रण अंतिम क्षण में

आईएनएलडी
राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी आईएनएलडी के सामने यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि अगर उसके दोनों नेता जेल से बाहर नहीं आते तो पार्टी दोनों चुनावों में कैसे जाएगी, हालांकि पार्टी की पिछले एक साल की गतिविधियों पर अगर नजर दौड़ाएं तो एक संभावना यह भी दिखती है कि पार्टी उनके दूसरे पुत्र अभय चौटाला और दोनों पोतों दिग्विजय और दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व में आगे बढ़ेगी. हालांकि अभय पर भी भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज हैं. दूसरी तरफ दिग्विजय और दुष्यंत की उम्र 24-25 साल है. ऐसे में भविष्य बेहद अनिश्चित है. संकट के इस दौर में पार्टी ने गठबंधन के जरिए एक सहारा ढूंढ़ने का प्रयास भी किया लेकिन यह किसी सिरे नहीं लग सका. अतीत में काफी समय तक उसका भाजपा के साथ गठबंधन रहा है. लेकिन आज की स्थिति यह है कि आईएनएलडी ने कई मौकों पर भाजपा से गठबंधन की अपनी इच्छा जताई लेकिन भाजपा ने उसे भाव नहीं दिया.

आईएनएलडी पिछले 10 सालों में लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीत पाई है. राज्य में आज भाजपा-हजकां का गठबंधन है. पार्टी खुद को हजकां की जगह देखना चाहती है लेकिन भाजपा इस पर चुप्पी साधे है. ग्रेवाल कहते हैं, ‘भाजपा के आईएनएलडी से गठबंधन न करने के पीछे पार्टी की भष्टाचार वाली छवि है. भाजपा पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बना रही है. ऐसे में वह ऐसी पार्टी के साथ गठबंधन से बच रही है जिसके शीर्ष नेता ही भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं.’ वैसे गठबंधन न होने की स्थिति में भी पार्टी के नेता दस की दसों सीटों पर प्रत्याशी खड़ा करने का खम ठोंक रहे है, लेकिन अनौपचारिक बातचीत में कई नेता इस बात को मानते हैं कि अगर गठबंधन नहीं हुआ तो इस बार भी लोकसभा में पार्टी का खाता शायद ही खुल पाए. हालांकि एक संभावना के द्वार हमेशा खुले हुए हैं. अगर पार्टीं लोकसभा में एक दो सीट जीतती है तो भाजपा विधानसभा चुनावों में उसके साथ गठबंधन के लिए मजबूर होगी. तक्षक कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा-आईएनएलडी के गठबंधन की पूरी संभावना है.’ लोकदल के नेता लगातार कह रहे हैं कि वे चाहते हैं कि मोदी प्रधानमंत्री बनें और वे इसके लिए भाजपा का समर्थन करेंगे. भाजपा इस प्रेम का तिरस्कार कब तक करेगी यह देखना दिलचस्प होगा.

विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी उत्साहित है. उसे लगता है कि भले ही उसके नेता जेल से बाहर आकर चुनाव न लड़ पाएं लेकिन कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का न सिर्फ उसे फायदा मिलेगा बल्कि उसके नेताओं के जेल में जाने से उपजी सहानुभूति भी वोटों में जरुर तब्दील होगी. पार्टी नेता दुष्यंत चौटाला कहते हैं, ‘जनता जानती है कि कांग्रेस ने जानबूझकर श्री ओमप्रकाश चौटाला और अजय चौटाला को फंसाया है. विधानसभा चुनाव में जनता कांग्रेस की इस करतूत का मुंहतोड़ जवाब देगी. मैं पूरे राज्य में घूम रहा हूं. हमें अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है.’

भाजपा-हजकां गठबंधन
हरियाणा में वर्तमान स्थिति यह है कि एक दल का राजनीतिक भविष्य काफी हद तक दूसरे पर निर्भर है. कुछ ऐसा ही हाल कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) का भी है. एक तरफ जहां आईएनएलडी भाजपा के साथ गठबंधन के लिए अपना पूरा जोर लगा रही है वही हजकां ऐसा कुछ भी होने से रोकने के लिए कमर कस कर तैयार है. लोकसभा की 10 सीटों में से भाजपा-हजकां के बीच 8-2 का बंटवारा हो चुका है. लेकिन हजकां की नजर लोकसभा से ज्यादा आगामी विधानसभा चुनाव पर टिकी हुई है. पार्टी को पूरी उम्मीद है कि कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर और आपसी गुटबाजी के कारण ढलान पर है और आईएनएलडी के नेता जेल में हैं तो ऐसे में उसकी लॉटरी निकल सकती है. पूरे खेल में भाजपा का भी उत्साह बढ़ा हुआ है. उसका आकलन है कि मोदी का जादू हरियाणा के वोटरों पर सिर चढ़कर जरुर बोलेगा. भाजपा नेताओं के मुताबिक पूरे देश में मोदी के पक्ष में लहर चल रही है और कांग्रेस के खिलाफ जबर्दस्त माहौल है. ऐसे में हरियाणा की अपने खाते की आठ लोकसभा सीटों में से वह 5-6 जीतने का ख्वाब संजोए हुए है. पार्टी के स्थानीय नेता रामकिशन यादव कहते हैं, ‘यह हमारा अतिआत्मविश्वास नहीं है. आप देखिएगा मोदी जी के नेतृत्व में हमारा गठबंधन दस की दसों सीटें जीतेगा.’

