मोदी के बहाने भारत पर निशाने

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विश्वमंच पर नया हैवीवेट बॉक्सर
इसी जीत को एक दूसरे दृष्टिकोण से देखते हुए बर्लिन के दैनिक ‘देयर टागेसश्पीगल’ का मत था, ‘मोदी के रूप में… एक नया हैवीवेट (बॉक्सर) विश्वमंच पर अवतरित हो रहा है. अभी कुछ ही समय पहले तक वे अछूत थे, तिरस्कृत थे. अमेरिका सहित पश्चिमी देश उन्हें अपने यहां आने तक नहीं दे रहे थे… लेकिन लोगों ने उन्हें इसलिए नहीं चुना कि लोग भारत में हिंदू-तानाशाही चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि मोदी अर्थव्यवस्था में तेजी लाएं. दस साल पहले तक भारत और चीन का नाम एक ही सांस में लिया जाता था… लेकिन, कांग्रेस सरकार ने मौका गंवा दिया… (सोनिया) गांधी की पार्टी को अब उसी का बिल मिला है.’

ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी की जन्मभूमि इटली के मीडिया ने भारत में सत्तापलट को विशेष गंभीरता से नहीं लिया. अधिकतर ने समाचार एजेंसियों से मिली खबरों से ही काम चला लिया. प्रमुख दैनिक ‘ला रेपुब्लीका’ ने 17 मई को नई दिल्ली स्थित संवाददाता की रिपोर्ट छापी. इसमें उसने अपने आप को जनता के मूड, नई दिल्ली पहुंचने पर नरेंद्र मोदी के जोशीले स्वागत और भारत के प्रमुख अंग्रेजी दैनिकों के शीर्षकों तक ही सीमित रखा. सोनिया गांधी का नाम केवल एक बार इन शब्दों के साथ आता है कि चुनाव-परिणाम के ‘दूसरे दिन भारतीय प्रेस मोदी की शानदार विजय के लिए विशेषणों की झड़ी लगाने और सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी की पराजय रेखांकित करने में कोई कंजूसी नहीं दिखा रही है.’

टेलीग्राफ का मानना है कि मोदी अपनी विदेशनीति में ‘हिंदुत्व’ और ‘स्वदेशी’ का सिद्धांत अपनाते हुए विदेशी निवेश के प्रति अनुदार रुख अपना सकते हैं 

‘यह एक ऐतिहासिक क्षण है’
फ्रांस में व्यापक बिक्री वाले ‘ले फिगारो’ ने 16 मई के अपने ऑनलाइन संस्करण में चुनाव-परिणाम का सकारात्मक विश्लेषण किया. शीर्षक था ‘भारत ने राष्ट्रवादी हिंदू को चुना.’ फिगारो के मत में ‘यह एक ऐतिहासिक क्षण है. भारत प्रबुद्ध है कि वह अपने इतिहास का एक नया पृष्ठ लिख रहा है. 30 सालों में पहली बार मतदाताओं ने किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया है. राष्ट्रवादी दक्षिणपंथ इससे पहले कभी इस ऊंचाई तक पहुंच नहीं पाया था… सुधारों को पंगु बनाने वाले कोई ढुलमुल गठबंधन अब नहीं बनेंगे.’ फिगारो  इस बदलाव की जड़ दस करोड़ नए युवा मतदाताओं, जाति-धर्म को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की उनकी उत्कंठाओं और गुजरात की सड़कों पर कभी चाय पिला चुके नरेंद्र मोदी के दृढ़संकल्पी व्यक्तित्व में देखता है. फिगारो का कहना था ‘इस देश (भारत) में जहां कांग्रेस हमेशा धर्मनिरपेक्षता की माला जपती रही है, पर धार्मिक अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने के लिए उन्हें ललचाती-फुसलाती रही है, यह एक क्रांति है.’

स्पेन के प्रमुख दैनिक ‘एल पाइस’ ने भी चुनवा-परिणाम का विश्लेषण करते हुए लिखा कि हिंदू राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक विजय  ‘कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार की ऐतिहासिक हार भी है.’ लेकिन, यदि व्यक्तिगत हार-जीत से हट कर देखा जाए तो ‘यह उन पार्टियों की तुलना में आशा और विकास की जीत है, जो हौवा खड़ा करने में लगी थीं कि मोदी आए तो धार्मिक टकराव और बढ़ेंगे.’

