‘सबरीमाला पर मेरी बात पूरी तो सुनें’

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लग रहा है कि केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अब मैदान में उतर गई हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उनके कुछ कहने का मतलब नहीं है क्योंकि मैं फिलहाल केंद्रीय मंत्रिमंडल में हूं। लेकिन एक आम बात ज़रूर कह सकती हूं कि क्या आप मासिक धर्म के दौरान रक्त से सनी सैनिटरी नैपकिन पहने मित्र के घर जाना चाहेंगे। आप नहीं जाएंगे। फिर क्या लगता है कि ईश्वर के घर पर उस तरह जाना उपयुक्त होगा।

पूजा-पाठ करना मेरा अधिकार है। मुझे उसे अपवित्र करने का अधिकार नहीं है। मेरा यह निजी विचार है।

ईरानी ने ब्रिटिश हाईकमीशन और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आयोजित यू यंग थिंकर्से कांफ्रेस में यह टिप्पणी (11 अक्तूबर)की। ‘मी टू’ कार्यक्रम के तहत महिलाओं के यौन उत्पीड़त के खिलाफ चल रहे आंदोलन को उन्होंने अपना समर्थन दिया था। उन्होंने कहा, आज जो महिलाएं बोल रही हैं वे माताएं, बेटियां और पत्नियां हैं। वे बड़ा रिस्क ले रही हैं। ऐसा बोलना उनके लिए बहुत बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।

सबरीमाला पर ईरानी ने जो टिप्पणी की वह उस संदर्भ में थी जिसमें ओआरएफ के अध्यक्ष समीर शरण ने एक सवाल पूछा था। इस पूरे कार्यक्रम के दौरान जिन मुद्दों पर बातचीत हुई उनमें शरणर्थियों के अधिकार, मौसम परिवर्तन आदि थे। पश्चिमी भारत में ब्रिटेन के उप उच्चायुक्त क्रिरीपन साइमन ने एक विषय सूची बनाने की बात कही थी जिस पर मंत्री की मौजूदगी में बात हो।

सबरीमाला मुद्दे पर बोलते हुए ईरानी ने अपने बहु जातीय परिवार का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मैं खुद के बारे में अपने निजी जीवन के बारे में बताना चाहूंगी। मैं हिंदू हूं जिसकी शादी एक पारसी से हुई। मेेरे दोनों बच्चे पारसी हैं। वे इस धर्म का पालन करते हैं। पारसी धर्म का पालन करने का क्या मतलब है? दोनों बच्चे अग्नि मंदिर जाते हैं और प्रार्थना करते हैं। मंदिर चाहे मुंबई में हो, दिल्ली में हो या दुनिया के किसी भी हिस्से में हो। मां होने के कारण मेरे लिए इसका क्या मतलब है। जबकि एक राजनीतिक हूं केंद्रीय मंत्रिमंडल में हूं।  मेरे पारसी बच्चे और पारसी पति है। मैं बाहर ही खड़ी रहती हूं। सड़क किनारे या फिर अपनी कार में। मुंबई में अंधेरी में अग्नि मंदिर गई। जब मेरा बच्चा हुआ तो मैं उसे लेकर मंदिर गई। मंदिर के दरवाजे पर मैंने उसे अपने पति को दे दिया। क्योंकि मुझे कहा गया, कि यहां मत खड़ा रहो। ठीक? मैं मानती हूं कि पूजा का मेरा अधिकार है लेकिन मेरा अधिकार अपवित्रता का नहीं है। यही वह अंतर है जिसे हमें समझना चाहिए और सम्मान देना चाहिए।

ईरानी के बयान पर बहस शुरू हुई सोशल मीडिया पर। उन्होंने ट्वीट कर कहा, दो  तथ्यात्मक बयान हैं हिंदू धर्म में आस्था रखने वाली हिंदू की शादी पारसी धर्म मानने वाले से होती है। मुझे पूजा के लिए अग्नि मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। मैं पारसी समुदाय -पुजारियों के फैसले को आदर सम्मान देती हूं।

मैंने दो पारसी बच्चों की मां होने के नाते किसी अदालत में अपने अधिकार को पाने के लिए कोई याचिका कभी नहीं दी।

विरोध को नकारते हुए उन्होंने ट्वीट किया कि मेरी बात का जो गलत अर्थ निकाला जा रहा है वह अनुचित है। मैं आज तक कभी किसी ऐसे लोगों से महिला से नहीं मिली जो रक्तस्राव से डूबे हुए नैपकिन के साथ किसी दोस्त के घर जाना चाहे। क्या वह किसी को वह ‘नैपकिन’ देना चाहेगी। मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि मैं एक महिला हूं फिर भी मुझे अपनी बात कहने की पूरी आजा़दी नहीं है। जब तक मैं अपना उदारवादी नजरिया रखती हूं मुझे माना जाता है। यह कैसी ‘उदारता’ है?

 

आश्चर्य होता है कि टेक्सटाइल्स मंत्री स्मृति ईरानी यह कहें कि कोई महिला रक्तस्राव से भरी सैनिटरी नैपकिन लेकर किसी दोस्त के घर नहीं जाती। शायद वह नहीं जानती कि एक सच्चा दोस्त वही है जो तमाम परेशानियों में भी साथ दे। यदि कोई दोस्त घायल हो जाएं तो क्या उसकी मदद के लिए दोस्त जाएगा नहीं। दरअसल ऐसा जान पड़ता है कि वह महिलाओं की ही बेइज्जती करने वाली महिला हैं। उन्हें रक्तस्राव से भरे नैपकिन अब खराब लग रहे हैं। इससे तो यही लगता है कि वह आधुनिक समाज में उस पुराने युग की बात कर रही हैं जब लड़कियों और महिलाओं को उनके मासिक धर्म के दिनों में अछूत मान कर व्यवहार होता था। मुझे उनकी सोच पर अफसोस है। डा. सतीश मिश्र

मैं आपसे पूरी तौर पर सहमत हूं। वह महिला होकर महिलाओं का अपमान कर रही हैं। वह कहती हैं कि महिलाएं पूजा जाप करें। लेकिन वे रक्तस्राव वाले नैपकिन पहने हुए देव दर्शन न करें। उस स्थल को अपवित्र न करें। वे यह भी कह रही हैं कि जिन महिलाओं को रक्तस्राव हो रहा हो उन्हेें अपने मित्रों के यहां भी नहीं जाना चाहिए। इतनी दकियानूसी और पिछड़ी सोच। एसके अग्रवाल

सबरीमाला मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का बयान अत्यंत मूर्खतापूर्ण है। यह बयान स्त्री विरोधी नीति का ही हिस्सा है। जिसे वे गर्व के साथ दे रही हैं। रजस्वला होने का अर्थ जानते हैं। रजस्वला होना जीवन का संगीत से भरा होना होता है। रजस्वला होकर ही एक स्त्री किसी को जन्म देने मेें समक्ष होती है। पहली बार रजस्वला होने पर कई भारतीय समुदायों में उत्सव मनाया जाता है। इस उल्लास की जड़ में जीवन की सुगबुगाहट है। जीवन का स्पंदन है। रजस्वला होना अपवित्र होना कैसे माना जा सकता है। रजस्वला स्त्री ईश्वर की पड़ोसी है जो सृजन की क्षमता संजोए इसी पृथ्वी को सुंदरतम करने में संलग्न है। सुशीला पुरी