मैं हर जगह था वैसा ही

मैं बम्बई में था
तलवारों और लाठियों से बचता-बचाता भागता-चीखता
जानवरों की तरह पिटा और उन्हीं की तरह ट्रेन के डब्बों में लदा-फदा
सन साठ में मद्रासी था, नब्बे में मुसलमान
और उसके बाद से बिहारी हुआ

मैं कश्मीर में था
कोड़ों के निशान लिए अपनी पीठ पर
बेघर, बेआसरा, मज़बूर, मज़लूम
सन तीस में मुसलमान था
नब्बे में हिन्दू हुआ

मैं दिल्ली में था
भालों से गुदा, आग में भुना, अपने ही लहू से धोता हुआ अपना चेहरा
सैंतालीस में मुसलमान था
चौरासी में सिख हुआ

1 COMMENT

  1. ज़बरदस्त।
    में ऐसे क्यों नहीं सोच पाई?देख सकी इस सत्यता को?
    क्यों आँखें मूंद ली मैंने।
    बधाई अशोक जी।

Leave a Reply to सलीमा आरिफ़ Cancel reply

Please enter your comment!
Please enter your name here