सजावटी संहिता

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फोटो: अंकित अग्रवाल

दिल्ली समेत देश के पांच राज्यों में इन दिनों चुनावी बयार चल रही है. आठ दिसंबर को चुनाव के नतीजे सामने आने तक यह बनी रहेगी. यह बयार बदबू न बने यानी चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों का व्यवहार मर्यादा में रहे, इसके लिए चुनाव आयोग भी भारी-भरकम तामझाम के साथ मैदान में उतर चुका है. राजनीतिक दलों की इस लड़ाई में उसकी भूमिका रेफरी की है. हाथ में ‘आदर्श चुनाव आचार संहिता’ का चाबुक लिए आयोग ने सभी पार्टियों को आचार संहिता के दायरे में रहने संबंधी निर्देश दे दिए हैं. अकेले दिल्ली में ही वह अब तक आचार संहिता उल्लंघन के 100 से अधिक मामले ‘ट्रैक’ कर चुका है. दूसरे राज्यों में भी आचार संहिता की लक्ष्मण रेखा लांघने वालों से वह ‘ऐसा क्यों किया?’  पूछ रहा है. इसी क्रम में पिछले दिनों उसने मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री और भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय को कारण बताओ नोटिस थमाया. उन पर एक धार्मिक समारोह में लोगों को पैसे बांटने का आरोप था. लेकिन विजयवर्गीय ने ‘ऐसी आचार संहिता को ठोकर मारता हूं.’ कह कर चुनाव आयोग के नोटिस को तवज्जो देने से इनकार कर दिया.

पहले आचार संहिता के उल्लंघन और फिर आयोग की अवमानना का यह अकेला उदाहरण नहीं है. हाल के समय में ऐसे कई मामले देखे गए हैं जब नेताओं ने आचार संहिता तोड़ी और आयोग के चेतावनी देने के बावजूद सीनाजोरी की. वैसे चुनाव आयोग से नेता डरें भी तो क्यों जब वे जानते हैं कि बिना नाखून और दांत वाली यह संस्था उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती.

करीब छह महीने पहले कर्नाटक में विधानसभा चुनावों के चलते इसी तरह की आदर्श आचार संहिता लगी हुई थी. तब भी चुनाव आयोग पूरी मुस्तैदी के  साथ चुनाव अभियान पर नजर बनाए हुए था. विभिन्न दलों द्वारा अपने प्रत्याशियों के पक्ष में जनसभाओं और सम्मेलनों के बीच भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्य के शिमोगा इलाके में एक सम्मेलन बुलाया गया. उस सम्मेलन में प्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केएस ईश्वरप्पा ने एक समुदाय विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए गंभीर बातें कहीं. इस भाषण की शिकायत चुनाव आयोग के पास पहुंची. उसने 12 अप्रैल, 2013 को ईश्वरप्पा को नोटिस जारी कर दिया. ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1961’ और ‘भारतीय दंड संहिता’ की धारा 505 के उल्लंघन के लिए उनसे जवाब मांगा गया. आईपीसी की इस धारा के मुताबिक  किसी धर्म, समुदाय विशेष के खिलाफ भावनाएं भड़काने वाली बात कहने वाले को तीन साल तक कैद हो सकती है. आयोग मान चुका था कि ईश्वरप्पा का बयान आचार संहिता के उल्लंघन के साथ ही सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाला और नागरिकों के विभिन्न वर्गों में वैमनस्य को बढ़ावा देने वाला था लिहाजा ऐसा लगा कि उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई तय है. लेकिन 23 अप्रैल को दिए अपने फैसले में आयोग ने बजाय ऐसा करने के ईश्वरप्पा को सिर्फ फटकार लगाई और भविष्य में सावधानी बरतने की नसीहतनुमा बात कहकर मामले को खत्म कर दिया.

