राजीव गांधी हत्याकांड और नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश में समानता का मुद्दा

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अलगाव?

राजीव गांधी की हत्या का मामला एक ऐसे संचार से जुड़ा था जो गंभीर तौर पर कोडेड था। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साजिश की जो बात है उसमें कतई कोई गोपनीयता नहीं है। विल्सन के कंप्यूटर से जो माओवादी पत्र मिलने की बात है उसमें घटना का स्पष्ट उल्लेख है और राजनीतिक नेताओं के नाम हैं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी उल्लेख है। महाराष्ट्र पुलिस के डायरेक्टर जनरल सतीश माथुर ने बताया कि पत्र विश्वसनीय है।

आंध्रप्रदेश की खुफिया विभाग के एक उच्च स्तरीय आईपीएस अधिकारी जिनकी माओवादी पर विशेषज्ञता है उन्होंने भी यह कहा कि ‘माओवादी पत्र लिखते हैं लेकिन वे इतने लंबे चौड़े पत्र नहीं लिखते। एम-4 बंदूकों और चार लाख चक्र बुलेट खरीदने का ब्यौरा और प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश जैसी बातें भी विश्वसनीय नहीं लगती। उन्होंने कहा, ‘मैंने अपने पूरे जीवन में माओवादियों के पत्र देखे हैं लेकिन ऐसा पत्र पहली बार ही देखा।Ó  फारेंसिक महकमे के एक अधिकारी ने कहा, हमने पत्रों की कोई छानबीन नहीं की है। हमने सिर्फ हार्ड डिस्क और दूसरे डिवाइस की क्लोनिंग की है। हम यह भी नहीं जानते कि पत्र हाई डिस्क में था भी या नहीं।

सशस्त्र सीमा बल के पूर्व महानिदेशक एमवी कृष्णराव जो सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी भी रहे हैं, उनका कहना रहा कि तमाम सीपीआई (माओवादी) उन लोगोंं को नहीं बहाल करते जो सार्वजनिक तौर पर जाने जाते हैं। ये पांचों लोग और प्रकाश अंबेडकर जिनका उल्लेख इस पत्र में है वे सभी जनजीवन में जाने जाते है। माओवादी ऐसे लोगों की कभी अपने साथ नहीं जोड़ते जो कुछ मशहूर हों।

‘पार्टी या सेंट्रल कमेटी का सदस्य होने वाले के सामने यह दुविधा हमेशा रही है कि उसे कोई भी न पहचाना हो। जहां तक मेरी जानकारी है छह-सात साल से सेंट्रल कमेटी का कोई सदस्य कप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करता। यदि इस बीच उन्होंने फिर शुरू किया हो तो यह बात मेरी जानकारी में नहीं है। सेंट्रल कमेटी के सदस्य उस तरीके को भी नहीं अपनाते कि ई मेल के जरिए संदेश भेजें। वे सेंट्रल कमेटी के 2-3 विश्वसनीय लोगों के जरिए संदेश भेजते हैं। जिनका काम आम संदेश पहुंचाना होता है। ये संदेश भी एक या दो लाइन के ही होते हैं। एक साधारण आदमी तो उन्हें समझ भी नहीं सकता। क्योंकि शब्दों में ही होते हैं ‘छिपे होते है अर्थ भीÓ, राव ने बताया।

इन तमाम टिप्पणियों और अनुभवों से लगता है कि असल मामला कुछ और है जिनकी छानबीन की जानी चाहिए।