लोकतंत्र का रक्तसमूह

इलेस्ट्रेशन:मनीषा यादव
इलेस्ट्रेशन:मनीषा यादव

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था. खून के एक नमूने का ब्लडग्रुप तय करने में भारी मशक्कत लग रही थी. कभी-कभी तो हद हो जाती, जब एक साथ कई ब्लडग्रुप निकल आते. आखिर यह कौन-सी पहेली है! लैब में डॉक्टर से लेकर टेक्नीशियन तक सब हलकान. अभी पहले वाले का ब्लडग्रुप निकालने में सभी पिले पड़े हैं जिसने सबका तेल निकाल रखा है जबकि दो सैंपल और पड़े हुए हैं.

खुलता रहस्य- कई बार अपने सहायक को भेजने के बाद वह व्यक्ति, जिसके खून के नमूने के कारण बवंडर मचा है, अपने लाव-लश्कर के साथ पैथोलॉजी में अपनी रिपोर्ट लेने आज खुद आ धमका है. दरअसल, उसका खून उसके घर में निकाला गया था, जिसे पैथोलॉजी उसका कोई ‘अपना आदमी’ लेकर आया था. आज जिस वेशभूषा में वह यहां खुद आया है, तो उससे इस समस्या के समाधान की राह खुलती-सी नजर आ रही है. कल हर हाल में रिपोर्ट देने की चेतावनी देकर वह चला गया.

लैब का दृश्य- ‘अबे, तभी तो कहे कि काहे एक से ज्यादा ब्लड ग्रुप शो हो रहा है.’ ‘काहे!’ ‘हर वर्ग का खून चूसा है न, इसलिए…’ ‘तो कौन-सा ब्लड ग्रुप दिया जाए! आखिर कोई न कोई तो देना पड़ेगा ही.’ ‘ऐसा करो, नेता जी का ब्लडग्रुप एबी रख दो!’ ‘ऐसा क्यों भई?’ ‘एबी यूनिवर्सल है ना! सबका खून ले सकता है भई… समझे कि नहीं!’ लैब में ठहाके गूंज उठे.

अब बारी दूसरे ब्लड सैंपल की…
इस ब्लड सैंपल का ब्लड ग्रुप निकालने में कोई कठिनाई नहीं हुई. जिस समय इसकी रिपोर्ट मालिक के हाथ लगी, उनके हाथ में मिठाई का टुकड़ा था. मिठाई खाते-खाते रिपोर्ट देखने लगे. देखा, सब नॉर्मल निकला. शुगर थोड़ी बढ़ी हुई जरूर थी. रिपोर्ट को किनारे रख मिठाई का एक और टुकड़ा उठा कर खाने लगे. बात यह थी कि वित्तीय अनियमितता के एक मामले में आज ही उन्हें ‘क्लीन चिट’ मिली है. क्लीन चिट उन्हें ऐसे ही नहीं मिली थी. जितना कमाया था, कम से कम उसका आधा तो उन्हें देना ही पड़ा था. जांच कमीशन से लेकर शासन तक. इस बीच वे बचे पैसे निवेश करने की योजना बनाते रहे. तभी उन्हें रिपोर्ट का ख्याल आया. उन्होंने उसे अलसाए ढंग से उठाया. उनकी नजर अपने ब्लडग्रुप पर पड़ी. देख कर मुस्कुरा दिए. रिपोर्ट में ब्लडग्रुप ‘बी पॉजिटिव’ लिखा था.

तीसरा ब्लड सैंपल और उसकी रिपोर्ट- खून देने वाला काउंटर पर खड़ा है. कर्मचारी ने उसकी ब्लड रिपोर्ट उसके हाथों में ऐसे थमाई जैसे दिहाड़ी मजदूर को फावड़ा थमाना. वह व्यक्ति सहायक की ओर लक्ष्य करते हुए बोला, ‘इया का आवा है?’ ‘तुम्हारे खून में हीमोग्लोबिन की कमी है.’ ‘हीमो…यू का है?’ कर्मचारी ने पहले उसे घूर कर देखा फिर बोला, ‘लोहे की कमी है तुम्हारे खून में.’ ‘लोहे की! अरे, हम ता जिंदगी में हर बखत ही लोहा लेत रहत है फिर हमरे खून में लोहा कैसे कम हो सकत है!’ कर्मचारी कुछ पिघला, ‘उदास मत हो! तुम्हारा ब्लडग्रुप बहुत अच्छा है…’ उस व्यक्ति ने अपनी गर्दन पर जोर दिया. उसका चेहरा थोड़ा उठा. कर्मचारी ने उसके चट्टान जैसे सख्त चेहरे को देखा. उसे ढाढ़स बंधाते हुए बोला, ‘बहुत अच्छा खून है तुम्हारा. तुम्हारा ब्लडग्रुप ओ पॉजिटिव है… ओ पॉजिटिव.’ वह व्यक्ति चुपचाप निष्प्राण सुने जा रहा था. कर्मचारी उसका उत्साहवर्धन करते हुए बोला, ‘जानते हो इसका मतलब ! अरे, तुम किसी को भी अपना खून दे सकते हो…’

-अनूप मणि त्रिपाठी

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