मीडिया मजूरी

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इस अव्यवस्थित माहौल में चैनल की आय का जरिया सिर्फ  विज्ञापन होता है. विज्ञापनों की दशा यह हुई है कि 2000 में जब आधे घंटे का आज तक आता था तब विज्ञापन की दर 80,000 रुपये प्रति दस सेकंड तक हुआ करती थी. आज यह घटकर 2,000 रुपये प्रति दस सेकंड तक आ गिरी है. यह कमाल चैनलों की भीड़ का है. बाजार की भाषा में कुछ आंकड़ों पर नजर दौड़ाएंगे तो आप पाएंगे कि खबरिया चैनलों की दुनिया कितनी क्षणभंगुर है. ये आंकड़े मीडिया और मनोरंजन जगत पर हर साल सबसे बड़ा तुलनात्मक अध्ययन करने वाली संस्था केपीएमजी-फिक्की के हैं. अपनी निष्कर्ष रिपोर्ट में संस्था लिखती है, ‘दर्शकों की तुलना में समाचार चैनलों को मिल रहा विज्ञापन राजस्व दोगुना है.’ कहने का अर्थ है कि मनोरंजन, फिल्म, संगीत और इन्फोटेनमेंट चैनलों के मुकाबले न्यूज चैनलों पर जितने दर्शक आते हैं उसका दोगुना पैसा इन्हें मिलता है. जब पैसे का ही सारा खेल है तब आज नहीं तो कल बाजार के विशेषज्ञों की नजर इस भेदभाव की तरफ जाएगी और तब न्यूज चैनलों के लिए हालात और दुश्कर होंगे. रिपोर्ट आगे भी कहती है, ‘साल 2011 न्यूज चैनलों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है. न्यूज चैनलों के संचालन की लागत तो इस दौरान बढ़ी है लेकिन विज्ञापन राजस्व जहां का तहां अटका है. एक नहीं पिछले तीन साल के दौरान विज्ञापनों की दर में स्थिरता बनी रही है. इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है. न्यूज चैनलों के राजस्व में बढ़ोतरी की संभावनाएं भी बहुत सीमित हैं. दर्शकों की संख्या में बड़े परिवर्तन ला पाना संभव नहीं है. न्यूज चैनलों के लिए स्थितियां कठिन होने वाली हैं.’

चैनलों को ले-देकर सिर्फ विज्ञापन का आसरा है. लेकिन इसका अपना अलग ही खेल है. विज्ञापन यानी आय का सारा बंदोबस्त टैम नामक कंपनी के इशारों पर होता है. यह कंपनी टीआरपी रेटिंग तय करती है जिसके आधार पर विज्ञापनदाता कंपनियां अंधश्रद्धा के साथ चैनलों को विज्ञापन देती हैं. ज्यादा टीआरपी ज्यादा विज्ञापन की गारंटी है. लेकिन टैम का चोला भी उतरने लगा है. ज्यादातर चैनलों के मुखिया अब इसकी जकड़ से मुक्त हो जाना चाहते हैं. एनके सिंह कहते हैं, ‘चैनलों को जल्द से जल्द टैम के चंगुल से निकलना होगा. इसकी पूरी प्रक्रिया खामियों से भरी है.’ अब जिन छोटे चैनलों की विजिबिलिटी ही नहीं है या जो वितरकों की मुंहमांगी मुराद पूरी नहीं कर सकते उन्हें टीआरपी रेटिंग क्या मिलेगी. और टीआरपी रेटिंग नहीं मिलेगी तो विज्ञापनदाता उनकी तरफ क्यों देखेगा. इस तरह छोटे चैनल अपनी मौत मरने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

