उत्तराखंड त्रासदी: सबब तो है सबक नहीं

दावा– यात्रा पड़ावों समेत स्थाई जगहों पर मेडिकल सुविधाएं सुधारी जाएंगी.

हकीकत– यात्रा मार्गों पर स्वास्थ्य सुविधाएं पटरी से उतरी हुई हंै. रास्ते में पड़ने वाले अधिकांश स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त डॉक्टर नहीं

दरअसल पर्वतीय क्षेत्रों में आधुनित तकनीक वाले रडार लगाए जाने बेहद जरूरी हैं ताकि अचानक आने वाली आपदाओं की स्थितियों को समय रहते काबू किया जा सके. इस सबके बीच रडार लगाने की बात कह कर भूल जाने वाली सरकार इस बार यात्रा पर आने वालों को मोबाइल एसएमएस के जरिए मौसम की जानकारी देने की बात कह रही है. लेकिन इस तरीके पर इसलिए भी संदेह उठ रहा है कि पिछले साल भारी बरसात के बाद बहुत सारे मोबाइल टावर ढह गए थे. तब समूची केदार घाटी की संपर्क व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी. वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत कहते हैं, ‘आपदा से निपटने को लेकर सरकारों की प्राथमिकता हमेशा से ही कामचलाऊ रही है. पहाड़ों में बादल फटने और भूस्खलन जैसी अचानक होने वाली घटनाओं में हर साल सैकड़ों जानें जाती हैं. ऐसे में रडार प्रणाली विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए था ताकि लोगों को समय रहते चेताया जा सके.’

हालांकि इस बार सरकार मौसम विभाग के पूर्वानुमानों और भविष्यवाणियों को लेकर संजीदा होने की बात कह रही है. आनंद शर्मा का कहना था कि पिछली आपदा के बाद आपदा प्रबंधन तंत्र के अधिकारियों ने प्रदेश के मौसम विभाग से बैठकों के जरिए संवाद भी कायम किया है. लेकिन इसके बाद भी यह कहना मुश्किल है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा क्योंकि मौसम विभाग द्वारा दी जाने वाली चेतावनियों को फौरन लोगों तक पहुंचाने के लिए अभी भी उतने प्रभावी साधन नहीं हैं. ऐसे में चारधाम यात्रा से पहले अगर मौसम का मिजाज थोड़ा भी बिगड़ा तो यह सवाल फिर उठेगा कि मौसम के पूर्वानुमान के लिए जरूरी एहतियात क्यों नहीं बरती गई? यानी इस तरह देखा जाए तो यह बहस पिछली आपदा के बाद उठे सवालों पर ही वापस लौट आएगी.

उत्तराखंड में रडार लगाने की मांग नई नहीं है. 2008 में केंद्र सरकार ने अमेरिका के वेदर डिटेक्शन सिस्टम्स से बारह-बारह करोड़ रुपए में 12 डॉपलर रडार खरीदे थे. इनका मकसद आपदा के बारे में पहले से चेतावनी देने वाले संकेतों को मजबूत करना था. इनमें से दो रडार उत्तराखंड के लिए स्वीकृत किए गए थे. लेकिन नैनीताल और मसूरी में लगने वाले इन रडारों के लिए राज्य सरकार जमीन तक नहीं दे सकी.

इसके अलावा सरकार आपदा राहत कार्यों को लेकर दिए जाने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों को लेकर भी लगातार सवालों के घेरे में है. दरअसल पिछले साल आपदा राहत कार्यों में लगे एनडीआरएफ के जवानों के सामने पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई थीं. तब इस फोर्स के नौ जवानों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी थी. 2011-12 की कैग की रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई थी कि एनडीआरएफ के जवानों को पहाड़ी इलाकों में राहत कार्यों का उतना अनुभव नहीं है. इसके बाद आपदा वाली परिस्थितियों से निपटने को लेकर आपदा प्रबंधन विभाग ने स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण देने की बात कही. विभाग का कहना था कि स्थानीय लोगों को ट्रेनिंग देकर उन्हें भविष्य की योजनाओं में भी शामिल किया जाएगा. इसके लिए सरकार ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों के हर गांव में 10 या उससे अधिक युवकों को आपदा से निपटने को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई.

