मानवता पर मँडराता ख़तरा

यूरोप में बीते कई वर्षों में गर्मी बढ़ रही है। अगर महाद्वीप में ग्लोबल वार्मिंग 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुँची, तो यहाँ हालात बहुत ख़तरनाक होंगे। गर्मी से होने वाली मौतों में बहुत वृद्धि होगी। यही नहीं बाढ़ भी अपना कहर ढायेगी। इटली के $खूबसूरत शहर वेनिस के डूबने की आशंका भी व्यक्त की गयी है। उत्तरी अमेरिका की बात करें, तो यहाँ बड़े जगंल की आग जंगलों को और जलाती रहेगी। पश्चिमी अमेरिका व कनाडा में भारी बारिश होगी। इससे बड़े पैमाने पर तबाही होने का अनुमान है। दक्षिण और मध्य अमेरिका के बाबत बताया गया है कि अमेजन के वर्षावन और इसके द्वारा समर्थित हज़ारों विविध पौधे और जानवरों के सूखे के चपेट में आने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन की ज़द में ऑस्ट्रेलिया भी आता है। यहाँ के ग्रेट बैरियर रीफ और केल्प के जंगल भी गर्मी में झुलसेंगे। लू और गर्मी की वजह से पर्यटन राजस्व पर काफ़ी असर पड़ेगा।

विश्व का सबसे गर्म महाद्वीप अफ्रीका में गर्मी में और अधिक इज़ाफ़ा हो सकता है। इससे वहाँ के लोगों के तनाव में आने का ख़तरा बढ़ सकता है। अगर ग्लोबल वार्मिंग 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाती है, तो यहाँ प्रति एक लाख में कम-से-कम 15 अतिरिक्त लोग भीषण गर्मी की वजह से मारे जाएँगे। भारत को लेकर भी आईसीपीपी की यह आकलन रिपोर्ट कई स्तर पर सचेत करती है। अगर तापमान में वृद्धि जारी रहती है, तो $फसल उत्पादन में तेज़ी से कमी आएगी। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती माँग का मतलब है कि भारत में 2050 तक क़रीब 40 फ़ीसदी लोग पानी की कमी के साथ जीएँगे, जो कि इस समय यह संख्या 33 फ़ीसदी है। भारत के कुछ हिस्सों में चावल का उत्पादन 30 और मक्का का 70 फ़ीसदी गिर सकता है। अगर उत्सर्जन में कटौती की जाती है, तो यह आँकड़ा 10 फ़ीसदी हो जाएगा। भारत में जलवायु परिवर्तन का जो असर समुद्र स्तर पर पड़ेगा, वह चौंकाने वाला है। समुद्र स्तर व नदी की बाढ़ से आर्थिक लागत दुनिया में सबसे अधिक होगी। अकेले मुम्बई में समुद्र स्तर में वृद्धि से 2050 तक प्रतिवर्ष 162 अरब डॉलर के नुक़सान की आशंका जतायी गयी है। यही नहीं, भारत दूसरे देशों में जलवायु परिवर्तन की से होने वाले परिणामों से भी प्रभावित होगा। आईपीसीसी की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शहर और शहरी केंद्र वैश्विक तापमान को बढ़ाने में बराबर अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

सिटीस व सेटलमेंट अध्याय की लेखिका अंजलि प्रकाश ने लिखा है कि शहरी भारत पर अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक ख़तरा मँडरा रहा है। क्योंकि एक अनुमान है कि 2050 तक यानी अगले 28 वर्षों में शहरवासियों की आबादी क़रीब 88 करोड़ हो जाएगी, जो कि वर्ष 2020 तक क़रीब 48 करोड़ थी। रिपोर्ट में यह भी ख़ुलासा किया गया है कि आद्र्र्रता व तापमान का संयुक्त पैमाना (वेट बल्ब तापमान) 31 डिग्री तक पहुँच जाएगा, जो मानव जीवन के लिए ख़तरनाक होता है। अगर यह 35 डिग्री तक पहुँच जाए, तो बहुत घातक होता है। भारत में अभी यह 25-30 डिग्री रहता है और शायद ही कभी 31 डिग्री से अधिक होता है।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है और इसने 2070 तक नेट जीरो के स्तर तक पहुँचने का वादा किया है। बेशक भारत सरकार ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती वाले इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ नीतियाँ बनायी हैं; लेकिन अभी इस दिशा में सरकार को बहुत अधिक काम करने की ज़रूरत है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुक़सानों पर कभी चुनावी रैलियों में चर्चा नहीं होतीं। राजनीतिक प्रतिबद्धता का अभाव साफ़ दिखायी देता है। जलवायु परिवर्तन सरीखे गम्भीर मुद्दे पर सरकारी नीतियों व कार्यक्रमों की समीक्षा समय-समय पर बहुत ज़रूरी है।