‘रूह जो महसूस करती है वही बयान करती है’

मैंने सुना है कि आपने तमाम पंजाबी फिल्मों में भी काम किया है. उसका अनुभव कैसा रहा…
जी हां, मैंने पंजाबी की 47 फिल्मों में काम किया है. ये लोगों की चाहत थी. ये मेरी मां की दुआ थी. वो कहती थी कि तू मैंनूं बड़ा सोंणां लगदा है आरिफ तो तैनूं फिल्मा नुं कोई नहीं लैंदा. मां की दुआ मुझे नसीब हुई और मैंने इतनी सारी पंजाबी फिल्मों में काम किया.

एक और गजब की चीज आपके बारे में हमने सुना है कि आपने नॉर्थ कोरिया के सैन्य शासकों के सामने भी परफॉर्मेंस दी है. वह कैसे हुआ?
जी हां, वहां पर काफी मुल्क गए हुए थे. वहां भारत से भी मौसिकी के लोग गए हुए थे. तो मैं भी उन्हीं में से था.

तो क्या वहां पर आपकी भाषा और सूफी संगीत को समझने वाले लोग थे?
नहीं, वहां ऐसा तो नहीं था. कुछ भाषाएं होती हैं जिनकी तर्जुमानी तो नहीं हो सकती है, लेकिन वहां मौजूद लोगों को ये जरूर लगा कि मैं जो गा रहा हूं वह उनके दिलों को छूता है. मुझे वहां पर अवॉर्ड भी मिला.

जुगनी जो कि आपकी सबसे बड़ी पहचान बन गई है, उसके बारे में कुछ बताएं.
जुगनी जो है वह हमारे घराने का एक लफ्ज है जिसे हमारे वालिद साब ने सबसे पहले लिखा था. उससे पहले अगर आप कोशिश करें और ढूंढें तो इसका कोई रिकॉर्ड नहीं मिलेगा. कुछ लोगों ने जुबली के साथ जुगनी की पैरोडी करने की कोशिश की. यह स्वाभाविक है कि जब कोई चीज लोकप्रिय हो जाती है तो उससे कंपेयर करने की कोशिश की जाती हैं. कुछ लोगों ने कोशिश की कि यह उनके नाम हो जाए. कुछ चीजें होती हैं जो एक घराने से जन्म लेती हैं. लफ्ज एक घराने से जन्म लेता है. किसी न किसी ने तो पहली बार लफ्ज को जन्म दिया होगा तो मेरे वालिद साब ने सबसे पहले जुगनी लफ्ज नाम दिया रूह को. जो रूह महसूस करती है वही बयान करती है. इसके बाद यह लफ्ज पॉपुलर हो गया. इसके बाद तो दुनिया भर के मुख्तलिफ लोक फनकारों ने इसे गाया. अलग -अलग लोगों ने इसमें अपना-अपना कलाम डालकर इसमें मिक्स कर दिया. इस तरह से यह एक फोक बन गया. तो इसने जन्म हमारे घर से लिया और फिर पूरी दुनिया में फैल गया. लेकिन हमने कभी इस पर दावा नहीं किया कि सिर्फ हम ही गाएंगे. सब गा रहे हैं.

एक निजी सवाल है. आपके बारे में मैंने सुना है कि आप बेहद रिजर्व रहते हैं. घंटों तक अकेले में बैठकर अपने में खोए रहते हैं, मेडिटेशन करते हैं. तनहाई में करते क्या हैं आप? यहां तक कि अपने शो के दौरान भी आप सीधे अपने कमरे से निकल कर स्टेज पर जाते हैं और फिर वापस कमरे में चले जाते हैं.
ऐसा जान-बूझकर नहीं होता है. ये लगन होती है. मुझे मेरी मौसिकी से लगन हो गई है, मेरे वालिद साब की यादों से लगन हो गई है, मुझे अपने कलामों से मुहब्बत है, दुनिया से है. और यह नहीं कि मैं अकेला रहना पसंद करता हूं. हां, तनहाई में मैं थोड़ा चिंतन करता हूं कि ज्यादा से ज्यादा अच्छी चीजें लिखूं ताकि मेरा जेहन नई-नई राहें तलाश सके. ये एक किस्म की जुस्तजू होती है. हर कलाकार के अंदर थोड़ी-सी दीवानगी होती है. वह अपने फन का दीवाना
होता है. सूफी का कोई ठिकाना नहीं होता. वह तो अपनी ही दुनिया में दीवाना होता है.

