मर्ज कुछ इलाज कुछ

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हालांकि इसके बावजूद राज्य में पुलिस ने माओवादियों से लड़ने के लिए समय-समय पर खुद को तैयार भी किया है. फिलहाल झारखंड में 25 जगुआर मारक दस्ते माओवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए कार्यरत हैं. ये दस्ते पहले एसटीएफ यानी स्पेशल टास्क फोर्स के रूप में जाने जाते थे. माओवादियों से लड़ने में राज्य में सीआरपीएफ की 17 बटालियनें, इंडियन रिजर्व बटालियन की पांच कंपनियां और स्पेशल ऑक्जिलरी फोर्स की दो बटालियनें लगी हुई हैं. पुलिस ट्रेनिंग सेंटर, हजारीबाग और कमांडो ट्रेनिंग सेंटर, पदमा में पुलिसकर्मियों का प्रशिक्षण भी जारी है और पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश पांडेय की मानें तो बेसिक और एडवांस मिलाकर कुल 17 ट्रेनिंग स्थल  अलग हैं, जहां पुलिसवालों को प्रशिक्षित किया जा रहा है.

खुद राज्य के पुलिस महानिदेशक जीएस रथ कह चुके हैं कि राज्य में करीब 16 हजार पुलिसकर्मियों की कमी है.

फिर भी यह सच है कि अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. पुलिस में ऊपरी स्तर पर संवाद, समन्वय और सहयोग का अभाव माओवादियों को भारी पड़ने का मौका दे रहा है. झारखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक जेबी महापात्रा बताते हैं, ‘झारखंड में पुलिस और माओवादियों के बीच एक्सिडेंटल एनकाउंटर हो तो दूसरी बात है. यहां तो तैयारियों के साथ ऑपरेशन चलाया जाता है. कई बार कहा जाता है कि चीजों की कमी है लेकिन ऐसा नहीं है. जो भी जवान लड़ने जाते हैं, उन्हें सारी सुविधाओं से लैस कर भेजा जाता है लेकिन अधिकारियों में संवादहीनता और खींचतान इतनी है कि पुलिस चूक जाती है.’ सीआरपीएफ के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, ‘ऑपरेशन के समय जिला पुलिस, पुलिस मुख्यालय, विशेष शाखा, आईजी लॉ ऐंड ऑर्डर, आईजी ऑपरेशन ऐंड प्लानिंग और सीआरपीएफ के बीच गहरा समन्वय होना चाहिए और निरंतर संवाद भी, लेकिन समन्वय की लय बीच में ही टूट जाती है और संवाद बीच में ही विवाद का रूप ले लेता है.’

माओवादियों से लड़ने के लिए झारखंड पुलिस ने दो उग्रवादी संगठनों को फलने-फूलने में मदद की और उससे मदद भी लेती है. ये उग्रवादी संगठन तृतीय प्रस्तुति कमिटी और झारखंड प्रस्तुति कमिटी हैं. दोनों प्रतिबंधित हैं लेकिन इनका इस्तेमाल झारखंड पुलिस खुलेआम करती है. इन दोनों संगठनों का राज्य के छह जिलों गढ़वा, पलामू, लातेहार, चतरा, हजारीबाग और रामगढ़ इलाके में प्रभाव है. संगठन के उग्रवादी पुलिस के लिए पेट्रोलिंग करते हैं और माओवादियों से मुठभेड़ भी. झारखंड पुलिस ने इन दोनों उग्रवादी संगठनों पर न तो कोई इनाम घोषित किया है और न ही कभी वह इनके खिलाफ कोई अभियान चलाती है. नतीजा यह कि दोनों उग्रवादी संगठन मुखबिरी करने के साथ-साथ दहशत, अपराध और वसूली अभियान चलाते हैं. हालांकि पुलिस महानिदेशक जीएस रथ इससे इनकार करते हैं.

बहरहाल, एक बार फिर पुलिस माओवादियों के खिलाफ नए ऑपरेशन की तैयारी में जुट गई है. पुलिस को सूचना मिली है कि लातेहार के कटेया जंगल में आतंक मचाने के बाद माओवादी लोहरदगा-गुमला जिले के जंगलों में हैं, सो इस बार वहीं ऑपरेशन होगा. 28 जनवरी को पलामू पुलिस अधीक्षक अनूप टी मैथ्यू ने एक बार फिर अखबारों में बड़े विज्ञापन देकर पुनर्वास पैकेज की घोषणा कर दी है. इस बार उन्होंने 30 हजार रुपये से लेकर 12 लाख रुपये तक की राशि देने का वादा किया है. दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश झारखंड में माओवादियों के सफाये के लिए लंबी योजना की बात करते हैं. सारंडा में गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने के बाद रांची पहुंचे रमेश कहते हैं, ‘सारंडा में लोकतंत्र रास्ते पर आ गया है. लोग अब अपने अधिकार के लिए आंदोलन कर रहे हैं. वन विभाग एक रोड़े की तरह पेंच फंसाता है. छह हजार से अधिक आदिवासियों पर वन विभाग ने मुकदमा ठोककर जेल में बंद कर रखा है, इससे पार पाना होगा.’ रमेश कहते हैं कि वे झारखंड में सब कुछ करने को तैयार हैं लेकिन प्रशासन की सुस्ती और राजनीति की उथल-पुथल अड़चन बन जाती है.

राज्य में फिलहाल राष्ट्रपति शासन है, इसलिए किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद दिखती है. राष्ट्रपति शासन में राज्यपाल के सलाहकार नियुक्त हुए के विजय कुमार कहते हैं, ‘झारखंड में उग्रवादियों से आंध्र के पैटर्न पर लड़ना होगा. सारंडा की तरह पलामू के इलाके में भी एक्शन प्लान चलाएंगे. माओवादियों से लड़ने के लिए बनाई गई इंडियन रिजर्व बटालियन की तरह एक इंजीनियरिंग बटालियन भी बनेगी, जो माओवादी प्रभावित इलाके में विकास कार्यों को गति दे सके.’ अब देखना यह है कि इन बातों पर कितना अमल होता है.

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