लेकिन क्या ऐसा होने की संभावना है? जानकारों का मानना है कि जिन आठ सीटों को जीतने का भाजपा ख्बाव देख रही है, वर्तमान में वे सारी कांग्रेस के पास है. यह सही है कि केंद्र से लेकर राज्य तक कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के कारण पार्टी फिलहाल बैकफुट पर है लेकिन उसने इससे निपटने की काट भी ढूंढने की कोशिश की है. पहला उपाय पार्टी ने किया है वर्तमान सांसदों को हटाकर नए चेहरों को टिकट देने का. हालांकि इस रणनीति की कामयाबी संदिग्ध ही है. भाजपा और हजकां के बीच गठबंधन से दोनों दलों को कोई खास फायदा होते राजनीतिक पंडित नहीं देखते. वे मानते हैं कि चूंकि दोनों दलों का समर्थक वर्ग एक ही है. अर्थात शहरी मतदाता जिसमें व्यापारी और मध्य वर्ग शामिल है. ऐसे में दोनों दल एक दूसरे को कोई फायदा नहीं पहुंचाएंगे. कुलदीप बिश्नोई के बारे में कहा जाता है कि उनका पूरा राजनीतिक प्रभाव हिसार तक सीमित है. ग्रेवाल कहते हैं, ‘कुलदीप राज्य स्तर के नेता का कद अभी तक हासिल नहीं कर पाए हैं. ऐसे में वे भाजपा और खुद का भला कितना कर पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी. हां, 2014 में मोदी अगर पीएम बनते हैं तो जरूर प्रदेश में भाजपा कुछ उथल-पुथल मचा सकती है.’ ग्रेवाल एक और संभावना का जिक्र करते हैं. अगर किसी तरह से भाजपा, आईएनएलडी और हजकां तीनों के बीच महागठबंधन हो जाता है तो फिर वे लोकसभा और विधानसभा, दोनों मोर्चों पर बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.

आम आदमी पार्टी
हरियाणा में इस समय चर्चा का सबसे बड़ा विषय अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव और आम आदमी पार्टी बने हुए हैं. आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी ने गुड़गांव से अपने वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव को न सिर्फ उम्मीदवार बनाया है बल्कि विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें बतौर मुख्यमंत्री भी प्रोजेक्ट कर रही है. जहां तक लोकसभा चुनावों का सवाल है तो आप गुड़गांव में राव इंद्रजीत को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में दिख रही है. इसके अलावा दिल्ली से सटे फरीदाबाद की सीट पर भी पार्टी के असर डालने से इंकार नहीं किया जा सकता. राज्य में आप के प्रभाव के बारे में बताते हुए राजनीतिक विश्लेषक बलवंत तक्षक कहते हैं, ‘हरियाणा में आप का असर शहरी इलाकों तक ही सीमित है. ग्रामीण इलाकों में पार्टी को लेकर चर्चा तो है लेकिन समर्थन की कोई सूरत दिखाई नहीं देती.’  यह उसी तरफ इशारा करता है जिस ओर कांग्रेस उम्मीद किए बैठी है. अगर शहरी क्षेत्र जिन्हें कि भाजपा-हजकां का बड़ा आधार माना जाता है, वहां पर आप सेंध लगाने में कामयाब होती है तो फायदा सिर्फ कांग्रेस को ही मिलेगा. हरियाणा की जातिगत राजनीति में पार्टी के लिए चुनौती पर मीनाक्षी शर्मा कहती हैं, ‘आसान तो बिलकुल नहीं है. यह जाट बहुलता वाला राज्य है. जाट मनोविज्ञान के ऊपर तो आप का कोई असर नहीं होगा. हां, उन युवाओं एवं शहरी क्षेत्रों के लोगों पर इसका असर हो सकता है जिनके लिए भ्रष्टाचार एक गंभीर मसला है और वे वर्तमान राजनीतिक दलों से ऊब चुके हैं.’

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर प्रेम कुमार के मुताबिक हरियाणा के सबसे बड़े हिस्से यानी ग्रामीण क्षेत्र मेंं आप शायद ही कोई असर छोड़ सके. ग्रामीण इलाकों में जाति की भूमिका सबसे बड़ी होती है. वहां आप के जातिविहीन राजनीतिक नारेबाजी को सुनने वाला कोई नहीं है. हालांकि आप इस वर्ग को खुद से जोड़ने का प्रयास कर रही है. इसके तहत पार्टी के लोग विभिन्न खाप नेताओं से लगातार बातचीत और समझ स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं. इसी रणनीति के तहत आप ने खाप जैसे संगठनों को सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरी करने वाला बताकर उसके पास आने की कोशिश की है.

हरियाणा के मानस में लोकसभा के नतीजों से ज्यादा उत्सुकता आप के विधानसभा परिणामों के प्रति है. दिल्ली के नतीजों को देखते हुए राजधानी से सटे हरियाणा की 13-14 विधानसभा सीटों पर आप के प्रभाव की पूरी संभावना है. अगर आप ये सीटें जीतती है तो हरियाणा की अगली राज्य सरकार में वह महत्वपूर्ण ताकत होगी. कहा जा रहा है कि अगला विधानसभा चुनाव परिणाम त्रिशंकु विधानसभा को जन्म दे सकता है. ऐसे में आप के सपने परवान चढ़ सकते हैं.

यानी हरियाणा में फिलहाल न तो किसी के पक्ष में लहर दिखती है और न ही किसी पार्टी की चुनावी सफलता की संभावना को पूरी तरह से खारिज ही किया जा सकता है. प्रोफेसर प्रेम कुमार के शब्दों में ‘किसी बड़ी लहर के अभाव में अब सारा दारोमदार चुनाव प्रबंधन और प्रत्याशियों की योग्यता पर निर्भर है.’

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