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टैम की खामियों की बात करें तो देश भर में टैम के सिर्फ 8,150 मीटर लगे हैं. इनकी भी समस्या यह है कि आठ हजार मीटरों का वितरण उल्टा-सीधा है. दिल्ली जैसे छोटे राज्य में 100 से ज्यादा मीटर लगा दिए गए हैं, बिहार में साल भर पहले एक मीटर लगाया गया है,  झारखंड को दो मीटर के लायक समझा गया है और जम्मू-कश्मीर की हैसियत एक की भी नहीं है. इस अंड-बंड वितरण के दम पर टैम सवा अरब लोगों का मूड भांप लेने का दावा करता है. विज्ञापनदाता पूरी श्रद्धा से उसका अनुसरण कर लेते हैं.  टैम की दूसरी गड़बड़ियां भी अब सामने आने लगी हैं. हाल ही में एनडीटीवी ने टैम की मातृ कंपनी नील्सन के पर न्यूयॉर्क की अदालत में साढ़े सात हजार करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का दावा ठोंका है. एनडीटीवी का आरोप है कि टैम के अधिकारी भारत में कुछ लोगों से मिलीभगत करके टीआरपी के आंकड़ों में हेराफेरी करते हैं. बदले में टैम के लोग घूस लेते हैं. टैम की गड़बड़ियां कुछ स्तरों पर नंगी आंखों से देखी जा सकती हैं. आज भी देश में सबसे ज्यादा पहुंच डीडी न्यूज की है. ग्रामीण इलाकों में जहां केबल की पहुंच नहीं है वहां आज भी डीडी न्यूज और डीडी नेशनल खबरों और मनोरंजन के बेताज बादशाह हैं. पर टैम की रेंटिंग में ये आज तक अपनी जगह नहीं बना पाए हैं. अब प्रसार भारती भी इनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में है.

चैनल की आय में एक और रास्ते से सेंध लगी है. पिछले पांच सालों के दौरान ऑनलाइन और न्यू मीडिया की पहुंच तेजी से लोगों तक हुई है. झा कहते हैं, ‘ऑनलाइन और न्यू मीडिया ने चैनलों की आय का एक मोटा हिस्सा खींच लिया है. लिहाजा चैनलों के समक्ष स्थितियां और कठिन हो गई हैं.’ विज्ञापनदाता कंपनियों की मजबूरी यह है कि वे मुनाफे को ध्यान में रखकर काम करती हैं. आज सबसे ज्यादा क्रयशक्ति रखने वाला मध्यवर्ग ऑनलाइन माध्यमों का भरपूर इस्तेमाल करता है, लिहाजा वे इसे यूं ही नहीं छोड़ सकतीं.

इस तरह के अव्यावहारिक आर्थिक ढांचे वाले एक धंधे में एकाएक तीन-चार सौ लोग कूद पड़े हैं. और उन्होंने अपने पीछे हजारों लोगों की उम्मीदें चिपका ली हैं. उनके पास न तो कोई दीर्घकालिक योजना है, न ही बटुए में उतना पैसा. ऐसा भी नहीं है कि उनके पास कोई योजना नहीं है. मगर कई मामलों में ये योजनाएं अपने मुख्य धंधों को आगे बढ़ाने तक सीमित हैं. चैनल इस काम में उनके हथियार बन गए हैं. धीरे-धीरे जर्नलिस्ट यूनियनों का भी विलोप हो गया है. पत्रकारों की आवाज उठाने वाली कोई विश्वसनीय संस्था नहीं है. महुआ हो या वीओआई या फिर  फोकस टीवी, यहां हो रहे विरोध प्रदर्शनों का दायरा बहुत सीमित और व्यक्तिगत है. वही लोग लड़ाई लड़ रहे हैं जिनकी दाल-रोटी संकट में है. दिल्ली पत्रकार संघ के पूर्व सचिव और वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ कहते हैं, ‘पत्रकार असंगठित मजदूर हो गए हैं. अब उनकी बात रखने वाला कोई नहीं है. नब्बे के दशक में यूनियन के पदाधिकारियों का चुनाव हजारों मतदाता करते थे. आज दो सौ से भी कम सदस्य रह गए हैं. इतनी छोटी संख्या से चुनकर आए लोग पत्रकारों की इतनी बड़ी जमात का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकते. दूसरे इनकी गतिविधियां भी संदिग्ध हैं. यूनियन के लोग मालिकों के साथ मिलकर कर्मचारियों से धोखा करते रहे हैं. हिंदुस्तान टाइम्स के मामले में यह देखा गया.’

हाल ही में संघ के महासचिव पद से हटे जावेद फरीदी एक दूसरा पक्ष उद्घाटित करते हैं, ‘जिस समय यूनियनें अस्तित्व में आई थी, उस समय तक सिर्फ प्रिंट मीडिया हुआ करता था. यूनियन का कानून कहता है कि इसके सदस्य सिर्फ प्रिंट मीडिया के पत्रकार ही हो सकते हैं. टीवी वाले नहीं. हालांकि यह बात सच है कि पिछले एक दशक में प्रिंट के मुकाबले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार बढ़े हैं. पर समस्या यह है कि आज पुरानी प्रिंट की यूनियन ही बेमानी हो चुकी है तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सोचने की फुर्सत किसे है.’

