वोट फीसद में थोड़ा भी बदलाव बदल देता है नक्शा

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कोनराड संगमा के भाई और एनपीपी प्रवक्ता जेम्स के संगमा दादे नग्रे सीट पर जीते। एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष सप्लेंगए संगमा भी गाम्बेगे्र सीट से जीते जबकि एडेलबर्ट नानग्रम जो खुन हैनीट्रैप नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट (केएचएनएएम) के हैं वे उत्तरी शिलांग से विजयी रहे। भाजपा को जीत दिलाने वाला प्रचारक मराठी सुनील देवधर पूर्वोन्तर में भाजपा था वह चेहरा है जिससे न कभी खबरों में खुद को रखा और न चुनाव ही लड़ा। लेकिन संगठन की रणनीति, चुनाव-प्रचार,कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता को बनाए रखने में उन्होंने खासी कूटनीति अपनाई।

विधानसभा 2013 में माकपा की 49 सीटें आई थीं। दस सीटों के साथ कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल थी। माकपा को एक सीट मिली थी। देवधर न सिर्फ मेघालय और त्रिपुरा बल्कि सभी राज्यों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक के रूप में सक्रिय रहे। वे मेघालय में खासी और गारों जनजाति के लोगों से उन्हीं की भाषा में और बंगालियों से बांग्ला में बात करते हैं।

देवधर ने पिछले पांच साल में वाम दलों, तृणमूल कांगे्रस और कांग्रेस से पहले भाजपा कई नेताओं और विधायकों को चुनाव के पहले भाजपा में शामिल कराया। इनके साथ ही निचले स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को जोड़ा और बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया। देवधर ने वामदलों की ही तरह अपने कैडर बनाए।

कांगे्रस के ऐसे अच्छे नेताओं को उन्होंने भाजपा से जोड़ा जो वाममोर्चे के चुनौती देते रहे। फिर माक्र्सवादी और असंतुष्ट लेकिन मंजे हुए नेताओं को भी संगठन से जोड़ा। उन्होंने कार्यकर्ताओं को उचित प्रशिक्षण दिया और उन्हेें संतुष्ट रखा।

क्या है तिपरालैंड विवाद?

 

देश 1947 में आजाद हुआ। त्रिपुरा का संघ गणराज्य में नौ सितंबर 1949 मेे विलय हुआ। इससे पहल यह एक रियासत थी। इसे यूनियन टेरिटरी का दर्जा 1963 में दिया गया फिर 21 जनवरी 1972 मेें त्रिपुरा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।

त्रिपुरा के पड़ोस में पूर्व पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) था। वहां से बंगाली हिंंदू त्रिपुरा आ रहे थे। यह बात त्रिपुरा के लोगों को नहीं भा रही थी। वहां भी छिटपुट संघर्ष होता रहा। वामपंथियों के राज में हिंसा पर रोक लगी।

जनगणना के अनुसार 2001 में पाया गया कि त्रिपुरा में 70 फीसद बंगाली हैं यानी आदिवासी सिर्फ तीस फीसद। एक लंबे आंदोलन के बाद देश का 29वां राज्य तेलंगाना दो जून 2014 में बना। तबसे यहां तिपरालैंड की आवाज ने फिर जोर पकड़ा। भाजपा ने यहां के आदिवासियों में लोकप्रिय संगठन इंडीजीनिय पीपुल्स फं्रट ऑफ त्रिपुरा के साथ तालमेल किया। इस फ्रंट ने नौ सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें आठ पर विजय पाई। अब उनका कहना है कि 35 सीटों को पाने वाला भाजपा पहले उनकी मांग स्वीकार करे या तो राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री बनाए या फिर अलग तिपरालैंड की घोषणा करें। हालांकि अब राज्य में भाजपा सरकार है पर विवाद पर बहस जारी है। एनसी देव वर्मा ने कहा कि भाजपा को आदिवासियों के वोटों की बदौलत जीत हासिल हुई। वे सभी एसटी सीटों पर जीते हैं। ऐसे में एसटी सीट से जीते प्रत्याशी को ही मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए।

कांग्रेस

देश में वामपंथ को बचाए रखने के लिए कांग्रेस या दूसरी विपक्षी पार्टियों के साथ तालमेल बहुत ज़रूरी नहीं है।

केरल में वाम मोर्चा के साथ दूसरे दल भी गठबंधन में हैं। इसे लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट कहत हैं। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व में एक मोर्चा है जिसे युनाइटेठ डेमोक्रेटिक फ्रंट कहते हैं। यहां बड़े मोर्च की संभावना ही नहीं है।

बंगाल में वाम मोर्चा हाल ही में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ चुका है। उसमें उसे बड़ा नुकसान हुआ और कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। वहां तृणमूल से गठबंधन की संभावना नहीं है।

त्रिपुरा में कांग्रेस और तृणमूल का पूरा संगटन और नेतृत्व भाजपा में जा चुका था। वहां कोई भी गुंजायश नहीं थी।

आंध्र में राजशेखर रेड्डी के समय में कांग्रेस के साथ रणनीतिक समझदारी बनी थी। वाम मोर्चे ने वहां कांग्रेस के साथ तत्कालीन सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन चलाया। इसका चुनावी लाभ भी हुआ। जीत के बाद कांग्रेस की सरकार अपने एजेंडे पर चलने लगी। घाटा वाम मोर्चे को हुआ। इसका ज़मीनी संघर्ष कमज़ोर हो गया।

बिहार में वामपंथी दलों को लालू प्रसाद ने खत्म कर दिया। पहले उन्होंने माले फिर माकपा के विधायकों को साथ लिया फिर माकपा पर डोरे डाले और उसकी धार कुंद कर दी। वाम मोर्चे ने सामाजिक न्याय की सियासत के आगे अपने एजंडे को भुला दिया। वहां अब माले और माकपा के थोड़े बहुत अवशेष बचे हैं।

उत्तरप्रदेश में अब छिटपुट वामपंथी हैं। जहां समर्थन विरोध का कोई मतलब नहीं। सामाजिक न्याय के एजंडे पर सक्रिय दलों से वामपंथी न्यूनतम कार्यक्रम आधारित साझेदारी रख सकते हैं।