लम्बे संघर्ष के बाद घर लौटे अन्नदाता

इस तरह की सदियों से मार सहने वाले किसानों को इस बार कृषि क़ानूनों के झमेले में डाला जा रहा था, जो कि उनके हित में नहीं बताये जा रहे थे। यही वजह रही कि किसानों को इन कृषि क़ानूनों के विरोध में आन्दोलन करना पड़ा। इससे केंद्र सरकार की देश के अलावा दुनिया में भी निंदा हुई। इसके अलावा उसे हाल के चुनावों में इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा। माना जा रहा है कि चुनावों में हार का डर सामने देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि क़ानूनों की वापसी की घोषणा 19 नवंबर, 2020 को गुरु पर्व के दिन बड़े ही भावुक तरीक़े से की। 29 नवंबर को इस साल के शीत सत्र के पहले दिन 29 नवंबर को संसद के दोनों सदनों में फटाफट तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी के लिए कृषि क़ानून वापसी विधेयक पास कर दिया। हालाँकि अभी किसानों की बाक़ी माँगों को लेकर कोई काम नहीं हुआ है; लेकिन सरकार ने इसके लिए किसानों को पत्र सौंपकर आश्वासन ज़रूर दिया है, जिनमें आन्दोलन में शहीद हुए किसानों के परिजनों को मुआवज़ा देने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर क़ानून बनाने को लेकर एक समिति गठित करने की सहमति समेत किसानों की अन्य सभी प्रमुख माँगें मान ली हैं।

‘तहलका’ ने आन्दोलन शुरू होने से लेकर आन्दोलन के हर पहलू को अपने अंकों में निष्पक्ष और निर्भीक तरीके से स्थान दिया है। किसानों की घर वापसी भले ही आन्दोलन समाप्त करने की शर्त पर नहीं हुई है; लेकिन तसल्ली वाली है। हम किसानों को इस बड़ी जीत की बधाई देते हैं और कामना करते हैं कि अब कुछ ऐसा हो, जिससे देश के सभी किसानों की आर्थिक दशा सुधरे और वे ख़ुशहाल हों।

एमएसपी का आकलन

सन् 1965 में देश की तत्कालीन सरकार ने यह निर्णय लिया कि कुछ कृषि उत्पादों को सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य अर्थात् मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एमएसपी) पर ख़रीदेगी। तबसे सरकार द्वारा तय भाव पर किसानों द्वारा उगायी गयी कुछ फ़सलों के उत्पादों को देश की सरकार ने अपने तथा राज्य सरकारों के माध्यम से ख़रीदना शुरू किया। इन उत्पादों की ख़रीद के लिए केंद्र सरकार ने भारतीय खाद्य निगम की स्थापना की, जो राज्य सरकारों की ख़रीद संस्थाओं के ज़रिये किसानों से लेबी (सहकारी ख़रीद केंद्र) की मदद से किसानों के उत्पाद ख़रीदती हैं।

भारतीय खाद्य निगम की मानें, तो कृषि उत्पाद खरीद की इस श्रेणी में कुल 23 उत्पाद आते हैं, जिन्हें कि सरकार द्वारा ख़रीदा जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से किसानों के पाँच-छ: उत्पाद ही इन ख़रीद केंद्रों पर ख़रीदे जाते हैं। इनमें भी गेहूँ और धान की सबसे ज़्यादा ख़रीद होती है; लेकिन यह भी केवल क्रमश: 22 और 28 फ़ीसदी ही है। बाक़ी खाद्यान्नों में कुछ की ख़रीद उत्पादन से 10 फ़ीसदी, तो कुछ की पाँच फ़ीसदी से भी कम की जाती है। लेकिन ये उत्पाद भी चार-पाँच ही हैं। अर्थात् 23 में से 13 से अधिक उत्पादों को सरकार नहीं ख़रीदती। इसके बावजूद जो भी उत्पाद सहकारी ख़रीद केंद्रों पर ख़रीदे जाते हैं, उन्हें बेचने में भी किसानों को तरह-तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। इस बार की ही बात करें, तो धान की ख़रीदी इतनी देरी से हुई कि छोटे किसानों ने मजबूरन आढ़तियों को कम भाव में धान बेच दिये। किसानों के लिए यह हर साल का रोना है। ऐसे में अगर एमएसपी पर क़ानून बन जाता है, तो सम्भवत: किसानों को राहत मिले तथा वे बिचौलियों, आढ़तियों और दलालों के हाथों ठगे जाने से बच सकें।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र सरकार द्वारा बनायी गयी यह समिति एमएसपी पर क़ानून बनाने के निर्णय तक पहुँच सकेगी? क्या समिति एमएसपी को लेकर कोई ऐसा निर्णय ले पाएगी, जिससे किसानों को हर फ़सल पर होने वाले नुक़सान से निजात मिल सके?

