान माननीयों के हिस्से में आने लगेंगे तो उनकी सुनवाई कहां होगी.

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