विश्वशक्ति के देसी खिवैया

हालांकि मुश्किलें उनके लिए भी कम नहीं थीं. तब तक भले ही. रवींद्रनाथ टैगोर अपनी साहिित्यक और सीवी रमन अपनी वैज्ञानिक मेधा के लिए नोबेल जीत चुके थे, लेकिन अमेरिका में भारतीयों की छवि काफी कुछ 1927 में आए कैथरीन मायो के मदर इंडिया उपन्यास जनित ही थी–सांप-संपेरों, भालू-मदारियों और गंदगी से उफन रहे एक ऐसे देश के लोग जो अपना पेट तक ठीक से नहीं भर सकते. अपने एक लेख में चर्चित अमेरिकी-भारतीय उद्यमी कंवल रेखी कहते हैं, ‘कोई भारतीय किसी अमेरिकन कंपनी का मुखिया बनेगा यह सोचना 1967 में असंभव था जब मैं वहां पहुंचा था.’ फोर्ब्स में छपे एक लेख में स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता निशा बापट लिखती हैं, ‘ 50 या 60 के दशक के दौरान अमेरिका में जो चंद भारतीय मिलते थे वे कंपनी में निचले स्तरों पर काम करने वाले कुछ ऐसे इंजीनियर होते थे जो अमेरिका पढ़ने आए और वहीं रह गए. भारतीयों की आम छवि भिखारियों और संपेरों की थी. अमेरिका में शीर्ष पदों पर उनके होने की कल्पना तो बहुत दूर की कौड़ी ही थी.’

लेकिन 1965 के बाद जब धीरे-धीरे बड़ी संख्या में भारतीय छात्र वहां पहुंचने लगे और न सिर्फ अपने रंग-रूप बल्कि अपनी मेधा की वजह से भी वहां के आम छात्रों से अलग पहचाने जाने लगे तो यह छवि बदलने लगी. जैसा कि रेखी कहते हैं, ’70 के दशक के शुरुआती वर्षों तक अमेरिका थोड़ा शिकायती लहजे में ही सही पर मानने लग गए थे कि उनमें कुछ तो खास है. इन आरंभिक युवाओं में से कई डॉक्टरेट कर गए. सफलता की शुरुआत प्रोफेसर जैसे पदों के साथ हुई.’ धीरे-धीरे इन छात्रों को उद्योग जगत में अच्छी नौकरियां भी मिलती गईं.. भारतीयों को उनकी गणितीय कुशलता की वजह से अच्छे इंजीनियरों और प्रोग्रामरों के रूप में पहचाना जाने लगा. धीरे-धीरे भारत के मेडिकल स्कूलों और बिजनेस स्कूलों से निकली प्रतिभाएं भी वहां पहुंचने लगीं और डॉक्टर या वित्तीय प्रोफेशनल के तौर पर सफल होने लगीं. 1980 के दशक में भारतीय उद्यमी भी बन गए. रेखी कहते हैं, ‘ सिलिकॉन वैली जहां दुनिया भर की प्रतिभाएं इकट्ठा हो रही थीं, ऐसी सफलताओं का केंद्र बन गई. भारतीयों ने यहां कई असाधारण उपलब्धियां अर्जित कीं.’ फिर 1990 का दशक आया जिसे सिलिकॉन वैली में भारतीयों का स्वर्णकाल कहा जाता है. पेंटियम चिप के जनक कहे जाने वाले विनोद धाम, सन माइक्रोसिस्टम्स के सहसंस्थापक विनोद खोसला, गूगल के शुरुआती निवेशक और वर्तमान में इसके बोर्ड मेंबर केआर श्रीराम और हॉटमेल के सबीर भाटिया जैसे कई नामों की अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चर्चा हुई.

लेकिन तब भी अमेरिका में आम धारणा यह थी कि भारतीय बड़ी कंपनियों के सीईओ नहीं बन सकते. 21 वीं सदी के पहले दशक ने यह धारणा भी ढहा दी. 2004 में आरईसी राउरकेला से पढ़े सूर्या महापात्रा फॉर्च्यून 500 में आने वाली कंपनियों में से एक क्वेस्ट डॉयाग्नोस्टिक्स के सीईओ बने. 2006 में इंद्रा कृष्णमूर्ति नूयी ने पेप्सी की कमान संभाली. इस सूची में सिटीबैंक के विक्रम पंडित, काग्निजेंट के फ्रैंक डिसूजा, स्कैनडिस्क के संजय मेहरोत्रा जैसे कई नाम जुड़ते गए और सत्या नाडेला ने तो इस मोर्चे पर अब तक की सबसे बड़ी गूंज पैदा की है.