आचार संहिता की धज्जियां उड़ाने वाले नेताओं को पता है कि नोटिस मिलने की सूरत में खेद प्रकट कर बच जाने का विकल्प मौजूद है

इसी तरह का एक वाकया 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी हुआ. केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा फर्रुखाबाद जिले की कायमगंज विधानसभा में एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे. आदर्श चुनाव आचार संहिता के प्रावधानों के मुताबिक चुनाव के दिनों में किसी भी तरह की घोषणा नहीं की जा सकती. इसके बावजूद बेनी ने एलान किया कि अगर प्रदेश में उनकी पार्टी की सरकार आई तो मुस्लिम समुदाय के लोगों को दिए जाने वाले आरक्षण में बढ़ोतरी की जाएगी. वे यह तक कह बैठे कि चुनाव आयोग चाहे तो उन्हें इस बात के लिए नोटिस दे सकता है. आयोग ने उन्हें नोटिस दे कर कार्रवाई के संकेत दे दिए. लेकिन बेनी द्वारा अपने बयान पर अफसोस जताने के साथ ही आयोग का गुस्सा काफूर हो गया और उसने उन्हें भविष्य में ऐसा न करने की सलाह दे कर मामला खत्म कर दिया.

ये दो घटनाएं आचार संहिता का खुला उल्लंघन करने वाले मामलों को इस तरह निपटा देने की  झलक भर हैं. आयोग के अब तक के इतिहास में बीसियों मामले हैं जब आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों को चेतावनी देते हुए भविष्य में ऐसा न करने की बात कह कर बरी कर दिया गया है. इनमें प्रतिबंधित क्षेत्रों में चुनाव सामग्री बंटवाने, मतदाताओं को पैसा देने, आचार संहिता के दौरान सरकारी सुविधा का लाभ लेने, समुदाय विशेष के खिलाफ बयान देने, धार्मिक उन्माद फैलाने और चुनाव आयोग को खुलेआम चुनौती देने जैसे गंभीर मामले भी शामिल हैं.

इससे स्वाभाविक-सा सवाल उठता है कि फिर आदर्श आचार संहिता का क्या मतलब रह जाता है. यह सवाल इसलिए भी मौजूं है कि आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में आचार संहिता के उल्लंघन के मामले रुक नहीं रहे हैं. बताया जाता है कि पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के दौरान ही आचार संहिता के उल्लंघन के लिए करीब 9000 एफआईआर दर्ज की गई थीं. यह रफ्तार बताती है कि चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ाने में प्रत्याशियों को कोई खतरा नहीं दिख रहा है. जानकारों के मुताबिक राजनेताओं को पता है कि नोटिस मिलने की सूरत में खेद प्रकट करते हुए बच जाने का विकल्प मौजूद है.

लेकिन क्या कारण है कि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले प्रत्याशियों को भविष्य में ऐसा न करने की नसीहत देकर ही छोड़ दिया जाता है? जानकारों का एक वर्ग इसे चुनाव आयोग की इच्छा शक्ति से जोड़कर देखता है. समाजशास्त्री और दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर आनंद कुमार कहते हैं, ‘ चुनाव आयोग द्वारा शिकायतों का संज्ञान लेने और संबंधित व्यक्ति को नोटिस भेजे जाने तक जैसी तेजी दिखाई जाती है वह बेशक काबिले तारीफ है. पर समस्या तब शुरू होती है जब कड़ी कार्रवाई करने के बजाय आयोग ऐसे प्रत्याशियों को चेतावनी देकर छोड़  देता है. कागजों में शेर जैसे दिखने वाले आयोग की उपलब्धि का आलम यह है कि उसने आज तक एक भी बड़ा शिकार नहीं किया.’ हालांकि इसके लिए वे आयोग की सीमित शक्तियों का हवाला भी देते हैं.