आर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) की रिपोर्ट के मुताबिक, सन् 2000 से सन् 2017 तक केवल 18 साल में देश के किसानों को 45 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह नुक़सान किसानों को उनके कृषि उत्पादों का उचित दाम न मिलने की वजह से हुआ है।

हाल ही में जारी नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट में कहा गया है कि किसानों की प्रति महीने औसत आय केवल 10,218 रुपये है, जिसमें खेती से उन्हें केवल औसतन 3,798 रुपये प्रति माह ही प्राप्त होते हैं। इसके अलावा एक अन्य सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 80 फ़ीसदी छोटे किसान हैं और उनकी दैनिक आय महज़ 27 रुपये है। किसानों की इतनी कम आय की वजह उनके कृषि उत्पादों का बाज़ार में सही भाव नहीं मिलना है। आज देश के ज़्यादातर कृषि वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी इस बात के पक्ष में हैं कि किसानों को उनके उत्पादों का सही भाव मिले। लेकिन वहीं कुछ तथाकथित कृषि विशेषज्ञ और सरकार के नुमाइंदे कहते हैं कि एमएसपी लागू करने से बाज़ार की स्थिति बिगड़ जाएगी। महँगाई बढ़ जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि कई महीने खेतों में मेहनत करके, लागत लगाकर फ़सल पैदा करने वाला किसान अपनी लागत भी वापस नहीं पाता, जबकि बिचौलिये, दलाल और आढ़तिये चंद मिनटों या कुछ ही दिनों में किसान से भी ज़्यादा मुनाफ़ा उन्हीं उत्पादों से कमा लेते हैं। तो क्या सरकार और यह तथाकथित कृषि विशेषज्ञ इन बिचौलियों, दलालों और आढ़तियों के पक्ष में खड़े हैं? क्या सरकार को देश का पेट भरने वाले अन्नदाता से ज़्यादा चिन्ता उन लोगों की है, जो अपने मुनाफ़े के चक्क में किसानों को लूटने के अलावा जनता की भी जेब काटते हैं और इसके बावजूद मिलावट करके जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हैं? इसके पीछे क्या रहस्य है? यह बताने की हमें ज़रूरत नहीं; आप ख़ुद समझदार हैं।

एमएसपी पर ना-नुकुर क्यों?

किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने में अब तक की सभी सरकारों ने ना-नुकुर की है। यही वजह रही कि सन् 1965 में एमएसपी पर कृषि उत्पादों की ख़रीद की सहमति के बावजूद आज तक न्यूनतम समर्थन मूल्य क़ानून नहीं बन सका। न ही आज तक किसी सरकार ने रंगनाथन समिति और स्वामीनाथन समिति की सिफ़ारिशें लागू कीं। यहाँ तक कि सन् 2011 में वर्किंग रूल्स ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स के अध्यक्ष रहते हुए नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार को रिपोर्ट ऑफ वर्किंग ग्रुप कंज्यूमर अफेयर्स के नाम से एक रिपोर्ट सौंपकर एमएसपी को वैधानिक दर्जा देने की माँग की थी। तब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। लेकिन अब जब मोदी ख़ुद प्रधानमंत्री हैं, तो वह इस पर क़ानून बनाने से कतराते रहे हैं, और अब किसानों द्वारा दबाव बनाये जाने पर एमएसपी पर क़ानून बनाने के लिए उनकी सरकार ने समिति बनाने पर सहमति दी है। जबकि सरकार दूसरे क़ानूनों की तरह बिना चर्चा के चुपचाप यह क़ानून बना सकती है।