शिवराज सिंह चौहान: बड़े मायनों वाली जीत

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यह भी एक विरोधाभासी सत्य ही है कि शिवराज की जितनी अच्छी छवि गढ़ी गई उतनी ही नाराजगी उनके मंत्रियों के खिलाफ जनता और कार्यकर्ताओं में देखने को मिली. लोकायुक्त में 13 मंत्रियों के खिलाफ दर्ज मामलों के चलते भी भाजपा संगठन को बार-बार सफाई देनी पड़ रही थी. यही वजह है कि चुनाव के पहले भाजपा ने जहां दो मंत्रियों को टिकट नहीं दिया वहीं इस चुनाव में दस मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा. शिवराज को इस स्थिति का भान बहुत पहले ही हो चुका था इसीलिए उन्होंने हर चुनावी सभा में अपील की, ‘हमारा एक ही उम्मीदवार है-कमल. उसे देखो और मुझे देखो.’ क्या यह कम ताज्जुब की बात है कि कार्यकर्ताओं और मतदाताओं ने ऐसा ही किया. वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर के मुताबिक, ‘शिवराज पूरे कार्यकाल में सिंहासन पर बैठने के बजाय प्रदेश की परिक्रमा करते रहे. प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री ने इससे पहले कभी इतनी सघनता से सूबे का भूगोल नहीं नापा.’ पांच सालों तक उनके सतत जनसंपर्क का नतीजा यह हुआ कि सूबे के पचास में से 17 जिलों में कांग्रेस का सफाया हो गया और कांग्रेस के दस प्रत्याशियों की तो जमानत ही जब्त हो गई. इसी से जुड़ा एक अहम तथ्य यह भी है कि जिन क्षेत्रों में शिवराज ने विशाल जनसैलाब को संबोधित किया वहां भाजपा भारी बहुमत से जीती. पार्टी की झोली में 26 सीटें ऐसी हैं जो उसने 30 हजार से 91 हजार से अधिक मतों के बड़े अंतर से जीती हैं.

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यूं होता तो क्या होता

यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमान पहले सौंपी जाती

विधानसभा चुनाव के महज दो महीने पूर्व ही कांग्रेस ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव में प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी थी. अब कहा जा रहा है कि यदि सिंधिया और पहले आ जाते तो शायद कांग्रेस को इसका फायदा मिल सकता था. यह बात एक लिहाज से सही है क्योंकि यदि ऐसा होता तो जनता में साफ हो जाता कि कांग्रेस की तरफ से कौन मुख्यमंत्री बनेगा. लेकिन फिर यह भी है कि युवाओं में मोदी के नाम की लहर और महिलाओं में मुख्यमंत्री शिवराज की पकड़ मजबूत थी. ऊपर से प्रदेश में कांग्रेस का संगठन सालों से अप्रभावी है. ऐसे में सिर्फ सिंधिया के नाम पर अप्रत्याशित सफलता नहीं दिलाई जा सकती थी. [/box]

मप्र में विधानसभा चुनाव नतीजों का सार यह है कि शिवराज जहां पांच साल तक तैयारी करने वाले विद्यार्थी की भूमिका में रहे वहीं कांग्रेस इस मामले में चुनाव की परीक्षा से ठीक पहले जागी. वरिष्ठ पत्रकार आत्मदीप के मुताबिक, ‘शिवराज ने सरकार और संगठन के बीच ऐसा तालमेल बैठाया कि चुनाव की तारीख घोषित होने से करीब दो महीने पहले ही उन्होंने डेढ़ सौ प्रत्याशियों के नाम तय कर लिए और जनआशीर्वाद यात्रा के जरिये चुनाव अभियान की सामग्री भी कार्यकर्ताओं तक पहुंचा दी थी.’ यह भी दिलचस्प है कि चौहान ने अपनी उपलब्धियों को भाषणों में इतनी बार दोहराया कि लोगों को उनका भाषण मुंहजुबानी याद हो गया. दूसरी तरफ निचले स्तर पर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन इतना कमजोर था कि वह मैदानी संघर्ष करते दिखी ही नहीं. कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का कहना था, ‘पार्टी की जिस तरीके से चुनाव में हार हुई है उसके बाद संगठन में भी बदलाव की जरूरत है.’

यह भी दिलचस्प है कि मप्र की जनता ने पहली बार भाजपा के किसी मुख्यमंत्री को ऐसा समर्थन दिया है कि चौहान ने कांग्रेस के सभी कथित क्षत्रप नेताओं के गढ़ में भी कमल खिला दिया. केंद्रीय मंत्री कमलनाथ (महाकौशल) के क्षेत्र में भाजपा ने 38 में से 25 सीटें जीतीं. इसी तरह, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (ग्वालियर-चंबल) के क्षेत्र में 34 में से भाजपा ने 22 सीटों पर कांग्रेस को शिकस्त दी. मालवा के कुछ क्षेत्रों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह तो निमाड़ के कुछ क्षेत्रों में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया का वर्चस्व बताया जाता था. किंतु मालवा-निमाड़ की कुल 66 सीटों में से 56 पर भाजपा विजयी साबित हुई. मध्य क्षेत्र (भोपाल और आसपास) में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी समर्थकों को टिकट बांटी गई थी, पर यहां भी 36 में से 29 सीटों पर कांग्रेस हार गई. खुद पचौरी अपने गृह-क्षेत्र भोजपुर में ही बाहरी कहे जा रहे सुरेंद्र पटवा के हाथों बुरी तरह पराजित हुए.

संक्षेप में कहा जाए तो शिवराज सिंह चौहान की जीत अकेली उनकी है, हर समुदाय के समर्थन से निकली है और पिछली जीत से बहुत ज्यादा बड़ी है. अगर हम इसमें यह भी जोड़ दें कि वे नरेंद्र मोदी के गुजरात से बड़े प्रदेश के (विधान सभा और लोकसभा दोनों की सीटों के हिसाब से), उनसे बड़ी जीत के साथ तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं तो उनकी पहले से ही बड़ी जीत और भी बड़ी और चमकदार हो जाती है.

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