इससे सवाल उठता है कि आखिर क्यों आयोग की कार्रवाई नोटिस देने और डांट-डपटने तक ही सिमट कर रह जाती है. दरअसल संवैधानिक संस्था होने के बावजूद भले ही चुनाव आयोग बाहर से मजबूत दिखाई देता है लेकिन असलियत इससे उलट है. नेशनल इलेक्शन वाच के संस्थापक सदस्य प्रोफेसर त्रिलोचन शास्त्री बताते हैं, ‘चुनाव आयोग आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में संबंधित व्यक्ति अथवा दल को नोटिस देने और दोषी पाए जाने की स्थिति में फटकार लगाने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता भले ही मामला कितना गंभीर क्यों न हो. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1961 में भी आयोग को ऐसा अधिकार नहीं मिला है कि वह आचार संहिता तोड़ने वालों का नामांकन रद्द कर सके. उसके पास इतना ही अधिकार है कि वह चुनावों को लेकर बनाई गई व्यवस्था का जहां तक संभव हो सके पालन करवाए.’ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ एसवाई कुरैशी इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं, ‘आदर्श चुनाव आचार संहिता कोई कानून नहीं है. यह आयोग द्वारा बनाई गई ऐसी नैतिक व्यवस्था है जिसके जरिए राजनीतिक दलों से अपेक्षा जी जाती है कि चुनाव प्रक्रिया को साफ सुथरा बनाने में वे आयोग की मदद करें. यही वजह है कि आचार संहिता तोड़ने के मामलों में आयोग के अधिकार नोटिस देने और चेतावनी जारी करने तक सिमट जाते हैं.’

‘आचार संहिता कानून नहीं है. यह आयोग द्वारा बनाई गई नैतिक व्यवस्था है इसलिए हमारे अधिकार नोटिस और चेतावनी देने तक सिमट जाते हैं ‘

लेकिन क्या सीमित अधिकार की यह दुहाई सवाल का ठोस जवाब होने से ज्यादा आयोग की लाचारी को नहीं दिखाती? क्योंकि अगर आयोग के पास अधिकार ही नहीं हैं तो फिर उसके द्वारा दिए जाने वाले नोटिस और चेतावनियों का क्या औचित्य है? यह सवाल इसलिए भी लाजिमी है कि आयोग द्वारा खींची गई आचार संहिता की लगभग सभी लकीरों से छेड़छाड़ की जाती रही है. इस तरह की गतिविधियों में धारा 144 के उल्लंघन से लेकर निर्धारित राशि से ज्यादा धन खर्च करने तक के मामले शामिल हैं. निर्धारित राशि से ज्यादा धन खर्च करने का एक मामला तो पिछले दिनों काफी गरमाया भी था. यह मामला लोकसभा में विपक्ष के उपनेता और भाजपा के सांसद गोपीनाथ मुंडे के उस बयान से उपजा जब उन्होंने दावा किया कि अपने पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने आठ करोड़ रुपये फूंके थे. यह राशि चुनाव आयोग द्वारा तय की गई राशि के मुकाबले 32 गुना ज्यादा थी.

लेकिन इस सबके बावजूद कुछ जानकार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली का बचाव करते हैं. त्रिलोचन शास्त्री कहते हैं, ‘चुनाव आयोग अगर आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी मामलों का संज्ञान लेना और नोटिस देना भी बंद कर दे तो चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारणों की बाढ़ आ जाएगी. कम से कम आचार संहिता के होने से ऐसे मामलों में अंकुश तो लगाया ही जा सकता है.’ डॉ कुरैशी कहते हैं, ‘नोटिस देने तक की सीमित शक्ति के बावजूद आयोग ने काफी हद तक आचार संहिता को बचाए रखने और उल्लंघन के मामलों को नियंत्रित करने का काम किया है इससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए. बकौल उनके अभी ‘सब कुछ नहीं से कुछ तो सही’ वाली स्थिति है जिसे चुनाव सुधारों के जरिए ही ठीक किया जा सकता है.

चुनाव सुधारों की जिस जरूरत की ओर कुरैशी इशारा कर रहे हैं, वह कोई नई बात नहीं है. सामाजिक और राजनीतिक मोर्चों पर यह मांग 1980 के दशक से ही उठती रही है. प्रोफेसर आनंद कहते हैं, ‘चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाने के लिए संविधान ने चुनाव आयोग को कुछ जिम्मेदारियां दी हैं. 80 और 90 के दशक में इन जिम्मेदारियों को निभाने में आयोग के पूरी तरह विफल होने के बाद चुनाव सुधारों और आयोग की कार्यशैली बदलने की बात प्रमुख रूप से सामने आई. इसके बाद टीएन शेषन और जेएम लिंगदोह ने कुछ हद तक सक्रियता दिखाते हुए आयोग को मजबूत बनाने का काम भी किया, इसी के बाद बूथ कैप्चरिंग और नकली मतदाता बनाने जैसे कामों पर भी कुछ रोक लग सकी. लेकिन पिछले एक दशक से चुनाव सुधारों को लेकर आयोग की मांगों पर कोई सुनवाई नहीं हो पाई है जो काफी चिंताजनक है.’

