शक-शुबहे और संदेह के बीच मध्यप्रदेश और मिज़ोरम में पड़े वोट

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मध्यप्रदेश और मिजोरम में चुनाव 28 नवंबर को मतदान हुआ। अब तक  इस घमासान को जनता पीढिय़ों से देखती आई है। अब चुनावी मशीनों और उन्हें चलाने वालों की निष्पक्षता पर संदेह करती हैं। अब शिक्षित होने से वह चुनाव अधिकारियों पर भी अपनी सवालिया उंगली उठाती हैं। गांव-देहात में भी मतदान का दिन शहरी चहल-पहल सा ही होता है। शाम ढलने के बाद हर दिन की तरह ही वह दिन सब दिन हो जाते हैं।

मध्यप्रदेश में इस बार कृषि उत्पादों की कीमतें, खाद, सिंचाई, कजऱ् माफी और किसानों पर गोलीबारी खास मुद्दों के तौर पर उभरे। इसके अलावा वे मुद्दे भी रहे जो हर चुनावों में उठते हैं पर उन पर अमल कुछ खास नहीं होता मसलन मंहगाई, बेरोज़गारी और विकास।

भाजपा के वरिष्ठ नेता अपने भाषणों में कांग्रेस अध्यक्ष के माता-पिता और पुरानी  पीढिय़ों तक को कतई भूल नहीं पाए हैं। कुछ नई बातें भी सामने आई हैं जैसे कांग्र्रेस अध्यक्ष का गोत्र क्या है। वे संस्कृत जानते हैं या नहीं। वे हिंदू है या नहीं। बीच-बीच में बातचीत में यह छौंक भी पड़ती है कि उन्हें जनेऊ पहनना आता है या नहीं। कांगे्रस दफ्तर इन तमाम जिज्ञासाओं का समाधान सोशल मीडिया पर करता है और करता रहेगा। फिर कांग्रेसी नेता भी सार्वजनिक मंचों पर भाजपा नेताओं की कुंडलियों पर भी विचार करने लगे। समाज में भेदभाव, जातिवाद की बढ़ोतरी खूब हुई। विकास उपलब्धियां बताई

गई जो धरती पर अमल में कहीं-कहीं ही आई। इसी तरह विकास और प्रगति के सपने भी मतदाताओं ने सुने।

जनता मध्यप्रदेश में लगातार तीन अवधि से भाजपा को सत्ता में लाती रही। इस बार जनता दुखी जान पड़ती है लेकिन 15 साल पहले राज्य के समाज और निजी सरकारी दफ्तरों में पनपे अंकुर अब बड़े हो गए हैं। तौर-तरीके बदल गए हैं इसलिए अनुमान कर पाना कठिन है कि ऊँ ट किस करवट बैठेगा।

प्रदेश मेें कांगे्रस ने अपना ज़ोर लगा रखा हैं। इस पार्टी के नेता अब भाजपा के विभिन्न नेताओं को तुर्की वे तुर्की जवाब भी देते हैं। पार्टी ने इस बार खुद को थोड़ा हिंदू वादी भी बना लिया है जिससे भाजपा में हिंदू कट्टरपन कुछ कम हो। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद को किसान पुत्र कहते हैं और पूरे राज्य में मामाजी कहलाते हैं लेकिन उन पर यह कथित आरोप है कि प्रदर्शन कर रहे छह किसानों को उन्होंने अपनी पुलिस के हाथों गोलियों से छलनी करा दिया। पूरे प्रदेश में दलित, मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी दिख रही है। उनमें मतदान की रु चि नहीं है।

अब की 2018 के वचन पत्र में गौ संरक्षण, गौशाला, गौमूत्र पर शोध, राम वन गमन पथ और शास्त्रों में लिखे तरीके से नदियों की सफाई तक का वादा भी देखना है कि जनता किसे अपना हिमायती मानती है।

दोनों ही पार्टियों ने चंबल क्षेत्र, मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में छोटे-छोटे उद्योग धंधों को बढ़ावा देने की बात की है। भूमि को सिंचित रखने और खाद-किटाणुनाशकों को सस्ता मुहैया कराने की बात भी कही जाती है। ऐसी हालत में जनता अपना सहयोगी किसे मान पाती है यह देखना होगा।