मोदी के बाद, गुजरात…

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वजूभाई वाला
संभावितों की लिस्ट में गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष 75 वर्षीय वजूभाई वाला का नाम भी है. गुजरात विधानसभा में अभी तक सबसे अधिक बार बजट पेश करने का रिकॉर्ड (14 बार) बनाने वाले पूर्व वित्त मंत्री वजूभाई को 2012 में बनी भाजपा सरकार में वित्त मंत्री की जगह विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया. जब 2001 में मोदी गुजरात वापस आए और यहां आकर उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए सीट खोजनी शुरू की तो वजूभाई ही वह विधायक थे जिन्होंने अपनी राजकोट विधानसभा सीट मोदी के लिए छोड़ी. दूसरे शब्दों में कहें तो वे भी लंबे समय से मोदी के वफादार रहे हैं. वजूभाई के एक करीबी नेता कहते हैं, ‘वजूभाई का मोदी भाई बहुत सम्मान करते हैं. वे उनके विश्वासपात्रों की सूची में हैं. यहां सबसे वरिष्ठ भी हैं. ऐसे में उनकी संभावना तो बनती ही है ’ प्रदेश के सौराष्ट्र क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखने वाले वजूभाई की सीएम बनने की संभावना पर चर्चा करते हुए ब्रजेश कहते हैं, ‘ वजूभाई के पक्ष में बड़ी बात यह है कि उनकी स्वीकार्यता सबसे अधिक है. वे सबसे सीनियर हैं. सबसे बड़ी बात यह कि वे बहुत महत्वाकांक्षी नहीं हैं. ऐसे में वे मोदी के लिए फिट बैठते हैं.’

हालाकि 70 पार कर चुके वजूभाई की उम्र उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा दिखाई देती है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘ उम्र एक फैक्टर तो है ही तभी तो पार्टी ने उन्हें मंत्री की जगह विधानसभा अध्यक्ष बनाया है. ’

बदले समीकरण कभी पुरुषोत्तम रूपाला भी मोदी के करीबी माने जाते थे
बदले समीकरण कभी पुरुषोत्तम रूपाला भी मोदी के करीबी माने जाते थे

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष पुरुषोत्तम रूपाला का नाम भी हवा में तैर रहा है. हालांकि एक वर्ग उनकी संभावना को खारिज करता है. देवेंद्र कहते हैं, ‘ भले ही सौराष्ट्र क्षेत्र के कुछ पटेलों के बीच उनकी पकड़ है  लेकिन रूपाला की कोई संभावना नहीं है. बहुत पहले ही ये महाशय मोदी की गुड बुक्स से बाहर हो चुके हैं.’

हालांकि अंत समय में इन नामों के अलावा किसी और नाम के पहले मुख्यमंत्री जुड़ जाने की भी संभावना से लोग इंकार नहीं करते. ब्रजेश कहते हैं, ‘मोदी का इतिहास लोगों को चौंकाने से भरा हुआ है. ऐसे में अंत समय में कोई नया व्यक्ति सीन में आता है तो उस पर हैरानी नहीं होनी चाहिए. ’

लेकिन क्या गुजरात के ये नेता सीएम की कुर्सी पर बैठने को लेकर कोई सार्वजनिक तैयारी करते हुए दिखाई दे रहे हैं ? देवेंद्र कहते हैं, ‘किसी नेता में ये हिम्मत नहीं है कि वह सरेआम सीएम बनने की अपनी इच्छा को सार्वजनिक करे. जिसने भी किया उसका करियर तो वहीं खत्म हो जाएगा है. यही कारण है कि पर्दे के पीछे ही प्लानिंग चल रही है.’

मुख्यमंत्री पद के इन दावेदारों से लेकर प्रदेश भाजपा के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को पता है कि होगा वही जो मोदी चाहेंगे. देवेंद्र कहते हैं, ‘गुजरात के मामले में वही कहावत फिट बैठती है कि न खाता न बही जो मोदी कहें वही सही. मोदी जिसे चाहेंगे सीएम के पद पर वही बैठेगा और इस निर्णय को सभी को खुशी-खुशी मानना होगा.’

कुछ लोग यह भी दावा करते हैं कि मोदी के दिल्ली जाने की स्थिति में भी गुजरात भाजपा या प्रदेश सरकार में कोई बदलाव नहीं आने वाला. गुजरात में भाजपा और सरकार वैसे ही चलेगी जैसा मोदी चलाते आए हैं. जानकार बताते हैं कि दिल्ली जाने के बाद भी मोदी ही गुजरात का रिमोट कंट्रोल होंगे.  गुजरात में यह चर्चा भी बेहद गर्म है कि शायद मोदी तब तक किसी और को गुजरात का मुखिया नहीं बनने देंगे जब तक वे प्रधानमंत्री नहीं बन जाते या फिर केंद्र में किसी और बड़े पद पर काबिज नहीं हो जाते. अपनी व्यवस्था होने के बाद ही वे किसी और के बारे में सोचेंगे.

गुजरात भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष आईके जडेजा नेतृत्व के प्रश्न पर कहते हैं, ‘अभी तो यह हमारे यहां चर्चा का प्रश्न भी नहीं है. समय आएगा तो विधायकों और शीर्ष नेतृत्व से चर्चा करके फैसला लिया जाएगा.’

लेकिन क्या मोदी के चुनाव प्रचार में व्यस्त होने और पार्टी की तरफ से पीएम पद का दावेदार बन जाने के बाद क्या उन्हें किसी और को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी नहीं सौंप देनी चाहिए ? जडेजा कहते हैं, ‘इसकी जरूरत नहीं है. प्रदेश के मुखिया की भूमिका मोदी भाई बखूबी निभा रहे हैं. वे भले ही चुनाव प्रचार के लिए देश में कहीं भी हों लेकिन रात को वे वापस गुजरात चले आते हैं. यहां आकर राज्य सरकार का काम निपटाते हैं. ’

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