प्रोफेसर आनंद इसके लिए आयोग के साथ ही संसद के रवैये पर भी सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, ‘चुनाव सुधारों को लेकर कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन वहां ऐसे लोगों और दलों की अधिकता है जो चुनाव प्रक्रिया की खामियों को लेकर ही आगे बढ़ रहे हैं.’ उनके मुताबिक आयोग को इसलिए दोष दिया जाना चाहिए कि उसने इन खामियों को दूर करने के लिए सुझाव तो दिए लेकिन उन सुझावों को लागू करवाने के लिए जिद नहीं पकड़ी. वे कहते हैं, ‘लगता है आयोग ने इस दिशा में दिमाग दौड़ाना बंद कर दिया है.’

प्रोफेसर आनंद की बातों का मर्म टटोलने के क्रम में आयोग द्वारा चुनाव सुधारों के लिए की गई कवायदों की पड़ताल करने पर मालूम पड़ता है कि उनका यह तर्क काफी वजनदार है. दरअसल चुनाव सुधारों को लेकर समय- समय पर आयोग की तरफ से सरकार के सामने कई तरह के सुझाव रखे जरूर गए, लेकिन अधिकतर मौकों पर सरकार ने उन्हें तवज्जो ही नहीं दी. चुनाव आयोग ने 1970 में पहली बार सरकार को पहली बार चुनाव सुधार का प्रस्ताव भेजा था.  इसके बाद 1977 में दूसरी और 1982 में तीसरी बार प्रस्ताव भेजा गया.  राजनीतिक दलों द्वारा भी सरकार को समय-समय पर इस संबंध में प्रस्ताव दिए गए. जयप्रकाश नारायण ने इस संबंध में एक कमेटी भी बनाई थी लेकिन ये सारे प्रस्ताव सिर्फ सुझाव तक सीमित रह गए. 1990 में सरकार ने इस मुद्दे पर एक समिति का गठन किया. पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता वाली इस समिति ने उसी साल अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी. 1992 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने इस रिपोर्ट को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र भी लिखा, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा.

‘चुनाव सुधारों पर कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन वहां ऐसे लोगों की अधिकता है जो चुनाव प्रक्रिया की खामियां लेकर ही आगे बढ़ रहे हैं ‘

नब्बे के दशक में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम का रास्ता खुलने, मतदान की उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने और फोटो पहचान पत्र की अनिवार्यता हो जाने को जरूर चुनाव सुधारों की दिशा में सकारात्मक माना जा सकता है. लेकिन इस सबके बीच सरकार द्वारा बहुत सारे ऐसे सुझावों को दरकिनार भी किया जाता रहा. 1993 में वोहरा समिति और फिर 1999 में न्यायमूर्ति बी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशें भी आईं, लेकिन कुछ नहीं हुआ. उस वक्त केंद्र में एनडीए की सरकार थी. बाद में 2004 में चुनाव आयोग ने नए सिरे से एक विस्तृत प्रस्ताव भेजा, लेकिन पूरे कार्यकाल के दौरान मनमोहन सरकार मौन रही. अब जब कुछ मामलों में  न्यायालय का हस्तक्षेप हुआ है तो जाकर सरकार चेती है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में राइट टू रिजेक्ट के अधिकार को लेकर जो फैसला सुनाया गया है वह इसका सबसे पुख्ता प्रमाण है. 1989 में ही चुनाव आयोग सरकार को सुझा चुका था कि दागी नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दिया जाए. इसके बाद 2001 में उसने नकारात्मक मतदान के अधिकार का प्रस्ताव भी दिया, लेकिन सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. 2004 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति ने सुझाव दिया कि प्रत्याशियों को खारिज करने का विकल्प ईवीएम में शामिल हो, लेकिन सरकार ने उनकी इस राय को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया. चुनाव आयोग भी इसके बाद चुप बैठ गया और पुराने ढर्रे पर ही काम करता रहा. बाद में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दबाव बढ़ाना शुरू किया और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने ताजा फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस अधिकार पर मुहर लगा देने से साफ होता है कि चुनाव आयोग अगर थोड़ी और दृढता दिखाता और इस अधिकार की अनिवार्यता को लेकर मुखर प्रयास करता तो बहुत पहले ही ऐसा किया जा सकता था. आयोग की उस राय को सरकार ने तब स्वीकार नहीं किया और अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे आदेश के जरिए उसके सामने बाध्यकारी रूप में रख दिया है. इस तरह जो श्रेय उसके हिस्से आ सकता था वह न्यायपालिका के खाते में जुड़ गया.

