शिक्षा ही काटेगी सांप्रदायिकता का जाल

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मुस्लिम समाज के मुद्दों को लेकर कानूनों में बदलाव किए जा रहे हैं। उन पर भी बहस। और लाजिमी है कि कोई मौलवी भड़केगा, किसी महिला पर। महिला भी बोलेंगी, भाषा व व्यवहार अभ्रद होगा, हाथापाई होगी। अब चैनलों को एक और मुद्दा मिलेगा बहस का। मुद्दे ऐसे उठाओ जिसमें मुसलमान भी आपस में लड़ते रहे टीवी चैनलों पर। ऐसे मुद्दों पर बहस कराओ जो सुनने में तो सही लगते हैं किंतु उसमें मुस्लिम समाज का अंतर्विरोध उनकी कमियां निकल कर आएं। आपस में ही लड़ाओ और फिर मजे लेते रहो कि देखो मुसलमान तो होते ही ऐसे है। ऐसा लगता है जैसे सारी बुराईयां मात्र मुस्लिम समुदाय में ही हो।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज दंगों के आरोपी से जेल में मिलते हैं और कहते हैं कि ”गिरफ्तारी नहीं सौहार्द चाहिएÓÓ। दूसरे केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा झारखंड हत्याकांड के आरोपियों को उनके मतदाता होने के कारण मिलते हैं, फूलों की माला डाली जाती है। सही बात है सौहार्द की ही तो ज़रुरत है आज देश में। मगर सत्ताधारी दल की ओर से दर्द, इंसानियत, शराफत औऱ ताजातरीन राष्ट्रीयता की परिभाषाएं अब धर्म देख कर बनाई जा रही हैं।

22 जून 2017 को हरियाणा में चलती ट्रेन में चाकू से गोद कर मारे गये 17 साल के हाफिज जुनैद की मां के शब्द बार-बार मुझे कोचते हैं। साल बाद इस ईद पर उनको मिला। इस ईद पर भी वह उतनी ही मायूस थी। उसकी मायूसी व्यवस्था को लेकर ज़्यादा थी कि कैसे अपराधी लोगों को अदालतें छोड़ रही हैं जिन्होंने एक बच्चे की इस तरह हत्या की। खुदा न करे किसी के साथ ऐसा खेल हो। आखिर उन पर दवाब किस बात का है? क्या अपने बच्चे के लिए भी वैसा ही दबाव महसूस करते?

दुबारा मिलने पर उन्होंने कहा कि गांव के कुछ लोग दवाब देते हैं समझौता करने पर किन्तु जब तक हमारी जिं़दगी रहेगी हम अपने बच्चे के लिए इंसाफ के लिए लड़ेंगे। हाफिज जुनैद के हत्यारों में से एक को छोड़ बाकी को अदालतों ने जमानत दे दी।

18 जून 2018 में हापुड़ के गांव में जिस तरह कासिम जो तथाकथित रूप से जानवर के कत्ल का दोषी मानकर मंदिर से एलान किया और जिस वहशीपन से उसकी हत्या की गई वो हत्यारों के बनाये विडियो से मालूम होता है कि एक इंसान तड़प रहा है और बहुत से युवा लड़के उसका वीडियो बना रहे हैं, चारों तरफ खड़े होकर उसे गालियां दे रहे हैं। 62 साल के सैमुद्दीन की दाढ़ी पकड़ कर उसे झूठ सच स्वीकार करने को कहा जा रहा है।

इसी विडियों पर पिलखुआ के थानाध्यक्ष लक्ष्मण वर्मा जी ने ‘अमन की पहलÓ के प्रतिनिधि मंडल को बताया कि वे इन सब युवाओं की मांओं को ढाई घंटे समझाकर, बिना किसी गिरफ्तारी किए लौटे हंै। वे 23 जून को उसी दिन कासगंज से यंहा ड्यूटी पर आए। वर्मा कासगंज की घटना पर बनी एसआईटी में थे।

उत्तर प्रदेश के कासगंज में 26 जनवरी को तिरंगा यात्रा के नाम पर जो उन्मादी घटना हुई, जिसमें चुनौती देकर 60 से ज्यादा बाइकर्स पतली सी गली वाले मुस्लिम मोहल्ले में घुसते हैं और वहां चल रहे तिरंगे के कार्यक्रम को बाइक से पार करने की कोशिश करते हैं। जिसके बाद लोगों के दबाव में वह बाइकों को छोड़कर भागते हैं और शहर में दूसरी जगह मुसलमानों पर हमले होते हंै। दुकानें जला दी जाती है। गिरफ्तार 60 के करीब गरीब मुसलमान हुए।