आज पत्रकारों की बात रखने वाली एक भी ढंग की संस्था नहीं है जबकि पिछले एक दशक में अकेले दिल्ली शहर में पत्रकारों की संख्या कई गुना बढ़ गई है. कहने को वेज बोर्ड और लेबर लॉ जैसी कानूनी प्रक्रियाएं हैं पर कोई मीडिया संस्थान इन्हें मानता ही नहीं. मजीठिया बोर्ड की हालिया सिफारिशों की हवा टाइम्स ऑफ इंडिया और एचटी जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने पत्रकारों के जरिए ही निकाल दी. जनवरी, 2011 में इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) के लोगों ने ही प्रस्ताव पारित कर दिया कि मजीठिया बोर्ड की सिफारिशें सरकार कतई लागू न करे. आज कॉन्ट्रैक्ट का जमाना है. सारे चैनल, सारे अखबार कॉन्ट्रैक्ट पर पत्रकार रखते हैं, मनमाफिक शर्तें लगाते हैं, उनमें साफ-साफ लिखा होता है कि किसी भी तरह की यूनियनबाजी में शामिल पाए जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी. इस तरह चैनल जब चाहें तब पत्रकारों से मुक्ति पा लेते हैं. चैनलों में वेज बोर्ड के आधार पर नौकरी देने की कभी कोई परंपरा रही ही नहीं, अखबारों में भी वेज बोर्ड पर नियुक्त गिने-चुने लोग ही बचे हैं. मीडिया संस्थानों का तर्क है कि वे सरकारी प्रावधानों से कहीं ज्यादा मोटी पगार देते हैं इसलिए उन्हें किसी वेज बोर्ड का गुलाम बनने की जरूरत नहीं है. पर यह आधी सच्चाई है. सौरभ बताते हैं, ‘जिन्हें बड़े मीडिया हाउस मोटी पगार वाला कहते हैं, उनकी संख्या कितनी है, पांच फीसदी भी ऐसे लोग नहीं हैं किसी संस्थान में. शोषण निचले स्तर पर हो रहा है.’

इसका एक मानवीय पहलू भी है. दिल्ली के ज्यादातर पत्रकार हिंदी में काम नहीं करते. हिंदी का काम करने के लिए मानव श्रम का आयात उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों से होता है. घर-परिवार की जो परिकल्पना है उसमें इनके पास परिवार तो होता है लेकिन दिल्ली में एक अदद घर नहीं होता. नौकरी की क्षणभंगुरता में उसका अपना ही भविष्य निश्चित नहीं होता तो वह परिवार को क्या भविष्य देगा. ऊपर से यह बौद्धिक संपदा से जुड़ा मामला है. लिखाई-पढ़ाई से नाता रखने वाला पत्रकार अपने जीवन के सबसे ऊर्जावान दिनों को नौकरी की जुगाड़ में जाया कर रहा है. अपनी बौद्धिक संपदा का विकास वह क्या करेगा. यहां हम सन पचपन में बने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की बात न ही करें तो बेहतर है, जिसके मुताबिक छह घंटे से ज्यादा की शिफ्ट नहीं होनी चाहिए, हफ्ते में एक दिन छुट्टी जरूर होनी चाहिए, साल में 15 छुट्टियां मिलनी चाहिए, 10 दिन की आकस्मिक छुट्टी भी मिलनी चाहिए आदि-आदि.

यह तनावग्रस्त चैनलों के संसार में रामराज की स्थिति होगी. और रामराज की हमारे यहां सिर्फ कल्पना की जाती है.

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  1. आपने मीडिया का अटल सत्य लिखा है… हालात शुरू से ही खराब थे लेकिन जर्नलिज़्म के सुनहरे सपने दिखाकर कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हजारों संस्थान युवाओं को बरगला रहे हैं और इस आग में झोंक दे रहे हैं… जब बड़ी उम्मीदों से आया छात्र या छात्रा नौकरी की तलाश में भटकता है तो उसे हकीकत पता चलती है… तब तक वो अपनी जिंदगी का कीमती समय जाया कर चुका होता है…खुदा न खास्ता नौकरी मिल गई तो भी सपने टूटते ही है… जो काम कर रहे हैं उन्हीं की जरूरत नहीं हैं तो नए लोगों को कहां खपाया जाए… कुल मिलाकर गन्ने से जूस निकालकर फेंक देने का काम चल रहा है…

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