सत्ता के नशे में!

प्रतीत होता है कि संघीय संस्कारों से पोषित एवं अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहने का दावा करने वाली पार्टी सुविधानुसार संस्कार और सिद्धांत दोनों से समझौते के लिए तैयार रहती है। एक उदाहरण देखिए, बिहार काडर के एक भूतपूर्व आईएएस अधिकारी, जो इस समय बिहार से सांसद एवं केंद्र की भाजपा सरकार में मंत्री हैं; अपने भाजपा विरोधी रूख़ के लिए जाने जाते रहे हैं। लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी के उत्साह को छोडि़ए, यूपीए सरकार में सचिव रहते हुए उन पर हिन्दू आतंकवाद के सिद्धांतकारों में न सिर्फ़ शामिल होने, बल्कि इसके लक्षित आरोपितों की प्रताडऩा का भी आरोप भाजपा के नेता लगाते रहे थे। लेकिन अब वह विशुद्ध भाजपाई हैं।

अक्टूबर, 1952 को आंग्ल भाषी पत्रिका ‘हितवाद’ में लिखित अपने लेख में तत्कालीन संघ प्रमुख एम.एस. गोलवलकर लिखते हैं- ‘उन तमाम चिह्नों और प्रतीकों को ख़त्म कर दें, जो हमें हमारे अतीत की ग़ुलामी और अपमान की याद दिलाते हैं।‘

यह वक्तव्य ज़रूर दूसरे सन्दर्भ में है; लेकिन यह निश्चित है कि भाजपा नेता अपने आदर्श पुरुषों को भी नहीं पढ़ते। अगर ऐसा होता, तो यह महाशय भाजपा के सांसद एवं केंद्र सरकार में राज्य मंत्री न होते। वैसे उन महानुभाव के कृत्यों की पड़ताल आलेख का विषय नहीं है। साथ ही यह पार्टी का निजी निर्णय है कि वह किसे चुने। परन्तु एक पत्रकार का ध्येय जनता के सामने सत्य उजागर करना है कि नैतिकता के बड़े दावे करने वाले आसानी से समझौते भी करते हैं; बस फ़ायदा दिखना चाहिए।

आजकल भारतीय राजनीति का यह नया चलन है कि राजनीति शौक़ और ऐश-परस्ती का विषय बन गया है; त्याग, समर्पण और सेवा का नहीं। विशेषकर तीन वर्ग सेवानिवृत्ति का आनंद उठाने के ध्येय से नौकरशाह, शौबीज़ यानी सिनेमा, गीत-संगीत से जुड़े लोग एवं आर्थिक लाभ तलाशने वाले व्यवसायी आजकल राजनीति में एकदम से व्यापित होकर उसका गम्भीरता का मखौल उड़ा रहे हैं। ऐसे लोगों का सबसे बड़ा ठिकाना इस समय कोई दल है, तो वह भाजपा है। ऐसे लोग पार्टी से टिकट लेते हैं और दल में विभिन्न पदों पर आसीन होते हैं तथा पार्टी के लिए ज़मीन पर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता हासिये पर धकेल दिये जाते हैं। ऐसे उदाहरणों की सूची लम्बी है।

एक प्रख्यात अभिनेता, जो बिहारी बाबू के उपनाम से जाने जाते थे; भाजपा से तब जुड़े, जब वह दो संसद सदस्यों वाली पार्टी हुआ करती थी तथा भारतीय राजनीति में अपना वजूद बनाने के प्रयास में थी। तब इस अभिनेता ने लगातार पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया, स्वयं भी पटना साहिब से सांसद रहे। यहाँ तक कि जब भाजपा सन् 2004 से 2014 तक एक दशक में पतन की ओर थी, तब भी यह अभिनेता पार्टी के लिए समर्पित रहा। लेकिन सन् 2014 में सत्ता में सुदृढ़ होते ही, उन्हें कूड़े की तरह किनारे कर दिया गया। बाद में उन्होंने पार्टी ही छोड़ दी। वहीं हिन्दी सिनेमा की 80 और 90 के दशक की एक अभिनेत्री को सन् 2018 में भाजपा ने सीधे मुम्बई भाजपा का उपाध्यक्ष बना दिया। पद ग्रहण के साथ ही महोदया ने यह गूढ़ ज्ञान भी दिया कि ‘मुझे लगता है देश केवल उन लोगों की ज़रूरत है, जो देश के लिए समर्पित होना चाहते हैं। ऐसे लोगों की नहीं, जो केवल भविष्य बनाने के लिए राजनीति में हैं।‘ लगे हाथ उन्होंने यह भी बताया कि वह 2004 से ही भाजपा में थीं। लेकिन उनके बच्चे छोटे थे, इसलिए उनके पास समय नहीं था। हालाँकि उसके बाद में सिनेमा और टीवी शो में नज़र आयीं; लेकिन भाजपा के किसी आन्दोलन या चुनावी सभा में नहीं दिखीं।