इस तिरंगा यात्रा में नेतृत्व कर रहे एक युवक चंदन की गोली से हत्या होती है जिस के जुर्म में दो मुसलमान जो इलाके के रसूख वाले व्यापारी परिवार से संबंधित हैं को गिरफ्तार किया जाता है। स्वर्गीय चंदन को तुरंत मुख्यमंत्री के यहां से लाखों की सहायता दी जाती है। हम मानते है कि मिलनी भी चाहिए। किन्तु उसी समय चली गोली में घायल अहमद जो कि एक हिंदू पत्थर वाले के यहंा पत्थर ढुलाई का काम करता था उसका ब्यान तक नही लिया गया किसी तरह की सहायता तो दूर की बात। वर्मा पिलखुवा हत्याकांड में शामिल लोगों को समझा कर लौट आए।

2015 में हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव में एक मस्जिद के साथ ही देवी का एक स्थान गांव वालों ने बनाया इसी बात पर झगड़ा करके मस्जिद पर हमला हुआ मुसलमानों के घर पर हमले हुए घर जला दिए गए स्वर्गीय न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर के साथ हमने घरों की दीवारों को देखा और पाया सभी घर पूर्व योजना के तहत जलाए गए थे हालत इतनी गंभीर थे कि मुस्लिम महिलाओं और परिवारों को महीनों थाने में शरण लेनी पड़ी।

अभी ये चंद डरावनी घटनाएं हैं जहंा मातमपुर्सी में जा पाया। मुश्किल यह होती है कि आप कहीं खड़े हैं कोई बात शुरू करें बात तुरंत मुसलमान के ऊपर आ जाती है। चाहे वह देश के विकास का मसला हो, वह चाहे राम रहीम या आसाराम जैसे तथाकथित साधुओं का हों इस बात के लिए आरएसएस व भाजपा का आईटी सेल बहुत मेहनत से काम करता रहा है। पिछले 70 साल की बोई फसल को 4 साल में जिस तरह सरकारी खाद पानी से, नीतियों से, आभासी दुनिया से जिस तरह लहलहा दिया गया है वह कभी बदल पायेगा? यह एक बड़ा प्रश्न है इतिहास नई करवट ले रहा है।

इंदिरा गांधी के खिलाफ आपात्तकाल में आरएसएस को साथ लेना एक ऐतिहासिक भूल जय प्रकाश नारायण ने की। वे नही जान पाये की आरएसएस के नेता इंदिरा से पूर्ण सहयोग का वादा करके जेल से बाहर निकलने के माथा रगड़ रहे थे। जनसंघ के साथ बनी जनता दल की सरकार के समय जो सांप्रदायिकता का बीज सरकारी अमलों में फैलाया गया वो पेड़ बन कर भारत की पूरी धर्मनिरपेक्ष धरती को ढक गया है। जेपी यह नहीं भाप पाए थे कि आरएसएस कितने छद्मी भेष बदलकर काम करती है। अब सब सामने आ गया है। 2014 से जिस तरह आरएसएस का महिमामंडन हुआ है, हिंदू राष्ट्र की उनकी कल्पना जैसे साकार होती दिख रही हो।

यूपी बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी जैसे लोग भी नई सरकार के तलवा चाट बन रहे हैं। तीन तलाक जैसे मुद्दों पर जो कि सुनने जानने में तो बहुत प्रोग्रेसिव लगता हैं, किंतु असल में मुसलमानों को विभाजित करना, प्रताडि़त करना उसका एक छुपा उद्देश्य है। पिछले 4 सालों में कहीं भी दक्षिण भारत की देवदासी प्रथा पर कोई प्रहार नहीं है, जिक्र तक नहीं। दूसरी तरफ खोद-खोद कर मुसलमानों की धार्मिक आस्थाएं, उनके रहन सहन की, खाने पीने के, सामाजिक तौर तरीके, परंपराएं, पहनावे सब पर आलोचनात्मक खुली चर्चा हो रही है। मुस्लिम त्योहारों तक पर गंदगी की गई है। इंदौर की एक महिला विधायक ने बकरईद पर बकरे की जगह अपने बच्चे की कुर्बानी देनी चाहिये जैसी घटिया बात तक उछाली।

देश के पूरे ताने-बाने को हिंदू-मुसलमान में पुरजोर तरीके से बुनने की कवायद चालू है। अब जैसे-जैसे 2019 चुनाव नजदीक आएंगे यह गंदगी और बढ़ेगी।

