रणछोड़!

2007,- 2009 और 2012 में घटी इन घटनाओं की तुलना की जाए तो एक बात साफ तौर पर यह निकलती है कि तीनों ही मौकों पर मोदी गुजरात दंगों के सवाल पर असहज हुए थे. लेकिन अब जबकि इन दंगों को लेकर वे बहुत-से मामलों में क्लीन चिट पा चुके हैं, ऐसे में टीवी इंटरव्यू से बचने की और क्या वजहें हो सकती हैं. वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा इसे मोदी द्वारा हाल के समय में अपने भाषणों में की गई तथ्यात्मक गलतियों और विकास के गुजरात मॉडल की आलोचना से जोड़ते हैं. वे कहते हैं, ‘जिस तरह की भयंकर तथ्यात्मक गलतियां मोदी इन दिनों लगातार अपनी चुनावी रैलियों के दौरान कर रहे हैं, उन्हें देखते हुए मोदी को डर है कि टीवी इंटरव्यू अथवा जनता की भागीदारी वाले कार्यक्रमों में उनसे इन गलतियों को लेकर सवाल किए जा सकते हैं. इसके अलावा गुजरात के विकास मॉडल को लेकर जो तमाम तरह की मीडिया रिपोर्टें हालिया समय में सामने आई हैं उन पर भी मोदी की घिग्घी बंध सकती है.’ इससे सहमति जताते हुए ओम थानवी कहते हैं, ‘पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने गुजरात जाकर नरेंद्र मोदी से 16 सवालों का जवाब मांगा था जिसको लेकर न तो मोदी और न ही उनकी पार्टी कोई जवाब दे पाई है. ऐसे में समझा जा सकता है कि मीडिया को लेकर मोदी के मन में किस तरह का डर है क्योंकि इतना साफ है कि मीडिया के सवाल भी केजरीवाल के सवालों जितने कड़े हो सकते है.’

यह बात बहुत हद तक सही मालूम पड़ती है. मोदी के गुजरात मॉडल को लेकर उनसे सवाल पूछे जाने शुरू हो गए हैं. केजरीवाल के अलावा ममता बनर्जी भी उनके इस मॉडल पर हाल ही में उसी ‘कैंडिडेट्स 2014’ के मंच पर आकर सवाल कर चुकी हैं जिस मंच पर मोदी ने आने से इनकार कर दिया था.

हालांकि नरेंद्र मोदी के मीडिया से बचते रहने की घटनाओं को लेकर वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई एक दूसरा नजरिया भी सामने रखते हैं. वे कहते हैं, ‘भारत की चुनावी प्रक्रिया में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और मीडिया के बीच सवाल-जवाब की न तो कोई बाध्यता है और न ही यह उम्मीदवारों की काबिलियत का एक-मात्र घोषित पैमाना है. किसी नेता का मीडिया के सामने आकर अपनी बात कहना या न कहना पूरी तरह उसकी निजी इच्छा पर निर्भर करता है. इसके अलावा इन चुनावों में अपने वोट बैंक को लेकर जिस कदर नरेंद्र मोदी गदगद हैं उसे देखते हुए भी वे शायद यह मान बैठे हैं कि मीडिया के साथ सवाल-जवाब करने या न करने से उनकी छवि पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा.

लेकिन एकबारगी यदि यह मान भी लिया जाए कि मोदी अपने पक्ष में उमड़ रहे जनसमर्थन के दम पर मीडिया के सवालों से बेपरवाह हैं, तब भी यह सवाल तो उठता ही है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को अहम सवालों का सामना करना चाहिए या नहीं. इस पर किदवई खुद कहते हैं, ‘टीवी कैमरा फेस करने या न करने के स्वैच्छिक विकल्प के बावजूद यह बात भी उतनी ही तर्कसंगत है कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो चुके नेताओं को जनता के सीधे सवालों का जवाब देने की परंपरा शुरू करनी चाहिए. लेकिन यह भी कोई छुपा तथ्य नहीं है कि कुछ सवालों पर मोदी हमेशा से असहज रहते आए हैं, लिहाजा जब तक संभव हो वे मीडिया से सीधे संवाद से बचना ही चाहेंगे.’

इस सबके बीच एक तथ्य यह भी है कि इस दौरान नरेंद्र मोदी ने कुछ पूरे इंटरव्यू भी किए हैं. लेकिन इन इंटरव्यू को लेकर बहुत-से जानकारों का यह भी मानना है कि इनमें पूछे जाने वाले सवालों को लेकर फिक्सिंग की आशंका से इनकार नहीं किया जाना चाहिए. ओम थानवी कहते हैं, ‘भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट इस तरह के कामों में बेहद पारंगत है. और समय-समय पर यह पार्टी अपनी सहूलियत वाले पत्रकार साथियों के जरिए लाभ भी लेती रही है.’