लेकिन इस योजना का क्या हुआ? पता चला कि पिछले साल आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा राहत कार्यों का प्रशिक्षण पाने वाले व्यक्तियों में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे नाम शामिल थे जिन्होंने या तो अभी तक जन्म भी नहीं लिया था या जिनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक थी. विभाग की वेबसाइट पर योजना के तहत प्रशिक्षण पाने वालों में कुछ की जन्मतिथि वर्ष 2014 की दिखाई गई थी, तो कुछ को 1947 से भी पहले पैदा हुआ बताया गया था. लेकिन जब तक यह मामला तूल पकड़ता विभाग ने अपनी वेबसाइट से इस सूची को ही गायब कर दिया. विभागीय अधिकारियों ने इसे लिपिकीय भूल बता कर औपचारिकता भी निभा दी थी. कारण चाहे जो भी रहे हों, इससे एक बात तो साफ मालूम पड़ती है कि प्रदेश का आपदा प्रबंधन विभाग किस कदर हड़बड़ी में काम कर रहा है. हालांकि विभाग द्वारा इस बार स्थानीय लोगों को सटीक प्रशिक्षण देने के दावे फिर से किए गए हैं लेकिन इन दावों की हकीकत क्या होगी यह कहना मुश्किल है.

प्रशिक्षण कार्यक्रमों से आगे की बात करें तो उत्तराखंड में आपदा संभावित इलाकों का उचित पुनर्वास ही आपदा से निपटने का सबसे अहम और कारगर उपाय है. लेकिन पिछले साल 16 जून को आई प्रलय के बाद राहत और बचाव कार्यों को अंजाम देने में ही सरकार को दो महीने का वक्त लग गया था. ऐसे में पुनर्वास को लेकर उसकी रफ्तार का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. इस दिशा में काम करने के उद्देश्य से प्रदेश में आपदा प्रबंधन विभाग के साथ ही आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण इकाई का गठन भी किया गया है. इस इकाई ने राज्य के तकरीबन दो सौ गांवों को भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील घोषित किया था. लेकिन आपदा के मुहाने पर बसे लोगों को सुरक्षित जगहों पर बसाने को लेकर इसने भी अब तक किसी कारगर योजना को अंजाम नहीं दिया है. पीयूष रौतेला का कहना था कि इस बारे में अभी कुछ भी ठोस पहल नहीं हो पाई है. यानी व्यवस्था हाथ पर हाथ धरे बैठी है. 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना में भी उत्तराखंड के खतरनाक गांवों की पहचान कर वहां एहतियाती कदम उठाने की बात की गई थी. लेकिन इसके बाद भी विस्थापन और पुनर्वास को लेकर मामला ढाक के तीन पात वाला ही है.

फोटोः राहुल कोटियाल
फोटोः राहुल कोटियाल

आंकड़े और घटनाएं बताती हैं कि जब-जब राज्य में आपदा आई, तब-तब आपदा नियंत्रण के मोर्चे पर सरकार लगभग बेबस खड़ी रही. मानसरोवर यात्रा के पड़ाव मालपा से लेकर उत्तरकाशी और ऊखीमठ के बाद पिछले साल केदारनाथ की आपदा तक पहाड़ों में कई दुर्घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं. लेकिन पुनर्वास पर सरकारी उदासीनता से लाचार प्रदेश के बहुत से इलाकों के लोग अब भी खतरनाक स्थितियों में रहने को मजबूर हैं. पिछले साल आई आपदा के बाद भी बहुत सारे प्रभावित इलाकों में लोगों ने फिर से उन्हीं जगहों पर रहना शुरू कर दिया है. अकेले केदारनाथ घाटी में ही अगस्त्यमुनि से लेकर गौरीकुंड तक दर्जनभर से अधिक इलाके ऐसे हैं. इसके अलावा श्रीनगर शहर के शक्तिविहार इलाके के लोगों ने भी अपने उन्हीं मकानों को फिर से आसरा बना लिया है जो पिछले साल की तबाही से गले-गले तक मलबे में डूब गए थे. यहां के लोगों का साफ कहना था कि उनके पास ऐसा करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है. ऐसे में यदि इस बार या फिर भविष्य में कभी भी कोई अनहोनी होती है तो इन लोगों की सुरक्षा को लेकर कुछ भी ठोस कवायद अभी तक धरातल पर देखने को नहीं मिली है.