तीन भोजपुरी के अभिनेता, जो भाजपा विरोधी दलों में सक्रिय रहे, वहाँ से लाभ न मिलता देख तुरन्त पाला बदल भाजपाई हो गये। पार्टी ने टिकट भी दे दिया। इनमें दो दिल्ली और गोरखपुर से सांसद हैं तथा तीसरे आज़मगढ़ से चुनाव हार गये। बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है, भाजपा के निर्वाचित सांसद और विधायकों में एक बड़ी सूची करोड़पतियों की है। सन् 2019 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी करते हुए आदमपुर सीट से एक टिकटॉक स्टार को प्रत्याशी बनाया गया और वह चुनाव हार गयी। यह पार्टी का अहंकार ही है, जो जनता को अपनी जागीर समझ बैठी है कि वह जिसे टिकट देगी, जनता उसे चुन लेगी। मध्य-काल में सिकंदर लोदी को भी यही अहंकार था, जो अपने जूते सरदारों के यहाँ भेजकर उनसे उसके सामने कोर्निंश करने को कहता था। इस अपमान का दुष्परिणाम उसके बेटे इब्राहिम लोदी ने भुगता, जब कई अफ़ग़ान सरदार बाबर के विरुद्ध उसकी सहायता करने के बजाय दुश्मन से जा मिले। ये संकेत हैं कि कहीं कार्यकर्ताओं का अपमान उन्हें विरोधी ख़ेमे का सहयोगी न बना दे।

भारतीय राजनीति में आंतरिक दलीय व्यवस्था के मामले मात्र दो ही दल थे- भाजपा और वामदल; जो लोकतंत्र के मूल्यों को पूर्ण करते थे। ये दोनों ही व्यक्तिवादी पार्टियों से भिन्न काडर आधारित दल थे। हालाँकि वामदल इन दिनों हासिये पर हैं। परन्तु अपना आधार बढ़ाने के लिए अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। वे आज भी अपने काडर को ही अहमियत देते हैं और उन्हीं की नियुक्ति महत्त्वपूर्ण पदों पर करते हैं। किन्तु भाजपा सत्ता के मद में अपने काडर की अनदेखी करती है। स्थिति यह है कि भाजपा न सिर्फ़ परिवारवादी, बल्कि व्यक्तिवादी दल भी बनती जा रही है।

गुज़रात काडर के एक आईएएस अधिकारी को सीधे उत्तर प्रदेश भाजपा इकाई का उपाध्यक्ष बना दिया गया। इनकी सबसे बड़ी योग्यता है- ‘डेढ़ दशक तक तत्कालीन गुज़रात के मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री के प्रति समर्पण।‘

इसके अतिरिक्त किसी को इन महाशय की ऐसी किसी योग्यता का ज्ञान नहीं कि उन्हें पार्टी के संघर्षशील कार्यकर्ताओं की अनदेखी करते हुए शीर्ष पद पर बैठा दिया जाए।

सत्ता की लहर में सम्भवत: भाजपा के कार्यकर्ता एवं नेता पार्टी में शीर्ष पर उभरे इस सिण्डिकेट को देख नहीं पा रहे, जो सरकार और पार्टी में तानाशाही पर अमादा है। इस स्थिति की तुलना इतिहास के उस दौर से की जा सकती है, जब प्रचार माध्यमों के द्वारा ब्रिटेन की महानता का इतना बड़ा मिथक खड़ा कर दिया गया था कि जिन ग़रीबों की कोठरियों में ठीक से सूरज की रोशनी भी नहीं आती थी, वे भी इस भ्रम में गुम हो गये थे कि ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी अस्त नहीं होगा।

इस दुनिया में न कुछ भी स्थिर है, और न ही स्थायी। व$क्त अपने न्याय में बड़ा निर्दयी हैं। वह किसी को नहीं बख़्शता। एक दल के रूप में अपनी सफलता को अपनी स्थायी नियति समझना भाजपा की भूल होगी। कांग्रेस के उत्थान और पतन का उदाहरण सामने ही है। देखना होगा कि हिन्दुत्व की दुंदुभी के शोर में यह सब कब तक ढका रहता है? यह भी देखना है कि जब यह शोर थमेगा, तब कितने शोकगीत सुनायी देंगे? वे, जो इन नेताओं में अपना ईश्वर देख रहे हैं; कब तक इस भ्रम में रहते हैं? नीत्शे लिखते हैं- ‘इन्हीं बीमार लोगों ने ईश्वर की कामना की है और इतने भर से ख़ुश हैं कि उनके लिए सन्देह करना पाप करना है। वे चाहते हैं कि उनका यह विश्वास सभी ओढ़ें।‘

लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे स्वयंभू ईश्वरों को जनता ने बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं किया है। आज की जनता तो इतनी परिपक्व है कि उसने इन्हें नकारना शुरू भी कर दिया है और लगता है कि वह बहुत समय तक इन स्वयंभू ईश्वरों को बर्दाश्त नहीं करेगी।

(लेखक इतिहास और राजनीति के जानकार हैं और उपरोक्त उनके अपने विचार हैं।)