मातम में मार्केटिंग

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यही व्यवस्था लगभग हर राज्य सरकार ने की है. यानी सेना लोगों को जहां वे फंसे होते हैं वहां से बचाकर हरिद्वार और देहरादून जैसे बेस कैंपों तक लाती है. फिर वहां लोग अपने-अपने राज्यों द्वारा लगाए गए राहत शिविरों में जाते हैं या फिर अन्य  शिविरों में. गुजरात सरकार ने भी ऐसा ही किया. लेकिन विभिन्न माध्यमों से ऐसी खबरें आईं मानो बाढ़ में फंसे गुजरातियों को गुजरात सरकार ने चुन-चुन कर निकाला हो और फिर उन्हें उनके घर भेजा हो. अहम सवाल यह उठता है कि इस पूरे दुष्प्रचार में गुजरात सरकार की क्या भूमिका है. 15 हजार लोगों को बचाने का दावा न तो मोदी की तरफ से किया गया था और न ही गुजरात सरकार की तरफ से. वे यह कह कर अपना बचाव भी कर सकते हैं. लेकिन अगर उनकी तरफ से यह दावा नहीं था और इस दावे में उनकी सहमति नहीं थी तो जब इसको लेकर चारों तरफ चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने इसका खंडन क्यों नहीं किया?

सूत्रों की मानें तो ये सारा किया-धरा उस पीआर एजेंसी का है जिस पर गुजरात सरकार और मोदी की छवि को चमकाने की जिम्मेदारी है. कहा जा रहा है कि पीआर एजेंसी ने ही यह खबर मीडिया में प्लांट कराई जिससे गुजरात सरकार और मोदी को ‘रैंबो’ दिखाया जा सके. लेकिन आंकड़ों को लेकर गड़बड़ी हो गई इसलिए दावों का दांव उल्टा पड़ गया और स्थिति हास्यास्पद हो गई. उत्तराखंड पहुंचने के बाद मोदी के केदारनाथ मंदिर बनवाने की पेशकश की भी विभिन्न हलकों में आलोचना हुई. भाजपा नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस प्रस्ताव पर मांगी गई प्रतिक्रिया के जवाब में मीडिया से कहा, ‘पहले लोगों को बचाना जरूरी है. घर बनाना जरूरी है. मंदिर बाद में भी बन जाएगा.’

मोदी की आलोचना इस बात के लिए भी हुई कि जो राज्य खुद के सबसे ज्यादा संपन्न होने का दम भरता है उसने उत्तराखंड की इस त्रासदी पर शुरुआत में सिर्फ दो करोड़ रुपये का सहयोग देने की घोषणा की. दूसरी तरफ देखें तो उत्तर प्रदेश ने 25 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र, दिल्ली व हरियाणा ने 10-10 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडि़शा जैसे राज्यों ने पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता राशि भेजी. हरियाणा ने तो 25 गांवों को गोद लेने का भी एलान किया. इसके साथ ही वह पहला ऐसा राज्य भी बना जिसने इस त्रासदी में बराबर के शिकार बेजुबानों की सुध ली. हरियाणा ने आपदा से प्रभावित पशुओं के इलाज के लिए दवाओं के साथ डॉक्टरों की एक टीम भी भेजी है.

उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने 25 करोड़ रुपये की सहायता राशि देने के साथ ही राज्य परिवहन की 300 बसें फंसे हुए यात्रियों को ले आने के लिए भेज दीं. साथ में डॉक्टरों का एक बड़ा दल भी प्रभावितों के इलाज के लिए उत्तराखंड रवाना किया. भाजपा शासित मध्य प्रदेश ने त्रासदी के कुछ समय बाद ही राज्य के संस्कृति मंत्री के साथ एक सात सदस्यीय टीम को देहरादून रवाना किया. इसके साथ ही राज्य के लोगों को वहां से लाने के लिए सरकार ने ट्रेन के साथ ही सरकारी और प्राइवेट विमानों का भी इंतजाम किया. इस तरह से उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद राहत को लेकर विभिन्न राज्यों की भूमिका को देखें तो बाकी के राज्य राहत पहुंचाने के मामले में गुजरात से कहीं आगे दिखाई देते हैं. हां, यह जरूर है कि उन्होंने इसका ढिंढोरा नहीं पीटा और न अपनी ‘महानता’ की खबरें फैलाईं.

मातम की मार्केटिंग के लिए सिर्फ मोदी की ही आलोचना नहीं हुई बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव राहुल गांधी भी आलोचना के घेरे में आए. त्रासदी के आठ दिन बाद तक राहुल गांधी का न तो इस हृदयविदारक घटना पर कोई बयान आया और न ही वे कहीं दिखाई दिए. सोशल मीडिया से लेकर बाकी जगहों पर जब हो-हल्ला मचा तो कुछ दिन बाद वे सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस दफ्तर के पास राहत सामग्री लेकर जाने को तैयार ट्रकों को झंडा दिखाते दिखे. लेकिन इसके बाद खबरें आईं कि ट्रक तीन दिन पहले से राहत सामग्री लेकर तैयार खड़े थे, लेकिन राहुल के देश से बाहर होने के कारण उन्हें रवाना नहीं किया गया. खैर, ट्रक जैसे-तैसे गए, लेकिन आधे रास्ते में जाकर वे फिर से खड़े हो गए. उनके ड्राइवरों के हवाले से बताया गया कि उन्हें इतना ही डीजल दिया गया था.

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