विपदा और विडंबना

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18 जून को मौसम साफ हो गया था. राज्य सरकार के एक मंत्री और कुछ अधिकारी केदारनाथ की हवाई यात्रा करके देहरादून पहुंच गए थे. उनके द्वारा दी गई तस्वीरों से केदारनाथ की तबाही की खबर सार्वजनिक हो गई थी. इतनी बड़ी तबाही देखकर कई राज्यों के अधिकारी उसी दिन शाम तक देहरादून पहुंच गए थे और किसी भी तरह अपने प्रदेश से आए यात्रियों से संपर्क बनाने की कोशिश में लगे थे. लेकिन दूसरी ओर उत्तराखंड सचिवालय में आम दिनों की तरह ही कामकाज दिख रहा था. आपदा प्रबंधन विभाग से जुडे़ शासन के एक अधिकारी अकेले बचाव, राहत और समन्वय की जिम्मेदारी तो देख ही रहे थे, अपने मोबाइल पर कई राज्यों के लोगों की आशंकाएं भी शांत कर रहे थे. यानी देश-दुनिया को परेशान करने वाली आपदा के बचाव और राहत कार्य में न तो अतिरिक्त अधिकारी ही लगाए गए थे और न ही कर्मचारी. अगले दो दिन तक राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र का यही हाल रहा.

18 जून को ही मुख्यमंत्री ने केदारनाथ और उत्तरकाशी के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय राजधानी देहरादून में अपने प्रिय दो विधायकों के क्षेत्रों में ढहे पुश्तों का जायजा लेना उचित समझा. 19 जून को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आपदाग्रस्त इलाकों के हवाई सर्वेक्षण से पहले बहुगुणा ने पहली बार आपदा प्रभावित क्षेत्रों में से कुछ का हवाई दौरा किया. उस दिन राज्य के एक बड़े अधिकारी ने हवाई सर्वेक्षण करने के बाद बचाव कार्य और फंसे हुए लोगों को निकालने की रणनीति बताने के बजाय यह बयान दिया कि उन्होंने सारे प्रदेश का दौरा कर लिया है और केंद्र के साथ हुई बैठक में राहत और पुनर्निर्माण के लिए तीन हजार करोड़ रु का प्रस्ताव भेज दिया है. इस बयान से समझा जा सकता है कि उस दिन राज्य सरकार की प्राथमिकता क्या थी. दरअसल उत्तराखंड में आपदा राहत के लिए केंद्र से ज्यादा से ज्यादा धन मांगने और वह धन आने के बाद उसकी बंदरबांट का पुराना और हर पार्टी का इतिहास है.

प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के दौरे और अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों-अधिकारियों के देहरादून में डेरा डालने से उत्तराखंड सरकार थोड़ी हरकत में तो आई, लेकिन उसके पास बचाव और राहत कार्य संचालित करने की न तो कोई निश्चित रूपरेखा थी और न कोई प्रबंधन तंत्र. तब तक दिल्ली में केंद्र सरकार की हाई पावर कमेटी सहित कई बैठकें हो चुकी थीं. कांग्रेस पार्टी के दिग्गज भी दिल्ली में बैठक कर चुके थे. लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री अपने दो सहयोगियों और एक बड़े अधिकारी के साथ ही आपदा से निपटने की कोशिश में लगे थे. आपदा के बाद अभी तक एक बार भी राज्य में बड़े निर्णय लेने के लिए कैबिनेट बैठक नहीं हुई. ये मंत्री और कुछ विधायक हेलीकाप्टरों में यहां-वहां उड़ कर महत्वपूर्ण समय और संसाधन बर्बाद कर रहे थे. इन्हीं दिनों दुर्गम पहाड़ों में मौत से जूझती हजारों जानें बचने की एक आस में ऊपर उड़ रहे इन हेलीकाप्टरों को टुकुर-टुकुर देख रही होंगी. 20 जून की रात मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के कुछ सहयोगियों से अलग-अलग जिलों की कमान संभालने को कहा. वे 21 जून तक ही प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच पाए. तब तक पांच दिन बीत चुके थे.