आपदा प्रबंधन की दिशा में सरकार की एक अहम जिम्मेदारी यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना भी है. आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में हर साल सड़क हादसों में जान गंवाने वालों की संख्या सैकड़ों में रहती है. इनमें पहाड़ी से चट्टान गिरने से लेकर वाहनों के खाई में समा जाने तक के मामले सामने आते रहते हैं. लेकिन आपदा प्रबंधन विभाग के पास अभी तक इन हादसों से निपटने को लेकर कोई ठोस रणनीति नहीं है. केदारनाथ यात्रा के संदर्भ में सड़क निर्माण की क्या हालत है यह पिछली रिपोर्ट बता चुकी है.

सड़कों के क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में केदारनाथ जाने वाले यात्रियों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए सरकार हेलीकाप्टर व्यवस्था को सबसे बड़ा हथियार मान रही है. इसके लिए सोनप्रयाग से लेकर केदारनाथ के बीच छह स्थानों गौरीकुंड, गौरीगांव, छोटा लिंचोली, बड़ा लिंचोली, केदारनाथ बेस कैंप तथा केदारनाथ मंदिर के पास हेलीपैड का निर्माण भी किया जा रहा है. सरकार का कहना है कि आपदा की स्थिति में यात्रियों को लाने और ले जाने में इन हैलीपैडों से काफी मदद मिलेगी. लेकिन पिछले दिनों इस दावे की पोल तब खुलती दिखी जब इन छह जगहों में से एक जगह लिंचोली में बने हैलीपैड पर हेलीकाप्टर नहीं उतर पाया. यह हेलीकाप्टर केदारनाथ में खाद्यान सामग्री लेकर जाने वाला था. ऐसे में आपात परिस्थितियों में ये हैलीपैड किस हद तक कारगर साबित होंगे, समझा जा सकता है.

सड़कों की मरम्मत को लकेर पूछे जाने वाले सवालों पर सरकार के कई अधिकारी अक्सर इसे केंद्र का मामला बता कर सवाल से ही बचते नजर आते रहे हैं. इसके अलावा खराब मौसम भी एक ऐसी शाश्वत समस्या है जो आपदा प्रबंधन तथा खोजी अभियानों के लिहाज से दिक्कत पैदा कर सकती है. आपदा के बाद इसकी बानगी पिछले साल तब भी देखने को मिल चुकी है जब केदार घाटी में ड्यूटी के दौरान नदी की तेज धारा में बह गए एक उप जिलाधिकारी को ढूंढने में सरकार का बचाव अभियान पूरी तरह असफल रहा था. इस अभियान में पुलिस, बीएसएफ और गोता खोरों की संयुक्त टीमें लगी हुई थीं.

केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को आपदा प्रबंधन तथा पुननिर्माण संबंधी कार्यों के लिए तीन साल में तीन चरणों में 7700 करोड़ रु की मदद दी है. इसके अलावा अन्य राज्यों की सरकारों, विभिन्न संगठनों तथा लोगों की तरफ से भी तकरीबन 300 करोड़ रुपये सरकार को मिले हैं. ऐसे में यदि सरकार आपदा प्रबंधन के स्थाई उपायों को लेकर पैसों की कमी की बात करती है, तो शायद ही यह किसी के गले उतरने वाला तर्क होगा. और अगर वह स्थाई उपायों के बजाय फौरी समाधानों की तरफ ही ज्यादा जोर रखती है तब तो उसकी मंशा पर संदेह न करने की कोई वजह नहीं बचती.

सरकार गौरीकुंड से केदारनाथ तक की तैयारियों के दम पर आपदा प्रबंधन के अपने उपायों को चाक चौबंद बता रही है. ऐसे में मौसम की मेहरबानी के चलते यदि इस बार की यात्रा ठीक-ठाक पूरी हो भी जाती है तब भी प्रदेश के आपदा प्रबंधन तंत्र के सामने कुछ अहम सवाल बने रहेंगे. चेतावनी प्रणाली, प्रभावी प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा पुनर्वास के पक्के इंतजामों वाले ये महत्वपूर्ण सवाल अभी भी जवाब की प्रतीक्षा में हैं.

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