मोदी का सवाल और उत्तर प्रदेश

हालांकि सब ऐसा नहीं मानते. पार्टी के वरिष्ठ नेता लोटन राम निषाद जो खुद अतिपिछड़े वर्ग से आते हैं, कहते हैं, ‘ पिछड़े वर्ग के तहत जो 17 जातियां आती हैं वे आज तक सपा और बसपा के राजनीतिक खेल का मोहरा बनती रही हैं. इन्होंने दोनों पार्टियों को परख लिया है और इसलिए इन वर्गों के लोग अब भाजपा को भारी समर्थन देंगे.’

हालांकि प्रदेश के एक राजनीतिक विश्लेषक ऐसी उम्मीद को अतिउत्साह बताते हुए कुछ आंकड़ों  का हवाला देते हुए कहते हैं, ‘ 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट  प्रतिशत महज 15 फीसदी था. यह अचानक 35 फीसदी नहीं बढ़ सकता. यही बात सीटों पर भी लागू होती है. इस समय भाजपा के पास दस सीटें हैं तो ये अधिकतम 20 तक पहुंच सकती हैं लेकिन इनमें तीन गुना बढ़ोतरी मुमकिन नहीं है.’

बढ़चढ़कर किए जा रहे भाजपा के तमाम दावों के साथ ही इस समय पार्टी नेताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल फिर वही है कि क्या मोदी का व्यक्तित्व ऐसा है जिससे एक बार फिर पार्टी के पक्ष में राम मंदिर आंदोलन के समय जैसी लहर चल जाए. इस सवाल के सकारात्मक जवाब में सबसे बड़ी बाधा राज्य में पिछले सालों का भाजपा का प्रदर्शन है. इससे ये संकेत भी मिलते हैं कि इस साल के लोकसभा चुनावों में पार्टी कहां पहुंच सकती है. 2009 के आम चुनाव में भाजपा को 10 सीटें मिली थीं, सात सीटों पर वह दूसरे, 22 पर तीसरे और 16 लोकसभा सीटों पर चौथे स्थान पर रही. 25 सीटों पर उसने अपना कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था. उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से सात ऐसी हैं जिन पर भाजपा आज तक नहीं जीती. 10 पर वह एक बार ही जीती है जबकि 23 सीटों पर उसे दो बार जीत मिली है. इसके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता चाहे जो दावा करें लेकिन लोकसभा टिकट के लिए पार्टी में अब भी गुटबाजी और मारामारी दिख रही है.

प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र की ही मिसाल लें. खुद को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी वरिष्ठ मानने वाले मिश्र इस समय विधायक हैं. चर्चा है कि वे लोकसभा चुनाव लड़ना चाह रहे हैं ताकि एनडीए सरकार बने तो अपनी वरिष्ठता की वजह से वे केंद्रीय मंत्री बन सकें. अभी भाजपा ने औपचारिक रूप से लोकसभा उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया शुरू नहीं की है, लेकिन मिश्र पहले ही कानपुर से खुद को पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं. वे इस सीट को अपने लिए सबसे उपयुक्त इसलिए मानकर चल रहे हैं कि यहां एक बड़ा ब्राह्मण मतदाता वर्ग है. लेकिन उनकी दावेदारी के खिलाफ कानपुर जिले से भाजपा के विधायक- सत्यदेव पचौरी और सतीश महाना भी खुलकर आ गए हैं. वे भी कानपुर से चुनाव लड़ना चाहते हैं और कई बार मिश्र की आलोचना कर चुके हैं. दूसरी तरफ, प्रदेश में पार्टी के पदाधिकारियों और पार्टी अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी की ठनी रहती है. पदाधिकारी यदि भाजपा के राष्ट्रीय सचिव विनोद पांडे और विधान परिषद के सदस्य महेंद्र सिंह को किसी कार्यक्रम में आमंत्रित करते हैं तो वे तुरंत बाजपेयी के निशाने पर आ जाते हैं. बाजपेयी भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के करीबी हैं और पांडे व सिंह को राजनाथ सिंह का खास माना जाता है. यही बात भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के मामले में भी है.

पार्टी के भीतर इन हालात पर लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘ पार्टी के सामने जो चुनौतियां हैं हमें उनका अहसास है. हो सकता है हमारा वोट प्रतिशत अभूतपूर्व तरीके से न बढ़े, लेकिन इसके बाद भी हमें कोशिश करनी होगी कि हम कम से कम 1999 के लोकसभा चुनावों में मिले वोटों (36.49) के करीब पहुंच सकें. पिछले एक दशक में मतदाताओं ने देख लिया है कि सपा और बसपा को वोट देने की वजह से ही कांग्रेस को मदद मिली और वह केंद्र में सरकार बना पाई. हम जानते हैं कि हमें इन दोनों पार्टियों की जातिवादी राजनीति से टकराना है लेकिन हम इसका मुकाबला मतदाताओं से यह अपील करके करेंगे कि वे भारत के अच्छे भविष्य के लिए वोट दें.’

1 COMMENT

  1. ATI ATM-MUGDHTA KE TAHAT HI SAHI, LEKIN JANTA KE AADESH KE PAHLE HI BHAJPA KA MODI KO AGLA PRADHAN MANTRI SAMBODHIT KARNA KUCH THIK NAHIN LAGTA. AISA LAGTA HAI JAISE TANTR MEN KABIJ HONE KI LALAK KE CHALTE LOK KE MAHATV KO NAKARA JA RAHA HAI.

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