राजनीतिक नेतृत्व की तरह प्रशासनिक नेतृत्व भी सुस्त और दिशाहीन दिखा. 18 जून को केदारनाथ की स्थिति देखने के बाद रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी बीमार होकर देहरादून स्थित अस्पताल में भर्ती हो गए थे. अगले चार दिन तक जिला बिना जिलाधिकारी के ही रहा. उनका काम देखने के लिए ऐसा कोई प्रशासनिक अधिकारी तैनात नहीं किया गया जो अनुभवी हो और प्रशासन, सेना, आईटीबीपी और केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से समन्वय की क्षमता रखता हो. नतीजतन कि सारी व्यवस्थाएं चरमरा गईं और सूचना तंत्र फेल हो गया.  सेना और आईटीबीपी युद्ध-स्तर पर बचाव का काम तो कर रही थी, लेकिन कौन फंसा है, कौन आ गया, किसे अस्पताल भेजा गया है, कौन मर गया है, यह बताने के लिए कोई व्यवस्था नहीं बन पाई. केदारनाथ, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, फाटा और गुप्तकाशी में पांच दिन तक कोई डिप्टी कलेक्टर तक तैनात नहीं किया गया जो राजधानी देहरादून तक सही स्थिति बताता और उसके अनुसार आगे की योजना तय होती.

देश-दुनिया में इतने शोर के बाद भी प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व और शीर्ष नौकरशाही की आंख नहीं खुल रही थी. सूत्र बताते हैं कि आपदा के पहले ही दिन से राज्य के कई युवा अधिकारी आगे बढ़कर आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर काम करने की इच्छा अपने बड़े अधिकारियों को बता चुके थे , लेकिन उनसे काम लेने को कोई तैयार ही नहीं था. उत्तरकाशी स्थित दुनिया भर में चर्चित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में ऊंचे हिमालयी इलाकों में बचाव और राहत का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. जब 18 जून तक यहां कोई सरकारी आदेश नहीं पहुंचा तो संस्थान के अधिकारी खुद ही प्रशिक्षकों सहित 110 बचाव विशेषज्ञों की सूची लेकर जिलाधिकारी के पास गए और उनसे बचाव कार्य में लगने की इजाजत मांगी. इसके बाद उन्होंने जिले के अलग-अलग इलाकों से करीब 46 विदेशियों सहित करीब 6,500 लोगों को बचाया. साफ था कि सरकार अपने ही संसाधनों की अहमियत से अनजान थी. अव्यवस्था और देश भर में हो रही बदनामी के बीच केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने माना कि समन्वय में कमी है. इस बीच केंद्र ने आपदाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन की मदद के लिए कुछ युवा परिवीक्षाधीन अधिकारी भेजे.

इतना सब होने के बाद 21 जून की शाम शासन ने राज्य के 12 युवा अधिकारियों को अलग-अलग आपदाग्रस्त क्षेत्रों में नोडल अधिकारियों के रूप में तैनात करने के आदेश जारी किए. ये अधिकारी 22 जून की रात या 23 जून दोपहर तक किसी तरह इन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचे. तब तक तबाही हुए छह दिन बीत गए थे, लोगों को बचाने और उनके परिजनों को सांत्वना व सूचना देने का समय जा चुका था. आपदा कभी शोर मचा कर नहीं आती,  लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक गंभीरता से उसकी आहट सुनी जा सकती है. उससे निपटने की तैयारी पहले से की जा सकती है. इस बार भी राज्य में ही मौजूद संसाधनों के जरिये अविलंब मदद पहुंचाकर कई जिंदगियां बचाई जा सकती थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बात का जवाब किसी के पास नहीं कि संकट की ऐसी घड़ी में उत्तराखंड की सरकार को अहम निर्णय लेने में पांच-छह दिन क्यों लगे. अब यह हाल था तो आम दिनों में वह कैसे काम करती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है.

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