‘भारत में विपक्ष को मिला पूर्ण बहुमत’ शीर्षक से नीदरलैंड के प्रमुख दैनिक ‘अल्खमेन दागब्लाद’ ने अपने आप को चुनाव परिणाम के मुख्य आंकड़े देने और यह कहने तक ही सीमित रखा कि भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी और व्यापक हैं कि मोदी तो क्या, कोई भी नेता भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं कर सकता.

यह ‘हिंदू धर्म’ कहां से टपक पड़ा?
यूरोपीय ऑनलाइन फोरमों और अखबारों के नाम पाठकों के पत्रों में लोकसभा चुनाव की जो चर्चा रही, उसमें ऐसी प्रतिक्रियाएं कम नहीं थीं जिनमें शिकायत की गई थी कि छह सप्ताहों से इतने बड़े चुनाव चल रहे थे, और हमें अब बताया जा रहा है ! यह भी कहा गया कि पश्चिमी मीडिया चीन या अमेरिका की हर बुराई में भी अच्छाई देखता है, जबकि भारत की हर अच्छाई में भी बुराई ही ढूंढता है. एक पाठक की टिप्पणी थी, ‘हमारा मीडिया तो हमेशा यही कहता रहा है कि इस दुनिया में केवल तीन ही ‘विश्व धर्म’ हैं- ईसाइयत, इस्लाम और यहूदी. यह ‘हिंदू धर्म’ कब और कहां से टपक पड़ा? कहीं मोदी के पार्टी वाले हिंदू ही पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया और अब नाइजीरिया में भी मार-काट तो नहीं कर रहे?’

एक दूसरे पाठक ने लिखा, ‘हमारे यहां भी कुछ लाख मुसलमान हैं. हमारी सरकारें भी उन्हें वास्तविक या संभावित आतंकवादी मानकर उन पर कड़ी नजर रखती हैं. धर-पकड़ करती व रोक-टोक लगाती हैं. हमारे सैनिक उन्हें मारने अफगानिस्तान या अफ्रीका तक जाते हैं. फिर, भारत को लेकर इतना शोर क्यों? जर्मनी में भी तो अपने नाम में क्रिश्चन (इसाई) शब्द जोड़ने और इसाई धार्मिक झुकाव रखने वाली दो दक्षिणपंथी पार्टियां लगभग हमेशा से शासन में रही हैं, आज भी हैं. लेकिन उन्हें तो कोई ‘इसाई राष्ट्रवादी’ नहीं कहता! मीडिया भारत पर जो आरोप लगाता है- जातीय या धार्मिक भेदभाव, गरीबी- अमीरी, अर्थिक ठहराव या भ्रष्टाचार के- वे सब हमारे यहां भी तो मौजूद हैं. नहीं है, तो चाय बेचने वाला कोई लड़का, जो किसी यूरोपीय देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बन पाया हो. पश्चिम के सीने पर सांप लोटने का कहीं यही तो कारण नहीं है?’

विडंबना तो यह है कि भारत के संसदीय चुनावों में भाजपा की विजय से विचलित यूरोप के जिन देशों में भारत के कथित हिंदू राष्ट्रवादी झुकाव की सबसे मुखर निंदा-आलोचना हो रही है, 25 मई को समाप्त हुए यूरोपीय संसद के चुनावों में उन्हीं देशों में घोर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों को ही भारी सफलता भी मिली है.  फ्रांस की नस्लवादी और इस्लाम-विरोधी ‘फ्रों नश्योनाल’ (राष्ट्रीय मोर्चा) तो देश की सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है, जबकि पेरिस में समाजवादियों की सरकार है. ब्रिटेन, इटली, स्पेन, डेनमार्क, जर्मनी इत्यादि में भी विदेशी अप्रवासियों और इस्लाम-विरोधी पार्टियों को मिले समर्थन में उल्लेखनीय से लेकर भारी बढ़ोतरी हुई है. तब भी, इन देशों का मीडिया यही कहता फिरेगा कि यह सब हमारे इसाई धर्म से प्रेरित कोई राष्ट्रवादी उभार नहीं, राष्ट्रीय या संघीय स्तर की आर्थिक-सामाजिक कठिनाइयों को अभिव्यक्त करता एक क्षणिक उबाल भर है, जो कल नहीं रहेगा, क्योंकि सच्चा लोकतंत्र तो हम ही हैं.’

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