मनरेगा प्रवासी मजदूरों के लिए बनी जीवनदान : गुजरात सरकार

रिपोर्ट में कहा गया है कि मनरेगा ने काम के अवसर देने के साथ ही लोगों के बीच सकारात्मक भूमिका अदा की। प्रवासी श्रमिकों ने अपने छोटे से खेत में मक्के की खेती की, जो उनके परिवार का भरण पोषण करने के लिए पर्याप्त साबित हुई। इसके अलावा उन्होंने मनरेगा के तहत खुद को नामांकित करके अलग से कुछ रकम की कमाई कर ली। ऐसे ही अन्य मजदूरों को भी काम करने का मौका मिल गया जो शहरों में जाकर अन्य तरह के काम किया करते थे।

गुजरात के दाहोद में मनरेगा के तहत 2.38 लाख श्रमिक जुड़े जो राज्य के किसी भी जिले में सबसे ज्यादा हैं। इसके बाद भावनगर में 77,659 और नर्मदा में 59,208 मजदूरों ने पंजीकरण कराया। इसके अलावा खेतीबाड़ी में काम करके कोविड काल में श्रमिकों ने थोड़ी बहुत आय अर्जित की ताकि वे अपना और परिजनों का पेट पाल सकें।

सौराष्ट्र में प्रवासी श्रमिकों के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे मजदूर सूरत में हीरा क्षेत्र से जुड़े थ  और गांवों में भूमि जोत वाले प्रवासी परिवारों ने खेती करने के विकल्प चुना। बाकी लोगों ने खुद को खेतिहर मजदूर के तौर पर खुद को समर्पित कर दिया। सूरत में काम करने वाले 12 लाख से अधिक श्रमिक सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात से हैं जो हीरा को तराशने या इससे जुड़े अन्य कामों में लगे रहते थे।