अमेरिका स्थित यूसी-बर्कले स्कूल ऑफ इनफॉर्मेशन के डीन एन्ना ली सक्सेनियन ने 1999 में एक अध्ययन किया था. पता चला कि 1980 से 1998 के बीच सिलिकॉन वैली में जो नई कंपनियां स्थापित हुई उनमें सात फीसदी भारत में जन्मे उद्यमियों ने शुरू की थीं. सक्सेनियन ने इसके आठ साल बाद यानी 2007 में ड्यूक यूनिवर्सिटी में शोध निदेशक प्रोफेसर विवेक बाधवा और स्टैनफोर्ड लॉ स्कूल के प्रोफेसर एफ डैनियल सिसिलियानो के साथ मिलकर एक अध्ययन किया. नतीजे चौंकाने वाले थे. पता चला कि सिलिकान वैली में चल रही कंपनियों में से 13.4 फीसदी भारतीयों की हैं और पूरे अमेरिका के लिए यह आंकड़ा 6.5 फीसदी है. अमेरिका में दूसरे सात अल्पसंख्यक समूहों को मिला दें तो भी भारतीय उनसे आगे हैं. बाहर से आए लोगों द्वारा अमेरिका में शुरू किए कुल उद्यमों से से 33.2 फीसदी हिस्सा भारतीयों का है. दिलचस्प यह भी है कि 2008 की मंदी और अमेरिका की जटिल आव्रजन नीति के चलते बीते कुछ समय के दौरान ऐसे उद्यमों और उद्यमियों का आंकड़ा गिरा है, लेकिन भारतीय तब भी धारा के विपरीत चलने में सफल रहे हैं. 2007 से भारतीयों द्वारा शुरू की गई कंपनियों का आंकड़ा 13.04 से बढ़कर 14 फीसदी हुआ है. यूएस सेंसस ब्यूरो के कुछ समय पहले के एक आंकड़े के मुताबिक अमेरिका में करीब तीन लाख कंपनियां हैं जो भारतीय अमेरिकियों की हैं. इन कंपनियों में करीब साढ़े आठ लाख लोगों को रोजगार और उन्हें सालाना करीब 26 अरब डॉलर वेतन के रूप में मिलते हैं.

क्या है वजह
आखिर क्या वजह है कि अमेरिका में भारतीय वहां बसे चीनियों या रूसियों से इतना आगे हैं. कई जानकार मानते हैं कि उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि उन्हें दूसरों की तुलना में बढ़त देती है. विवेक वाधवा कहते हैं, ‘भारतीयों को अपनी विरासत का फायदा मिलता है, वे अंग्रेजी बोलते हैं और एक लोकतांत्रिक समाज से आते हैं. अमेरिका की तरह भारतीय भी अपनी सरकार की आलोचना के लिए स्वतंत्र होते हैं. इसीलिए उनमें आजादख्याली का एक अहम गुण होता है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘सांस्कृतिक रूप से अमेरिकी और भारतीय समान हैं और यही खासियत उन्हें दूसरे देशों के लोगों की तुलना में फायदा देती है. जब वे अमेरिका आते हैं तो तुरंत फिट हो जाते हैं.’ वाधवा कहते हैं, ‘चीन में आप सरकार की आलोचना की हिम्मत नहीं कर सकते क्योंकि हो सकता है कि आपको अगले दिन उठा लिया जाए. आम चीनी अथॉरिटी से आतंकित रहता है. जो सत्ता के सख्त बंधन वाले देशों से आते हैं वे नियमों के परे जाने से डरते हैं. जबकि उद्यमी बनने के लिए आपको नियम तोड़ने का जोखिम उठाना होता है.’

एक और कारण यह भी है कि अमेरिका आने वाले भारतीय युवा एक तरह से प्रतिभाओं का सबसे ऊंचा स्तर होते हैं. सिलिकॉन वैली के अनुभवी पेशेवर और सिंफनी टेक्नॉलॉजी ग्रुप के संस्थापक रोमेश वाधवानी अपने एक लेख में कहते हैं, ‘भारत से अमेरिका आने वाले छात्रों की एक बड़ी संख्या पहले ही एक कठिन परीक्षा से गुजरकर अपनी प्रतिभा साबित कर चुकी होती है. आईआईटी सहित कई दूसरे अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेजों से यहां आए हम लोग डार्विन के श्रेष्ठतम की उत्तरजीविता वाले सिद्धांत के तहत आगे बढ़े हैं.’  विवेक वाधवा इसकी वजह उस नेटवर्क को भी बताते हैं जो शुरुआत में वहां सफल होने वाले भारतीयों ने अगली पीढ़ी के उद्यमियों के लिए बनाया. वे कहते हैं, ’30 साल पहले जब भारतीयों को सिलिकॉन वैली में शुरुआती सफलताएं मिलीं तो उन्होंने खास तौर पर इस मकसद से संस्थाएं बनाईं और सफल उद्यमियों की एक दूसरी पीढ़ी खड़ा होने में अहम योगदान दिया.’