उर्दू पत्रिका नई दुनिया के संपादक और पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी ने जुलाई, 2012 में नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया था. इस इंटरव्यू को लेकर हुए कुछ वाकयों से भी थानवी की बातों का मतलब समझा जा सकता है. एक समाचार वेबसाइट के साथ बातचीत करते हुए शाहिद सिद्दीकी का कहना था कि इंटरव्यू लिए जाने से पहले उनसे सवालों की सूची मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया. हालांकि सिद्दीक़ी के इनकार के बाद मोदी ने उन्हें इंटरव्यू दे दिया था, लेकिन उन्होंने इस पूरे इंटरव्यू की खुद भी वीडियो रिकॉर्डिंग करवाई थी. इस घटनाक्रम से इतना तो समझा ही जा सकता है कि मीडिया द्वारा पूछे जाने वाले सवालों को लेकर मोदी कितने आशंकित रहते हैं.

नरेंद्र मोदी की जीवनी ‘नरेंद्र मोदी: द मैन द टाइम्स’ लिखने वाले पत्रकार निलंजन मुखोपाध्याय ने भी इसकी भूमिका में लिखा है कि अपनी जीवनी लिखे जाने को लेकर नरेंद्र मोदी शुरुआती दौर में सहयोगात्मक मुद्रा में नहीं थे. उन्हें लगता था कि किताब में किए जाने वाले कुछ उल्लेख उनकी छवि को असहज कर सकते हैं. मुखोपाध्याय के मुताबिक हालांकि यह किताब मोदी की जीवनी है फिर भी वे गुजरात दंगों और अपनी पारिवारिक जिंदगी जैसे कठिन सवालों पर जवाब देने से बचते नजर आए हैं. गौरतलब है कि इस किताब में नरेंद्र मोदी की पत्नी जसोदा बेन का खूब जिक्र है. इसके अलावा मोदी द्वारा इस तथ्य को छिपाए जाने को लेकर भी कई जानकारियां इस किताब में हैं. जानकार मानते हैं कि इस तरह के कई दूसरे सवाल जो कि अभी तक पब्लिक डोमेन में नहीं हैं उनसे बचने के लिए भी मोदी मीडिया का सामना नहीं करना चाहते. ओम थानवी कहते हैं, ‘क्या मोदी चाहेंगे कि कोई पत्रकार सीधे इंटरव्यू में उनसे उनकी पत्नी के बारे में सवाल पूछे.’

हालांकि ऐसा नहीं है कि मीडिया से भागने, बचने वाली जमात में नरेंद्र मोदी एकमात्र राजनेता हैं. देश भर के लगभग सभी राजनीतिक दलों में ऐसे बहुत-से नेता हैं जो मीडिया के सीधे सवालों से हमेशा बचते रहे हैं. यह भी एक गौर करने वाला तथ्य है कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने 10 साल के कार्यकाल के दौरान तीन-चार बार ही मीडिया से रूबरू हुए हैं. इसके अलावा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी पिछले दस साल के दौरान हाल ही में अपना पहला टीवी इंटरव्यू दिया. लेकिन नरेंद्र मोदी का मामला इस लिए इन सबसे अलग है कि देश भर के तमाम चुनावी सर्वेक्षणों में उन्हें प्रधानमंत्री पद पर जनता की सबसे बड़ी पसंद के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. ऐसे में देश के मूलभूत मुद्दों को लेकर उनकी राय और उस पर सवाल-जवाब जैसी चीज बहुत जरूरी और अहम हो जाती है. तब भी वे इंटरव्यू से भागने वाली जमात के प्रतिनिधि बने हुए हैं. राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं, ‘कोई भी नेता अगर अंदर से साफ हो तो उसे मीडिया के सवालों का सामना करने में किसी भी तरह की दिक्कत नहीं होनी चाहिए. लेकिन चूंकि मोदी खुद अंदर से साफ नहीं हैं इसलिए चोर की दाढ़ी में तिनके वाली कहावत के जरिए उनकी स्थिति को समझा जाना चाहिए.’

कुल मिलाकर देखा जाए तो मीडिया के सवालों से बेपरवाह नरेंद्र मोदी का चुनावी अभियान लगातार जारी है. चुनाव सर्वेक्षणों में बाजी मार चुके मोदी को सट्टा बाजार में भी नंबर वन बताया जा रहा है. लेकिन इस सबके बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि क्या मोदी कभी उन बहुत सारे सवालों का सामना करने को तैयार होंगे जिनका जवाब उनसे हर कीमत पर पूछे जाने की जरूरत है. मसलन सिकंदर के बिहार आने का वाकया और शहीद भगत सिंह को अंडमान जेल में डाले जाने का जिक्र उन्होंने किस किताब में पढ़ा था?

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