चुनाव सुधारों को लेकर काम करने वाले संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के संस्थापक सदस्य जगदीप छोकर इसके लिए चुनाव आयोग को पूरी तरह दोष देने से इनकार करते हैं. चुनाव आयोग के अब तक के रवैये को सकारात्मक बताते हुए वे कहते हैं , ‘वर्तमान परिस्थियों में जिस तरह सीमित अधिकारों के सहारे चुनाव आयोग अपना काम कर रहा है वह सराहनीय है. जरूरत इस बात की है कि सरकार उसके द्वारा दिए गए सुझावों पर अमल करते हुए उसे मजबूती देने का काम करे.’ हालांकि वे यह भी कहते हैं कि अगर आयोग अपनी तरफ से अतिरिक्त प्रयास न करे तो सरकार से इस तरह की उम्मीद करना दिवास्वप्न देखने जैसा ही होगा.

आईआईएम के पूर्व प्रोफेसर छोकर की इन बातों से दो अहम सवाल खड़े होते हैं. पहला- चुनाव आयोग का सीमित अधिकारों की दुहाई दे कर चुप बैठ जाना कितना सही है? और दूसरा- चुनाव सुधारों को लेकर आयोग के सुझावों में सरकार की दिलचस्पी क्यों नहीं है?

चुनाव आयोग की चुप्पी पर बात करने से पहले सवाल नंबर दो पर आते हैं. चुनाव सुधारों को लेकर सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की पड़ताल करने पर हालिया समय तक की सरकार की कुल जमा उपलब्धि इतनी ही रही है कि उसने चुनाव आयोग द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों में हर बार ‘पाक साफ’ काम करने का बयान दिया है. लेकिन असल में देखें तो उसका व्यवहार हमेशा इसके उलट रहा है. पिछले बीस सालों में चुनाव सुधारों को लेकर आयोग द्वारा भेजे गए सुझावों पर अमल करने के बजाय सरकार उन पर कुंडली मार कर बैठी है. अनिश्चितता के भंवर में हिचकोले खा रहे इन सुझावों की संख्या दो दर्जन से अधिक हो चुकी है (नीचे दिया गया लिंक देखें).

लेकिन इससे भी चिंताजनक बात यह है कि सरकार की कार्यप्रणाली आयोग के सुझावों का कचरा बना देने तक ही सीमित नहीं रही है बल्कि उसने ऐसे उपक्रम भी किए हैं जिनमें चुनाव आयोग की बची खुची शक्तियों को पूरी तरह खत्म कर देने की साजिश नजर आती है. बात पिछले साल उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के दौरान की है. आचार संहिता का उल्लंघन करने के चलते केंद्र सरकार के दो मंत्रियों, सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा समेत कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को चुनाव आयोग द्वारा नोटिस दिया गया. इस बीच सियासी गलियारों से एक खबर निकली कि केंद्र सरकार आचार संहिता को वैधानिक शक्ल देकर चुनाव आयोग के पर कतरने का मन बना रही है. इस पर बवाल होता कि इससे पहले ही सरकार के तीन मंत्री इसका खंडन करने में जुट गए. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी इस जमात में शामिल थे.

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