एक अहम वजह यह भी है कि अपना धंधा जोड़ना भारतीय समाज में एक प्रतिष्ठा की बात समझी जाती है. यह एक सांस्कृतिक प्रवृत्ति है. वाधवा कहते हैं, ‘इसके लिए भारत में सामाजिक प्रोत्साहन मिलता है.’ समाज की भूमिका यहीं सीमित नहीं होती. भारतीय समाज में अकादमिक उपलब्धि पर भी बहुत जोर होता है क्योंकि पारंपरिक रूप से वहां ज्ञान सबसे बड़ा गुण माना जाता रहा है. अमेरिका में होने वाली स्पेलिंग प्रतियोगिताओं में अगर भारतीय बच्चे चैंपियन हैं तो उन्हें दिन में कई घंटे पढ़ना पड़ता है और शब्द व उनकी उत्पत्ति का विज्ञान याद करना पड़ता है. इसमें दूसरी चीजों से कहीं ज्यादा बौद्धिक स्तर पर दूसरों से आगे आने का रोमांच होता है.

लेकिन साधारण से अति असाधारण बनने के लिए शिक्षा और संस्कृति ही काफी नहीं. प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा होनी भी जरूरी है. आपकी बुद्धिमत्ता यानी आईक्यू स्वाभाविक रूप से औरों से ज्यादा होनी चाहिए. आपका दिमाग सहज ही औरों से ज्यादा परिष्कृत होना चाहिए. करीब एक दशक पहले प्रिंसटन  युनिर्सिटी ने अपने एक सर्वे यानी न्यू इमिग्रेंट नामक सर्वे में पाया था कि अप्रवासी भारतीयों का औसत आईक्यू न सिर्फ अमेरिकियों से बल्कि बुद्धिमान कहे जाने वाले अश्केनाजी यहूदी समुदाय से भी ज्यादा होता है. हालांकि छोटे-से सैंपल साइज और इसकी पुष्टि करते किसी अध्ययन की गैरमौजूदगी में इस निष्कर्ष पर सवाल उठाया जा सकता है, लेकिन भारतीयों की जो उपलब्धियां देखी जा रही हैं वे तो इसे वजन देती ही लगती हैं.

अपनी शिक्षा, सामाजिक संस्कृति और संभावित सहज प्रतिभा के बूते भारतीय अमेरिकी अमेरिका में एक आर्थिक ताकत बन चुके हैं. क्या वे राजनीतिक क्षेत्र में भी ऐसी ही सफलता हासिल कर पाएंगे? क्या गवर्नर जिंदल जैसे उदाहरण आगे और भी हो सकते हैं? जानकारों के मुताबिक यह इस पर निर्भर करेगा कि वे उन क्षेत्रों में कितनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवा पाते हैं जिन्हें राजनीतिक करियर के लिहाज से अहम माना जाता है. रिशवाइन कहते हैं, ‘अमेरिका में राजनीतिक करियर के लिए सबसे अनुकूल क्षेत्र हैं लॉ और फायनैंस. यहां अभी भारतीयों का प्रभाव उतना नहीं है.’

लेकिन बाकी क्षेत्रों में उन्होंने जो प्रभाव पैदा किया है उसने बीती एक सदी के दौरान भारतीयों की आम छवि बिलकुल बदल दी है. रेखी कहते हैं, ‘आज अमेरिका में भारतीयों को एक आदर्श की तरह देखा जाता है जो जीवन के अच्छे पहलुओं को देखते हैं और परिवार को समय देते हैं. एक औसत अमेरिकी आज उन्हें क्लास में सबसे तेज बच्चे, यूनिवर्सिटी में सबसे अच्छे प्रोफेसर और अस्पताल में सबसे बढ़िया डॉक्टर की तरह देखता है. ‘

अमेरिका में भारतीयों के करीब डेढ़ सदी लंबे सफर का एक अहम सबक यह भी है कि उदारता की तरफ बढ़ने वाले समाज की ताकत भी बढ़ती रहती है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here