यूपी वाया गुजरात

पार्टी के ही एक दूसरे नेता बताते हैं, ‘मिस्त्री को संगठनात्मक ढांचे की तैयारी का जादूगर माना जाता है. इसका उदाहरण कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हाल ही में देखने को मिला है. कर्नाटक कांग्रेस की स्थिति भी उत्तर प्रदेश जैसी ही थी. वहां के संगठन को मजबूत करने के साथ ही प्रत्याशियों के चयन में मिस्त्री ने जमीनी स्तर पर काम किया, जिसका परिणाम रहा कि कांग्रेस को वहां सफलता मिली.’  प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता वीरेन्द्र मदान कहते हैं, ’28 जून को प्रदेश प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री के लखनऊ आने के बाद सबसे पहले काम संगठनात्मक ढांचे पर होगा ताकि पार्टी लोकसभा चुनाव में अच्छे परिणाम दे सके.’

भाजपा की स्थिति भी कांग्रेस जैसी ही दिखती है. बसपा व सपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियां जहां प्रत्याशियों के टिकट बांटकर लोकसभा चुनाव के प्रचार में जुट गई हैं वहीं भाजपा में अभी संगठन स्तर पर ही काम चल रहा है. राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी में गुटबाजी पर कुछ विराम लगेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पार्टी आज भी खेमों में बंटी हुई है. हर गुट अपने-अपने लोगों को लोकसभा टिकट दिलवाने के लिए आतुर है. 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के खाते में 80 में से मात्र 10 सीटें आई थीं. इस बार मोदी फैक्टर के चलते जब सुगबुगाहट बढ़ी तो पार्टी से टिकट के दावेदारों की संख्या भी अचानक बढ़ गई है. पार्टी के एक एमएलसी बताते हैं, ‘टिकट के दावेदारों में मौजूदा सांसदों के अतिरिक्त वे विधायक भी हैं जो 2012 का विधानसभा चुनाव जीते हैं. इसके अतिरिक्त टिकट चाहने वालों की फेहरिस्त में कई पूर्व विधायकों व सांसदों के नाम भी शामिल हैं. ऐसे में सबको टिकट देकर खुश करना संभव नहीं है.’ सूत्रों की मानें तो पार्टी को डर है कि टिकट बंटवारे के बाद कहीं गुटबाजी खुल कर सामने न आ जाए जिसका खामियाजा चुनाव में पार्टी को उठाना पड़े. इसे ही ध्यान में रखते हुए प्रदेश के किसी बड़े चेहरे को चुनाव प्रभारी न बना कर गुजरात के अमित शाह को यह जिम्मा सौंपा गया है. मकसद यह है कि स्थानीय नेताओं के इर्द-गिर्द होने वाली गणेश परिक्रमा पर विराम लगाया जा सके.

जानकारों की मानें तो इस सबके अलावा पिछले कुछ समय से मोदी फैक्टर के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भी शाह को प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है. पार्टी सूत्रों के अनुसार 80 लोकसभा वाले उत्तर प्रदेश से भाजपा को काफी उम्मीद दिख रही है इसलिए आक्रामक तेवरों वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मस्थली चुनते हुए लखनऊ, वाराणसी या किसी अन्य सीट से चुनाव लड़ने का एलान कर सकते हैं. ऐसे में मोदी के खास सिपहसालार शाह जहां शहरी तबके को गुजरात के विकास का एजेंडा बता कर प्रभावित करने का प्रयास करेंगे वहीं पर्दे के पीछे से हिंदुत्व की हवा को तेज करके एक खास वर्ग को पार्टी से जोड़े रखने के फॉर्मूले को बरकरार रखेंगे.

उधर, पार्टी का एक गुट मोदी व शाह के फॉर्मूले में कम यकीन रखता है. उसका तर्क है कि विधानसभा चुनाव में भी फायर ब्रांड उमा भारती को प्रदेश की कमान सौंपी गई थी, लेकिन चुनाव के बाद जो नतीजे आए वे बदतर थे. ऐसे में पार्टी जब तक गुटों में बंट कर चुनाव लड़ेगी तब तक परिणाम 2012 के विधानसभा चुनाव वाले ही निकलेंगे. इस वर्ग का मानना है कि मोदी या शाह कोई जादूगर नहीं हैं जिनसे अचानक किसी चमत्कार की उम्मीद की जा सके. शाह के प्रदेश प्रभारी बनाए जाने पर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी बाहरी व्यक्ति को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया गया है. पिछले 15 सालों से ऐसा होता आ रहा है. जिस तरह यूपी के दूसरे नेताओं को बाहरी राज्यों का प्रभारी बनाया गया है उसी तरह शाह को उत्तर प्रदेश का.’

दोनों प्रभारियों का राज्य एक है लेकिन कार्यशैली अलग. अमित शाह को अपने आक्रामक तेवरों के लिए जाना जाता है तो मधुसूदन मिस्त्री को अपने शांत स्वभाव के लिए. ऐसे में देखना यह है कि लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जनता पर किस गुजराती का जादू चलेगा.

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