‘मेरा सरोकार स्त्री को लेकर मौज-मस्ती वाला नहीं है’

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अापने पितृसत्ता पर निर्मम प्रहार किए हैं. बावजूद इसके हिंदी साहित्य में आपका मुखर विरोध पुरुष रचनाकारों ने नहीं बल्कि स्त्री रचनाकारों ने किया है. यह विरोध आज भी उसी तरह जारी है. लेखिकाओं द्वारा अपने विरोध को कैसे देखती हैं?
स्त्री रचनाकारों का यह विरोध मेरे द्वारा पितृसत्ता को निशाने पर लेने के कारण नहीं है. यह आपसी ईर्ष्या-द्वेष के कारण हो सकता है. इन लेखिकाओं को लगा कि हम लोगों के बीच यह गांव की स्त्री कहां से आ गई. ठीक उसी तरह जैसे आज राजनीतिक दलों को लग रहा है कि यह केजरीवाल कहां से आ गया? मुझे लगता है कि उनका विरोध स्वाभाविक ही था क्योंकि वे बीस-तीस वर्षों से लिख रही थी और साहित्य में बिल्कुल नई होने के बावजूद मेरा ‘इदन्नमम’ उपन्यास आया और तहलका मच गया. यहीं से मैं सबको खटकने लगी. इसके बाद मेरे उपन्यास एक-एक करके जबरदस्त चर्चित होते गए और उसके साथ मेरा विरोध भी बढ़ता गया.

इस विरोध का बड़ा कारण राजेंद्र यादव के साथ आपका घनिष्ठ जुड़ाव तो नहीं था क्योंकि राजेंद्र यादव ने हिंदी में स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श को आगे बढ़ाया और आप उसकी प्रतीक बना दी गईं. उनके साथ जुडऩे से आपको साहित्यिक लाभ हुआ या हानि?
मैं बताना चाहती हूं कि जब ‘इदन्नमम’ आया तो उसमें स्त्री विमर्श जैसा कुछ भी नहीं था, फिर भी उसका विरोध हुआ. राजेंद्र यादव ने जिस तरह से उस पर पांच समीक्षाएं हंस में छापीं, मुझे लगता है इस कारण इस उपन्यास का विरोध शुरू हो गया. वैसे अन्य जगहों पर भी उसकी अच्छी समीक्षाएं आई थीं जहां राजेंद्र यादव का कोई दखल नहीं था. मैं आज तक तय नहीं कर पायी हूं कि राजेंद्र यादव से साहित्यिक संबंध के कारण मुझे लाभ हुआ या हानि. कुछ लोगों का मानना है कि इससे मेरा नुकसान हुआ है. जो पुरस्कार वगैरह मुझे मिल सकते थे, नहीं मिले. उनके सारे विरोधी उनसे कहीं अधिक मेरा विरोध करने लगे. लेकिन मैं इस साहित्यिक संबंध को अपने लिए अच्छा ही मानती हूं.

bookविभूति नारायण राय प्रकरण को लेकर राजेंद्र यादव से आपकी जबरदस्त लड़ाई हुई. लोगों का कहना है कि राजेंद्र यादव से जितने फायदे लेने थे आपने ले लिया. अब आप उनसे अलग दिखना चाहती थीं इसलिए इसे बहाना बनाया.
पता नहीं यह क्यों कहा गया? यह बहाना नहीं था विरोध का कारण था. अगर फायदे की ही बात है तो मुझे तो बहुत पहले अलग हो जाना चाहिए था. मैंने तो यह तथाकथित फायदा तो बहुत पहले ही उठा लिया था. इस बात में कहीं से कोई तथ्य नहीं है. उन्होंने विभूति नारायण राय के पक्ष में तीन-तीन संपादकीय लिखे. जब मैं स्त्रियों के पक्ष में वी एन राय के खिलाफ लड़ रही थी तो राजेंद्र यादव को कैसे माफ कर देती जो वी एन राय के पक्ष में खड़े हो गए थे.

फिर उन्हीं वी एन राय से संवाद के लिए आप कैसे तैयार हो गईं?
तब दो-तीन साल हो चुके थे. पाखी के संपादक ने कहा कि हम उसी विषय पर आप दोनों के बीच संवाद करना चाहते हैं. मैंने कहा कि अगर आप समझते हैं कि मैं डर रही हूं तो ऐसी बात नहीं है, मैं आऊंगी. बल्कि सच तो यह है कि जब वी एन राय ने सुना कि मैं आ रही हूं तो वे कतराने लगे. मैं यह भी देखना चाहती थी कि जिस व्यक्ति ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए माफी मांगी है वह वास्तव में भी कुछ बदला है या सिर्फ पद बचाने के लिए माफी मांगी है. मैंने देखा उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है.

आप विवाह संस्था की तमाम सुविधाओं का लाभ उठा रही हैं. सफल वैवाहिक जीवन भी जी रही हैं. ऐसे में आपको विवाह संस्था की मुखालफत करने का नैतिक आधिकार कैसे है? आप खुद उदाहरण प्रस्तुत करतीं.
विवाह संस्था को मैं त्याग भी सकती थी, किंतु दूसरे पक्ष की भी तो भूमिका होती है जो जाने नहीं देती. मैं विरोध के लिए विरोध नहीं करती. विवाह संस्था में अगर पति साथी की तरह चले तो मैं उसके कतई विरोध में नहीं हूं. मेरा विरोध उन जकड़बंदियों से है जो स्त्री का जीवन दूभर कर देते हैं. सबसे कठिन होता है पुरुष को बदलना. छोड़ना तो आसान है. अगर स्त्री एक पुरुष को छोड़कर दूसरे के पास जाती है तो वह भी वैसा ही मिलता है. इसलिए मेरा कहना है कि स्त्रियां पुरुषों को छोड़ें नहीं, उन्हें बदलें. अगर बदलाव की कोई गुंजाइश ही न हो तो बात अलग है. मैंने भी अपने पति को बदला है.

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