पाकिस्तान के अलावा हिंदुस्तान में आपके प्रंशसकों की बड़ी तादाद है. उन्हें कोई संदेश देना चाहेंगे?
मैं सिर्फ यही कहूंगा कि अल्ला आपको खुश रखे. जहां भी रहें अमन और मुहब्बत से रहें. जब हालात बिगड़ते हैं तब दिलों में कड़वाहट भी बढ़ती है. हम तो छोटे-मोटे फनकार हैं. यहां ऐसे बड़े-बड़े लोग मौजूद हैं जो दुनिया में आई बड़ी से बड़ी मुसीबत का इलाज खोजने में लगे हैं. हम दुनिया की बेहतरी के लिए सोच सकें, नई राहें निकाल सकें, अपने दिमागों को खोल सकें, अमन और भाईचारे को फैला सकें और पॉजिटिव सोच को बढ़ा सकें ताकि आने वाली नस्लों के लिए यह दुनिया और खूबसूरत हो सके और बेहतर हो सके. यही मेरा फलसफा है, यही मेरी चाहत है.

आपका एक ताजातरीन कलाम हम सब सुनना चाहेंगे.
आपने जो मुझसे पूछा था कि मैं तनहाई में क्या करता हूं तो मैं यही करता रहता हूं. अपनी दुनिया में रहता हूं तो कुछ नई सोचें मिल जाती हैं. एक वक्त में मैंने सफर बहुत किया है. ट्रकों-बसों में बैठकर मैंने लाखों किलोमीटर की यात्राएं की हैं. फिर अब अपनी दुनिया में कैद हो गया हूं. मैंने सूफी शायरों को पढ़ना शुरू किया. एक मेरा नया शेर है जो आपकी खिदमत में पेश करता हूं.

मिट्टी मिट्टी दुनिया सारी, मिट्टी दा संसार
मिट्टी मिट्टी दुनिया सारी, मिट्टी दा संसार
मिट्टी दे सन बादशाह ते मिट्टी दे दरबार

इंसान अपनी ‘मैं’ में रहता है. जो लोग बड़े-बड़े महलों में हजारों पहरेदारों और नौकरों की सुरक्षा में रहते थे, सोने के बिस्तरों पर सोते थे आज वे कहां हैं. कौन उन्हें पूछता है. तो कुछ भी नहीं है दुनिया. जो कभी दरबार थे वे भी मिट्टी थे. सिर्फ आपके अच्छे अल्फाज ही जिंदा रह जाएंगे. इंसान तो मिट्टी बन जाएंगे. आज सूफी दरवेश दुनिया छोड़कर जा चुके हैं, वे मिट्टी के ढेर में तब्दील हो चुके हैं लेकिन उनके कलाम आज भी जिंदा हैं. सिर्फ अल्फाज जिंदा रह जाते हैं.

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  1. ‘मिट्टी मिट्टी दुनिया सारी, मिट्टी दा संसार’ सचमुच एक बेहतरीन साक्षात्कार को शब्दों के मोती में पिरोकर आपने अद्भुत लेख तैयार किया है जोकि वाकई काबिलेतारीफ है। वैसे सूफी गायक आरिफ लोहार के शब्द इस बातचीत में तिरोहित हैं कि उनके यह शब्द जैसे ‘रूह जो महसूस करती है वही बयान करती है’लाजबाव है।

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