सतत विकास लक्ष्य में बहुत पीछे हैं बड़े हिन्दी भाषी राज्य


वैसे तो सभी राज्यों ने कुछ क्षेत्रों में अच्छा करके अपने पिछले प्रदर्शन में सुधार किया है; लेकिन मिजोरम, हरियाणा तथा उत्तराखण्ड उन राज्यों में शामिल हैं, जिन्होंने 2019 की तुलना में 2020-21 में अपने अंकों में सबसे ज़्यादा वृद्धि की है। इस बार अपने प्रदर्शन में तेज़ी से सुधार करने वाले ये तीनों राज्य ‘सबसे आगे चलने वाली’ श्रेणी में शामिल हो गये हैं।
राज्यों की सूची में अव्वल आने वाले केरल तथा केंद्र शासित प्रदेशों में अव्वल रहे चंडीगढ़ ने गुणात्मक शिक्षा और भुखमरी रोकने के क्षेत्र में बेहतर कार्य किया है। स्वच्छ पानी और स्वच्छता के क्षेत्र में गोवा और लक्षद्वीप का प्रदर्शन बेहद सराहनीय रहा है। वहीं शान्ति, न्याय तथा मज़बूत संस्थाओं के मामले में उत्तराखण्ड और पुडुचेरी ने बेहतर प्रदर्शन किया है। लैंगिक समानता की दिशा में छत्तीसगढ़ और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह ने अच्छा प्रदर्शन किया है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, देश ने साफ़ पानी एवं स्वच्छता तथा सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार किया है। वहीं उद्योग, नवाचार तथा आर्थिक विकास के क्षेत्रों में बड़ी गिरावट देखी गयी है। यह सूचकांक राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को उनके द्वारा प्राप्त किये गये अंकों के आधार पर चार श्रेणियों में विभाजित करता है, जिसमें पहली श्रेणी में ‘प्रतियोगी’ राज्य, दूसरी में ‘प्रदर्शन करने वाले’ राज्य, तीसरी में ‘सबसे आगे चलने वाले’ राज्य तथा चौथी में ‘लक्ष्य पाने वाले’ राज्य हैं। इस सूचकांक के मुताबिक, देश का कोई भी राज्य अथवा केंद्र शासित प्रदेश ‘प्रतियोगी’ (0-49 अंक) तथा ‘लक्ष्य पाने वाले’ राज्य (100 अंक) की श्रेणी में शामिल नहीं है। देश के 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ‘प्रदर्शन करने वाले’ राज्य (50-64 अंक) की श्रेणी में शामिल हैं; जबकि 22 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ‘सबसे आगे चलने वाले’ राज्यों (65-99 अंक) की श्रेणी में शामिल हैं।
यह सूचकांक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में देश के राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है। इस रिपोर्ट को राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सम्बन्धित मंत्रालयों तथा संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के साथ विचार-विमर्श करके तैयार किया गया है। इस सूचकांक की शुरुआत सन् 2018 में की गयी थी। 2018-19 में जारी इसके पहले संस्करण में 13 उद्देश्यों, 39 लक्ष्यों और 62 संकेतकों का प्रयोग हुआ था। वहीं 2019-20 में जारी इसके दूसरे संस्करण में 17 उद्देश्यों, 54 लक्ष्यों और 100 संकेतकों को शामिल किया गया था। एसडीजी के लक्ष्यों में सुधार के लिए इस वर्ष जारी तीसरे संस्करण में 17 उद्देश्यों, 70 लक्ष्यों और 115 संकेतकों को शामिल कर प्रगति मापने का पैमाना बनाया गया।
ध्यान रहे यह सूचकांक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़ा ही है, साथ ही इसे बनाने के पीछे एजेंडा 2030 के तहत वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में बेहतर प्रदर्शन करना है। नीति आयोग के पास देश में सतत विकास लक्ष्यों को अपनाने तथा इसके पर्यवेक्षणों पर निगरानी करने का अधिकार प्राप्त है।

पिछड़े राज्यों को करना होगा सुधार
यह बहुत दु:खद है कि देश के कुछ राज्य तो बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, परन्तु हिन्दी भाषी क्षेत्र के बड़े राज्यों ने अपने प्रदर्शन से काफ़ी निराश किया है। ये वो राज्य हैं, जहाँ देश की एक बड़ी आबादी आज भी ग़रीबी तथा बेरोज़गारी की मार झेल रही है। यहाँ आज भी हर किसी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। इस रिपोर्ट में पता चलता है कि सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले पाँच राज्यों में हिन्दी भाषी क्षेत्र के चार राज्य शामिल हैं; जिसमें बिहार, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान जैसे बड़े राज्य हैं। जबकि हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड जैसे छोटे हिन्दी भाषी राज्यों ने इस सूचकांक में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है। लेकिन मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा। देश के दो बड़े पूर्वी राज्य ओडिशा तथा पश्चिम बंगाल की भी स्थिति अच्छी नहीं है; क्योंकि ये अग्रणी (टॉप) 15 राज्यों में भी शामिल नहीं हैं। पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों का प्रदर्शन इनसे अच्छा है और ये ‘सबसे आगे चलने वाले’ राज्यों की श्रेणी में शामिल हैं। ऐसा पहली बार नहीं है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र के बड़े राज्यों का प्रदर्शन ख़राब है; राष्ट्रीय स्तर की पिछली ज़्यादातर रिपोट्र्स में इनका प्रदर्शन दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों के मुक़ाबले बेहद ख़राब रहा है। इन राज्यों को महाराष्ट्र, तमिलनाडु, और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों के प्रदर्शनों से कुछ सीखना चाहिए। हालाँकि कुछ हिन्दी राज्यों ने कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया है; लेकिन बड़े राज्यों को स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक समानता तथा न्याय के क्षेत्र में बेहतर करने के अलावा इन्हंत ग़रीबी तथा भुखमरी को ख़त्म करने के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास करने चाहिए। कुल मिलाकर वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों में से हिन्दी भाषी राज्यों को पहले पाँच लक्ष्यों पर बेहद गम्भीरता से कार्य करने की ज़रूरत है। अगर स्थिति को बेहतर करना है, तो हिन्दी प्रदेशों के बड़े राज्यों को सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में बहुत-से कार्य करने होंगे। इस रिपोर्ट में आश्चर्य की बात यह है कि छोटे राज्यों के प्रदर्शन में बहुत विविधता देखी गयी है। जहाँ हिमाचल प्रदेश, गोवा, सिक्किम तथा मिजोरम जैसे राज्यों का प्रदर्शन शानदार रहा है, वहीं अरुणाचल प्रदेश तथा मेघालय फिसड्डी साबित हुए हैं। कुछ उत्तर-पूर्वी राज्यों को भी बेहतर प्रदर्शन करने की ज़रूरत है। केंद्र शासित प्रदेशों, ख़ासकर चंडीगढ़ तथा दिल्ली के बेहतर प्रदर्शन को इसी से समझा जा सकता है कि आठ केंद्र शासित प्रदेशों में सात ‘सबसे आगे चलने वाले’ केंद्र शासित प्रदेशों की श्रेणी में शामिल हैं। केवल एक केंद्र शासित प्रदेश दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव इस सूची से बाहर है। इस संघ प्रशासित क्षेत्र को अभी बेहतर प्रदर्शन करने की ज़रूरत है।
एसडीजी रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बेहतर प्रदर्शन से देश के समग्र एसडीजी में छ: अंकों का सुधार हुआ है और यह 60 अंकों से बढ़कर 2020-21 में 66 हो गया है। इस सूचकांक के जारी होने के कुछ ही दिनों बाद वैश्विक स्तर पर वार्षिक सतत विकास रिपोर्ट (एसडीआर) 2021 जारी की गयी। सतत विकास लक्ष्यों वाले इस वैश्विक सूचकांक में भारत को 165 देशों की सूची में 120वाँ स्थान मिला है, जो कि पहले से ख़राब है। पिछले साल भारत इस सूचकांक में 117वें स्थान पर था। इस सूचकांक में एक बार फिर से उत्तरी यूरोप के देशों फिनलैंड, स्वीडेन, तथा डेनमार्क ने अपना दबदबा बनाये रखा है। ये तीनों देश क्रमश: पहले, दूसरे तथा तीसरे पायदान पर रहकर सर्वोच्च प्रदर्शन करने वाले देश बने हैं। इस रैंकिंग में चौथे और पाँचवें स्थान पर यूरोपीय देश जर्मनी और बेल्जियम हैं। इस सूचकांक में शामिल सभी देशों के प्रदर्शन को वैश्विक स्तर पर निर्धारित 17 सतत विकास लक्ष्यों के पैमाने पर मापा गया।
भारत वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों में तभी बेहतर कर पाएगा, जब देश के सभी राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश हर महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में बहुत बेहतर प्रदर्शन करेंगे। हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों के जागरूक होने से लैंगिक भेदभाव में कमी आयी है। लेकिन सतत विकास के लिए अभी हर राज्य को हर क्षेत्र में गम्भीरता से कार्य करना होगा।
(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)