हत्याओं जैसे मुद्दे पर भी मुसलमानों की कहीं कोई उत्तेजित प्रतिक्रिया नहीं आई। आरएसएस यह मानकर खुश हो सकती है कि मुसलमान उनसे डर गए। वैसे वह भी चाहती है कि कहीं कोई मुसलमान इन सब बातों से परेशन होकर गोली चला दे या बम चला दे मुसलमानों की सब्र को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि सब्र टूटे ताकि फिर वह मुसलमानों पर आक्रमक पलटवार कर सकें। आरएसएस मुखिया भागवत के शब्दों में आरएसएस के स्वयंसेवक युद्ध के लिये तीन दिन में तैयार हो जाएंगे। वह जानते हैं सीमा पर काली टोपी वाले कभी नहीं जा सकते। पिछले 4 साल में 70 साल के फैलाये जहर का सफल परिक्षण किया गया है। नतीजे में कहीं भी बिना किसी लंबी तैयारी किये, भीड़तंत्र खड़ा करके गाय के नाम पर हमले करने पर जो सफलता हासिल की है उससे वे आश्वस्त हैं कि हिंदू राष्ट्र के लिए संघर्ष करने को आरएसएस तैयार हैं। देश भर में आरएसएस किसके खिलाफ रोज हथियारबंद होकर अभ्यास करता हैं। हिंदू आतंकवाद शब्द पर वह बिलबिला जाते हैं यह बिलबिलाना ही बताता है कि हिंदू आतंकवाद देश में बहुत तेजी से फैला है। भीड़तंत्र का नाम बहुत हल्का नाम है। ये हिंदू आतंकवाद है। आरएसएस की सफलता ये भी रही कि उन्होंने जो भी काम किए अब उनको बदलने की हिम्मत विपक्षी दलों की नहीं रही बल्कि उन्होंने कांग्रेस के हिंदू चेहरे को उभारा है।

26 जनवरी 2018 की कासगंज की घटना हो या गाय के नाम पर देश भर में हुई हत्याएं। इसमें विपक्षी दल कांग्रेस बसपा समाजवादी पार्टी भी चुप नजर आई है। आखिर मुजफ्फरनगर समाजवादी पार्टी के समय की ही देन है हिंदू वोटों के डर से अपराध को अपराध की तरह नही देखा गया।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस राजनैतिक संरक्षण प्राप्त हिन्दू आतंकवाद का मुसलमान क्या उत्तर दें?

आने वाले चुनावों में ज़रूर मुसलमानों को विपक्षी दलों का साथ देना पड़ेगा मगर मुस्लिम युवाओं को यह समझ जाना चाहिए कि आरएसएस के बिछाए जा रहे इस जाल से अगर निकलना है तो उन्हें लिखाई पढ़ाई में आगे आना होगा। देश भर में आंदोलन की शक्ल में उन्हें शिक्षा की मुहिम को बढ़ाना होगा। मदरसों में हिंदी, अंग्रेजी और अन्य विषयों को भी बेहतर तरीके से पढ़ाना होगा। हर एक पढ़े लिखे मुस्लिम को गरीब और कमजोर तबके के मुसलमानों को बेहतर शिक्षा देने के लिए काम करना होगा। अखलाक की हत्या के अलावा ज़्यादातर हत्याएं गरीब अनपढ़ और दूरस्थ इलाकों में रहने वाले तबकों के मुसलमानों की हुई हंै। 18 जून को हापुड़ में हुई कासिम की हत्या के परिवार वाले अनपढ़ हैं वह अपनी चि_ी तक नहीं लिख सकते। उनके आस-पास भी कोई ऐसा नहीं जो ऐसे तमाम लोगों की मुकदमे भी आगे कैसे बढ़ पाएंगे। ये समस्या हर केस में आने वाली है।

मुसलमानों के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वे सच्चर समिति की रिपोर्ट को जिसे कांग्रेस ने भी लागू नही किया और इस सरकार से लागू कराने की तो अपेक्षा ही नहीं रखनी चाहिए। किंतु उसमें बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जो मुसलमानों को खुद आगे बढ़कर अपने समाज के लिए करनी चाहिए। सभी समाजो में समय के साथ कुरितियंा भी पनपती जाती हंै। ज़रुरत है कि इन कुरीतियों पर टीवी चर्चाओं में बहस न करके समाज को शिक्षित किया जाये। टीवी की बहस सिर्फ बदनाम करने का ही तरीका है। मुसलमानों को यह साबित करने की कोई ज़रुरत नही की वे कितने देशभक्त है। देश में आरएसएस के बनाये जा रहे मुस्लिम विरोधी वातावरण को, हवा में फैलाये जा रहे जहर को, आरएसएस के बिछाये जाल को तोडऩे का तरीका एक शैक्षिक आंदोलन ही होगा। राजनैतिक समझ के लिये, कानूनी लड़ाईयों के लिये, अपने समाज को ऊंचा उठाने के लिये, इस्लाम की सही बातों को सामने लाने के लिये मुस्लिम युवाओं को ही आगे आना होगा। यह बड़ी चुनौती उनको उठानी ही होगी।

मुझे यह आशा बनी अलीगढ़ की घटना के बाद। मई, 2018 के पहले हफ्ते में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर भगवाधारियों की फैमिली के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी विश्वविद्यालय के छात्रों पर के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस द्वारा नाजायज हमला किया गया उनकी परीक्षाओं के दिन में उनको मारा पीटा गया मुकदमे लादे गए। किंतु कोई उत्तेजनात्मकपूर्ण प्रतिक्रिया छात्रों की और से नहीं आई वे शांतिपूर्ण धरना देते रहे धरने पर अपनी किताबें भी पढ़ते रहे परीक्षाओं की तैयारी भी करते रहे।